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लोकसेवकों ने बताया "विजन"

जयपुर । राजस्थान पत्रिका के विजन 2025 अभियान के तहत 177 विधानसभा क्षेत्रों में चर्चा बैठकों में 5981 लोकसेवक शामिल हुए। अन्य क्षेत्रों में बारिश के कारण बैठक नहीं हो पाई, अगले दो दिन में इन बैठकों को करवाने की योजना है। लोकसेवकों ने कहा, निर्णय जाति, समाज और वर्गवाद से ऊपर उठकर होने चाहिए। स्वच्छ छवि के नेताओं को चुनाव लड़ाया जाए। त्वरित न्याय और कठोर कानून व्यवस्था हो। प्रशासनिक ढांचे में बदलाव कर विभागों में एक से अधिक आईएएस नियुक्त हों, जो दैनिक कार्यो के अलावा नई-नई योजनाओं पर चिंतन व अमल कर सकें।
 

सपनों का सौदागर

गुलाब कोठारी
प्रधान सम्पादक पत्रिका समूह
जब बन्दर अपनी समस्या का समाधान आपस में नहीं कर सकते, तब बिल्ली बुआजी बनकर टपकती है। बन्दरों को तराजू दिखा कर न्याय का आश्वासन भी देती रहती है और उनके हिस्से को चट भी कर जाती है। आज पूरे देश में अधिकांश सामाजिक संगठन, विशेषकर गैर सरकारी संगठन, बिल्ली की भूमिका में नजर आते हैं।
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खुशी तब मिलेगी, जब आप जो सोचते हैं, जो कहते हैं और जो करते हैं, उसमें सामंजस्य होगा।... पहले वो आप पर ध्यान नहीं देंगे, फिर वो आप पर हंसेंगे, फिर वो आपसे लड़ेंगे और तब आप जीत जाएंगे।... खुद वो बदलाव बनिए, जो दुनिया में आप देखना चाहते हैं।
महात्मा गांधी, राष्ट्रपिता
  यदि किसी दूसरे आदमी या किसी और समय का इंतजार कीजिएगा, तो बदलाव नहीं आएगा। हम ही वो लोग हैं, जिनका हम इंतजार कर रहे हैं। हम ही वो बदलाव हैं, जिसकी हमें खोज है।
बराक ओबामा, राष्ट्रपति, यूएसए
 
कुछ लोग चीजों को ऎसे देखते हैं जैसी वे हैं और पूछते हैं "क्यों?" मैं चीजों को वैसा देखता हूं, जैसी वे कभी नहीं थीं और फिर पूछता हूं "क्यों नहीं?"
जार्ज बर्नाड शॉ, प्रसिद्ध अंग्रेजी लेख
  किसी वृक्ष को काटने के लिए आप मुझे छह घंटे दीजिए और मैं पहले चार घंटे कुल्हाड़ी की धार तेज करने में लगाऊंगा।
अब्राहम लिंकन, पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति
 
शिक्षा ही वह सबसे सशक्त हथियार है, जिसका इस्तेमाल आप दुनिया को बदलने के लिए कर सकते हैं।... जब तक कोेई काम हो न जाए, वह असम्भव लगता है।
नेल्सन मंडेला, ख्यात दक्षिण अफ्रीकी नेता
  सबसे खतरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे खतरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना।।
पाश, ख्यात कवि
 

सिविल सोसायटी

क्या है सिविल सोसायटी
मोटे तौर पर सिविल सोसायटी या सभ्य-सजग समाज या समूह या नेटवर्क वह है, जो किसी क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव या आवश्यक सुधार के लिए सक्रिय है। यह समूह स्वार्थी नहीं, सेवाभावी होता है। जिस देश में सिविल सोसायटी सशक्त और ईमानदार होती है, उस देश में समस्याएं लोगों को कम परेशान करती हैं। शासन-प्रशासन पर अच्छा काम करने के लिए एक नैतिक दबाव होता है।
 
30 लाख से ज्यादा गैर-सरकारी संगठन या एनजीओ देशमें बने हुए हैं।   41% फीसद एनजीओ ही भारत में समाजसेवा के लिए कार्य करते हैं।
 
क्या है इनका लक्ष्य
देश और समाज को रास्ता दिखाना। कानून-व्यवस्था और विकास के अनुकूल स्थितियों को संबल देना, गरीबों-शोषितों की आवाज बनना। भ्रष्ट लोगों को निशाना बनाना, ईमानदारों को व्यवस्था के अंदर सशक्त करना, लेकिन यह दुर्भाग्य की बात है, ज्यादातर एनजीओ भटक चुके हैं, एकजुट नहीं हैं। स्वार्थ पूर्ति और सेवा का दिखावा करके पैसे और ताकत अर्जित करना इनका लक्ष्य हो गया।
 
94 हजार करोड़ से ज्यादा राशि भारतीय एनजीओ ने हासिल की 1993-2010 के बीच।   03 बड़े धनदाता भारतीय एनजीओ के लिए यूएस, जर्मनी और यूके रहे हैं।
 

क्या होना चाहिए

देश के करीब आधे एनजीओ या 15 लाख एनजीओ भी अगर ढंग से काम करें, तो देश का कायाकल्प हो सकता है। किसी भी नागरिक को तभी सिविल सोसायटी का हिस्सा बनना चाहिए, जब उसमे स्वार्थ से परे समाज के हित देखने की अत्यधिक आकांक्षा हो। इस सोसायटी को राजनीति से दूर रहकर एक दबाव समूह के रूप में काम करना चाहिए या वैचारिक-सामाजिक ताकत बनना चाहिए।
 

हम भारत के लोग

 
हम कैसे नागरिक हैं
यह व्यवस्था लोगों की, लोगों के लिए, लोगों के द्वारा बनाई गई है। भारतीय संविधान अपने नागरिकों को बहुत आजादी देता है, इतनी आजादी शायद ही किसी अन्य देश के नागरिकों को मिली है। किन्तु सबसे भयानक बात यह है कि भारतीय नागरिक को खूब अधिकार मिले हुए हैं, लेकिन उसकी जवाबदेही सुनिश्चित नहीं है। संविधान की हमसे जो उम्मीदें हैं, उसे हम पूरी नहीं कर रहे हैं।
 
नागरिकों का लक्ष्य क्या है
हमारे देश में ज्यादातर लोग अपने बारे में, अपने परिवार, अपनी बिरादरी के बारे में ही सोचते हैं। एक बड़ी आबादी है, जिसका लक्ष्य केवल पैसे कमाना है। जिन नागरिकों ने संविधान की शपथ ली है, उनमें से कई सामान्य नागरिक के कत्तüव्य भी पूरे नहीं करते। नागरिक समाधान बनने की बजाय स्वयं समस्या बनते जा रहे हैं, असंख्य अनुत्पादक नागरिक देश के लिए बोझ बन गए हैं।
 
क्या होना चाहिए
देश और देश के लिए काम हर एक नागरिक की जिम्मेदारी है। यह जिम्मेदारी टल नहीं सकती, इस जिम्मेदारी को निभाकर ही हम देश को विकास की ओर ले जा सकते हैं। व्यवस्था में नागरिकों की भागीदारी बढ़ने के साथ-साथ नागरिकों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। एक-एक नागरिक को सकारात्मक बदलाव का वाहक बनना होगा, समाज और देश को कुछ न कुछ योगदान देना होगा।
 

हमारी पढ़ाई

 
हमारी पढ़ाई कैसी है
मै कालेवादी शिक्षा प्रणाली केवल "बाबू" तैयार करने में लगी है। ऎसे "बाबू" तैयार हो रहे हैं, जिनमें नैतिकता या तो नहीं है या बहुत कम है। पश्चिमी पद्धति, पश्चिमी पाठयक्रम, पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान को अंतिम सत्य मान लिया गया है। पढ़ाई न तो भारतीय होने का कत्तüव्य बोध करा रही है और न यह बता रही है कि इस दुनिया में एक भारतीय होने का क्या विशेष अर्थ है।
 
पढ़ाई का लक्ष्य क्या है
अभी पढ़ाई की कुल उपयोगिता ही यही है कि नौकरी दिला दे। जो पढ़ाई नौकरी नहीं दिला सकती, उसे खत्म किया जा रहा है, भले ही वह पढ़ाई भारत के लिए कितनी ही उपयोगी क्यों न हो। पढ़ाई का लक्ष्य पैसे बनाने की मशीन पैदा करना है। अलग-अलग प्रकार के संस्थान हैं, अलग-अलग प्रकार की पढ़ाई, जिससे असमानता, अन्याय और अत्याचार के लिए जमीन तैयार होती है।
 
क्या होना चाहिए
पढ़ाई ऎसी होनी चाहिए, जो सभ्य-सुसंस्कृत पीढ़ी तैयार करे। भारतीयता और भारतीय परंपराओं को सशक्त करने वाली पढ़ाई होनी चाहिए, जो भारत को अमरीका न बना दे। यह दुखद है, अमरीका हमसे सीख रहा है और हम अमरीका के दीवाने हो गए हैं। पढ़ाई ऎसी होनी चाहिए, जो उद्यमी-मेहनती युवा तैयार करे, नौकरी के लिए लालायित भीड़ या बेरोजगारों की फौज नहीं।
 

आगे रास्ता किधर से गुजरेगा

 
्यवस्था को जवाबदेह बनाने के लिए एकजुट होना होगा   समाज के साथ मिलकर चले सिविल सोसायटी
 
एक अच्छा देश बनाने के लिए राजनीतिक, प्रशासनिक और चुनाव सुधार आज की सबसे बड़ी जरूरत हैं। इसमें आम आदमी और सिविल सोसायटी की अहम भूमिका है।   सि विल सोसायटी की आधुनिक भारत के निर्माण में अहम भूमिका रही है। समय-समय पर देश में आंदोलन होते रहते हैं, जो कि नागरिक हितों को सुरक्षित रखते हैं।
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लोगों को उनकी भाषा में शिक्षित, जागरूक कीजिए
 
शिक्षा के क्षेत्र में हमें ज्यादा काम करने पड़ेंगे। शास्त्र में जो चिंतन है, उसे आज के समाज के सामने रखने की आवश्यकता है। उस भाषा में लोगों को बताना-समझाना होगा, जो भाषा लोग ठीक से समझते हैं।
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भा रतीय सिनेमा आज के दौर में समाज को क्या दे रहा है या उसने अब तक क्या दिया है, जब भी यह बात उठती है, इसी उद्योग के लोग इसे विषय मानने से इनकार कर देते हैं। मुझे यह कहते हुए शर्म आती है कि आज के दौर में अगर कोई ऎसी बात करता है, तो वह केवल हंसी का ही पात्र कहा जाता है।
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पिछले बीस-तीस साल में देश की राजनीति में दो महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं। पहला अर्थव्यवस्था उदार हुई है, तो दूसरा देश की राजनीति गठबंधन आधारित हो गई है।
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न्यायालय को न्याय का मंदिर कहा जाता है और लोग न्याय की आस लेकर आते हैं, लेकिन अब अदालतें और न्यायपालिका ने अपना भरोसा खो दिया है। छोटे से छोटे और बड़े से बड़े मामले सालों लटका कर रखे जाते हैं।
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देश के श्रेष्ठतम शिक्षित वर्ग के लोग नेताओं की स्वार्थ सिद्धि में जुड़कर अपना पेट भर रहे हैं। धत् ऎसी जिन्दगी की!
एन. एन. वोहरा समिति
जुलाई 1993 में नरसिम्हा राव सरकार में गृह सचिव एन. एन. वोहरा के नेतृत्व में सरकारी व्यवस्था और राजनेताओं में बढ़ते भ्रष्टाचार और अपराधीकरण का जायजा लेने के लिए एक समिति का गठन किया था। इस समिति ने देश में व्यवस्था की बहुत प्रतिकूल स्थिति बताई थी। वोहरा कमेटी की रिपोर्ट इतनी सनसनीखेज थी कि कांट-छाट कर उसके एक हिस्से को ही संसद में पेश किया गया। सबसे चिंताजनक बात यह थी कि रिपोर्ट ने देश में सरकार के समानांतर अपराधियों की एक सरकार के बारे में बताया था, जिसमें नेता अपराधी और व्यवसायी बराबर के भागीदार थे। एन. एन. वोहरा की वो रिपोर्ट भुला दी गई।
 
संविधान समीक्षा के लिए बना आयोग
वर्ष 2000 में जस्टिस एम. एन. वैंकेटेचलैया की अध्यक्षता में संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग बना था। जिसने इन बातों को प्रमुखता से उठाया:
1. देश मे राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली और उसके संचालन पर नियंत्रण के लिए ऎसा कानून लाया जाए, जिसमें पार्टियां उन्हें मिलने वाले धन और उनके खर्चो का पूरा ब्योरा रखने को बाध्य हों।
2. न्याय में देरी, इसकी लागत और अनिश्चितता ने हताशा को जन्म दिया है। लोग राहत के न्याय से इतर अन्य रास्ते तलाशने को बाध्य हो रहे हैं।
3. सांसदों को भी संसदीय ओम्बुड्समैन के जरिए जांच के लिए तैयार रहना चाहिए।
 
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