गुजरा साल भी सहेजिए

सलीके से सहेजें तो उदासी की कविता नहीं, उजाले का गीत हो जाता है गुजरा हुआ साल। कहने को भले ही कह दिया जाता हो कि "बीती ताहि बिसार के, आगे की सुधि लेय" लेकिन वास्तविकता तो यह है कि बीती को बिसारकर नहीं, बल्कि बीती को सहेजकर ही आगे की सुध ली जा सकती है। इस दृष्टि से देखें तो अतीत को सहेजना भविष्य को देखना है।
समय की सड़क पर मील का पत्थर है गुजरा हुआ साल। मील का पत्थर बतलाता है कि मंजिल कितनी पास या दूर है। मंजिल की पहचान के लिए मील के पत्थर का निशान लगाया जाता है, मिटाया नहीं जाता। भविष्य की बेहतरी के लिए गुजरा हुआ साल सहेजना चाहिए, फेंकना नहीं।
एक और साल जा रहा है और नए साल की दस्तक है। ऎसे में साल के बचे चंद दिनों में उन मोतियों को चुनिए जो हमारे दामन में
यह साल बिखेर कर जा रहा है।
सत्कर्म का स्वा