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| Last updated - Mon, Sep 06, 2010
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फिर एक जनरल का राज!
क्या विडम्बना है, पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल अशफाक परवेज कियानी का तीन साल के लिए कार्यकाल बढ़ाने पर वहां की मीडिया की ओर से ही दो अहम् प्रतिक्रियाएं आई हैं। एक स्तम्भकार ने लिखा कि हालांकि प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने केवल तीन मिनट के राष्ट्र के नाम सम्बोधन में यह घोषणा की। स्तम्भकार के अनुसार, "उनके इस कथन के आधार पर कई ग्रन्थ लिखे जा सकते हैं कि पाकिस्तान में सत्ता किसके हाथ है।" डॉन ने लिखा, "अंतिम बार नागरिक शासन ने जिस सेना प्रमुख को सेवा विस्तार दिया था, वह थे जनरल अय्यूब खान।" पाकिस्तानियों के यह विचार वाकई में व्याकुल कर देने वाले हैं।
हालांकि जनरल कियानी का सेवा विस्तार सम्भावित था, लेकिन तीन साल का कार्यकाल बढ़ाना एक तरह से अर्थपूर्ण है। इससे यही लगता है कि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की निष्प्रभावी नागरिक सरकार अपना शेष कार्यकाल पूरा करेगी। इस बात की चर्चाएं भी जोरों पर हैं कि सेना प्रमुख और सत्तारूढ़ नेतृत्व में इस तरह का कोई समझौता हुआ है कि वर्तमान गठजोड़ को वर्ष 2013 तक बिना छेडे जारी रखा जाए। वर्ष 2013 में चुनाव होना हैं।
साफ है कि विपक्ष और मुस्लिम लीग (नवाज) के नेता नवाज शरीफ इस घोषणा से खुश नहीं हुए होंगे। उनकी पार्टी पाकिस्तान के अग्रणी प्रान्त पंजाब में काबिज है। आश्चर्यजनक रूप से शरीफ ने जब खुद की इच्छा से जनरल परवेज मुशर्रफ को सेना प्रमुख बना दिया था, तब वह सेना में पूरी तरह संदिग्ध हो गए थे। अधिकृत सूत्र बताते हैं कि हालांकि यह सम्भव है कि उनके छोटे भाई शाहबाज शरीफ, जो पंजाब के मुख्यमंत्री भी हैं, ने उन पर दबाव डाला हो कि वे जनरल कियानी के चरमोत्कर्ष का विरोध न करें। जनरल कियानी के कार्यकाल विस्तार की आधिकारिक घोषणा नवम्बर से पहले किसी भी समय की जा सकती है, जो दिलचस्प भी होगी। नवम्बर में उनका कार्यकाल खत्म होगा। इस्लामाबाद में आधिकारिक सूत्रों ने इस बात से इनकार किया है कि भारत-पाक विदेश मंत्री स्तरीय वार्ता के दिग्भ्रमित होने और अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन की पाकिस्तान यात्रा से जनरल कियानी के सेवा विस्तार का कोई लेना-देना है। हिलेरी पाकिस्तानी नेताओं से विचार-विमर्श करने के बाद काबुल रवाना हो गई थीं। यह बात अलग है कि अमेरिका कियानी को पसन्द करता है और उन पर बहुत विश्वास करता है। अमेरिका चाहता था कि उनका कार्यकाल बढ़े। यह मात्र संयोग नहीं हो सकता कि अमेरिकी सेना के अगुआ निरन्तर उनके साथ इस्लामाबाद में विचार-विमर्श करते रहे हैं। इतना ही नहीं, हिलेरी क्लिंटन भी अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी या प्रधानमंत्री गिलानी के बजाय जनरल कियानी के साथ ज्यादा समय व्यतीत करती हैं।
पाकिस्तान के लोकतंत्र का इतिहास 1958 से ही अनोखा रहा है, जब अय्यूब सत्ता पर काबिज हो गए थे। तब से लेकर जो भी गद्दी पर बैठा है या तो सैन्य वर्दी के बल पर बैठा या सैन्य वर्दी उसका रक्षा कवच रही। हालांकि बीच-बीच में नागरिक शासन भी आया। 1971 में बांग्लादेश में सेना के मानमर्दन के बाद किसी ने यह नहीं सोचा था कि सेना फिर सिर उठा सकेगी। दिसम्बर 1973 में मैं पाकिस्तान गया था। वहां मैं जिन लोगों से मिला, लगभग सभी का यही मानना था कि जनरल निर्वाचित प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को पद से ढकलने वाले हैं। चार साल से कम समय में ही जिया-उल-हक ने उन्हें गद्दी से बेदखल कर दिया और मात्र दो साल बाद ही उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया। जनरल परवेज मुशर्रफ का शासन तो शताब्दी के बदलने के दौरान आया।
इस बात का श्रेय निश्चित ही जनरल कियानी को है कि उन्होंने पाकिस्तान में मुशर्रफ के राजनीतिक ढांचे में कोई दखलंदाजी नहीं की, लेकिन उन्हें सेना मुख्यालय से नीतियों को क्यों निर्देशित करना चाहिए? यह किसी को नहीं भूलना चाहिए कि जरदारी जब आईएसआई का नियंत्रण सेना से हटाकर रहमान मलिक के नेतृत्व वाले आन्तरिक मंत्रालय को सौंपना चाहते थे, तो जनरल कियानी ने विरोध किया था। मामला यह था कि मलिक जरदारी के निकट सहयोगी थे, जबकि जनरल उन्हें नापसन्द करते थे। एक समय तो सेना प्रमुख ने आन्तरिक मंत्री को सेना मुख्यालय में प्रवेश की अनुमति देने से इनकार कर दिया था।
पाक सेना का मुखिया कौन होगा, कितने समय तक रहेगा, यह वहां की सरकार का आंतरिक मामला है। लेकिन सवाल है कि कियानी के सेवा विस्तार पर भारत को क्या करना चाहिए। गुप्तचर एजेन्सी "रॉ" के पूर्व एडीशनल चीफ और चतुर विश्लेषक बी. रमन का मानना है कि भारत को इस पर चिन्ता जताना चाहिए। जनरल कियानी के कार्यकाल में भारत के खिलाफ पाक आतंककारियों की करतूतों में कोई कमी नहीं आने वाली। अमेरिकी सेना और चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी दोनों के नेतृत्व से कियानी के निकट सम्बन्धों के परिणामों को भी सामने लाना चाहिए।
इन्दर मल्होत्रा
जाने-माने पत्रकार
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