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साहित्यकार समाज को प्रेरित करें
भारतीय ज्ञानपीठ का मूर्तिदेवी पुरस्कार नि:संदेह एक ऎसा प्रतिष्ठित साहित्यिक सम्मान है, जिसे पाना गर्व की बात है। इसे हमारे साहित्यिक और संास्कृतिक विविधता और समृद्ध विरासत का ध्वजवाहक माना गया है। इस अवसर पर मैं 25वें मूर्तिदेवी पुरस्कार विजेता डॉ. गुलाब कोठारी जी को उनकी कृति "मैं ही राधा, मैं ही कृष्ण" के लिए बधाई देना चाहूंगी। डॉ. कोठारी,विचारक,आलोचक और साहित्य के गम्भीर अध्येता और लेखक हैं। उन्होंने कई पुस्तकें लिखी हैं। उनकी भाव प्रवण कृतियां निरंतर जनचेतना को स्फूर्त करती रही हैं। राजस्थान पत्रिका समाचार पत्र समूह के मुख्य सम्पादक के रूप में डॉ. कोठारी की पत्रकारिता और लेखन सामाजिक जागृति और परिवर्तन की दिशा में समर्पित रहे हैं।


हमारी विरासत सांस्कृतिक विविधताओं से सम्पन्न और समृद्ध रही है। भारतीय साहित्य में दार्शनिक एवं शास्त्रीय ग्रन्थों के अलावा नाटकों,लघु कथाओं, उपन्यासों,निबन्धों, कथा साहित्य आदि की एक लम्बी और यशस्वी परम्परा रही है। कालिदास,भवभूति और बाणभट्ट की ख्याति तो देश की सीमाएं लांघ कर विश्व साहित्य में चर्चित रही है। श्रेष्ठ साहित्य कालजयी होता है तथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी हर युग को प्रेरित करता रहता है। हम सभी जानते हैं कि जातक और पंचतंत्र की लोककथाएं आज भी हमें मंत्रमुग्ध कर देती हैं।

हम न केवल मध्यकालीन सूरदास,तुलसीदास,कबीर,जायसी,रहीम,रसखान बल्कि आधुनिक काल में जयशंकर प्रसाद,सुमित्रानंदन पंत,सूर्यकांत त्रिपाठी निराला,मुंशी प्रेमचंद,महादेवी वर्मा,मैथिलीशरण गुप्त और रामधारी सिंह दिनकर जैसे अनेक सुप्रसिद्ध साहित्यकारों की प्रेरणादायी कृतियों से आनंदित होते रहे हैं,क्योंकि उनकी रचनाओं में उनके समय के चित्रण के साथ-साथ भावपूर्ण संदेश होते हैं,जो देश काल की सीमा से परे हैं। कला एवं साहित्य के क्षेत्र में काव्य मनुष्य की कोमल और उदात्त मनोभावों की सरस अभिव्यक्ति है।


डॉ.कोठारी द्वारा रचित यह कृति संस्कृत के तžवों के सभी सम्भव स्वरूपों के प्रस्तुतीकरण का स्तुत्य प्रयास है। उनकी पुस्तक "मैं ही राधा, मैं ही कृष्ण" काव्य रूप में रचित एक उत्कृष्ट दार्शनिक आख्यान है जिसमें इस धरती पर जीवन के वास्तविक अर्थ की व्यंजना है। हमारी साहित्यिक परम्परा और विरासत में राधा और कृष्ण से सम्बन्घित कथाओं और आख्यानों का विशाल भण्डार है। उनके उल्लेख के बिना हमारे ललित साहित्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती। मुझे विश्वास है कि डॉ. कोठारी की यह मौलिक कृति हमारी ज्ञान सम्पदा में अभिवृद्धि करेगी।

पाठक राधा-कृष्ण के आख्यान पर आश्रित इस रसात्मक, दार्शनिक साहित्यिक रचना का आनंद लेंगे। डॉ. कोठारी के व्यक्तित्व का एक और पक्ष है, जिसकी चर्चा करना चाहूंगी। और यह भी बताना चाहूंगी कि मूल रूप से मैं यहां इसलिए आई हूं क्योंकि मैंने उनका वह पक्ष देखा है। कई वर्ष हुए, मैं उस समय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री थी। जगह-जगह नि:शक्त व विकलांग जनों के लिए शिविर लगा कर उनकी सहायता करने का प्रयास करती थी।

इसी शृंखला में जयपुर में एक शिविर लगाया गया। उसमें नि:शक्त बच्चे और उनके माता-पिता व अभिभावक शामिल थे। अन्य संगठन जो इस क्षेत्र में कार्य करते हैं वे भी आए थे। उन सब के बीच में मैंने एक व्यक्ति को देखा जो किसी भी प्रकार से इस शिविर के आयोजन से जुड़े हुए नहीं थे। न तो वे इन संगठनों से जुड़े हुए थे, न वे अभिभावक थे और न ही विकलांग बच्चों के माता-पिता थे। मुझे बताया गया कि वे राजस्थान पत्रिका के सम्पादक हैं। तब ही से मैं उनसे प्रभावित हुई और सोचा जो भी वे हों, बहुत संवेदनशील हैं। अगर वे समय निकाल कर इस छोटे से शिविर में आ सकते हैं तो वे जब भी,जहां भी, कभी भी मुझे बुलाएंगे तो मैं जरूर आऊंगी।


बिना संवेदनशील हुए लेखक हुआ ही नहीं जा सकता। संवेदनशील तो होना पड़ेगा। मैं हमेशा सोचती हूं कि हमारे यहां संवेदनशीलता की पराकाष्ठा को हमने अपनी धरोहर बना कर आगे बढ़ाया है। कहते हैं कि पहला छंद वाल्मीकि ने जलाशय से कमल पत्र को तोड़कर लिखा था- क्रौंच पक्षी की मौत से विगलित होकर। क्रौंच पक्षी को बहेलिए ने मार दिया और दूसरा जो उसका साथी था, वह स्वयं ही मर कर गिर गया। वाल्मीकि इतने संवेदनशील थे कि उन्होंने उसको लेकर रचना कर डाली। कहते हैं कि वो विश्व का पहला छंद है। कितने भी कठोर होकर हम मानव की पीड़ा पर आंसू बहा देते हैं, मगर उस कवि ने तो प्राणि मात्र की पीड़ा पर आंसू बहा दिए। कितनी बड़ी धरोहर है पीड़ा। दूसरे की पीड़ा और वो भी एक ऎसे पक्षी की पीड़ा जिसकी कोई गिनती ही नहीं है।

हमारा उत्कृष्ट साहित्य पीड़ा का ही साहित्य है। वह अनुरंजन का साहित्य नहीं हो सकता। जो अन्दर से निचोड़ कर रख दे,ऎसा साहित्य हो सकता है। एक चीज और मेरे मन में आती है। कहते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण है। क्या साहित्य सिर्फ समाज का दर्पण है? जब आजादी की लड़ाई लड़ी जा रही थी तब बंकिमचंद्र ने "आनंदमठ" लिखा। वह प्रेरणा ग्रंथ बन गया। साहित्य का दर्पण नहीं रहा। उसने कई पीढियों को प्रेरित कर दिया। वन्दे मातरम और आजादी की लड़ाई में अपना सब कुछ झोंक देने के लिए। मैं समझती हूं कि साहित्य मात्र समाज का दर्पण नहीं हो सकता। इसे निरंतर समाज को प्रेरणा देनी होगी। समाज को आगे ले जाना होगा। हर शर्त पर। और इस समय तो सबसे जरूरी हो गया है।


मूल्यों का ऎसा ह्रास व इतनी गिरावट मैंने नहीं देखी। इस समय हम यह कह कर मूकदर्शक बन कर नहीं रह सकते कि साहित्य, केवल समाज का दर्पण है। अभी तो एक ही चीज पर मैं बात कर रही हूं। अभी जो घटना (दिल्ली में छात्रा से दुष्कर्म) घटी है स्त्री के अपमान की, वह मूल्यों में गिरावट की पराकाष्ठा है। मैं नहीं जानती किसी देश में और कहीं स्त्री के इतने रूप हैं। स्त्री की पूजा की जाती है। छोटी-छोटी बçच्चयों को आम जन साल में दो दफा बैठा कर, उनकी पूजा करते हैं। पैर धोते हैं। आरती उतारते हैं। उनसे आशीर्वाद लेते हैं। यह इसी देश में होता है। और इसी देश में कन्या भू्रण हत्या कर दी जाती है। बहू को दहेज के लिए जला दिया जाता है। ऑनर किलिंग की जाती है। लड़के-लड़कियों के बीच भेद किया जाता है।

मुझे इस बात की गहरी चिन्ता हो रही है कि हमारे मूल्य आज क्या हो रहे हैं। मां और स्त्री का सम्मान नहीं कर पा रहे। मैंने तो बहुत से लोगों से कहा यह आक्रोश बहुत अच्छा है। आक्रोश आना भी चाहिए। आक्रोश हिंसा में न बदल जाए ऎसी सीमा रेखा जरूर खींच कर रखें।

हमारी मानसिकता को भी थोड़ा बदलना होगा। समाज में क्या हम इस स्तर तक पहुंचे हैं कि किसी बच्ची का बलात्कार हो गया है तो उसे सहर्ष सम्मान के साथ घर की बहू बना सकें? आक्रोश क्या हमें इस ऊंचाई तक ले जाता है? हमें सोचना होगा। यही तो साहित्य की भूमिका है। इसीलिए मैं कह रही हूं कि नैतिक मूल्य इस समय तेजी से रसातल की ओर चले जा रहे हैं। उन्हें साहित्यकार खींच कर बाहर ले आएं। साहित्यकार और बुद्धिजीवी वर्ग के सामने यह बहुत बड़ी चुनौती है।


मीरा कुमार लोकसभा अध्यक्ष (पत्रिका समूह के प्रधान सम्पादक गुलाब कोठारी को मूर्तिदेवी सम्मान दिए जाने के अवसर पर दिया गया उनका उद्बोधन)
 
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