श्रम बाजार से "लापता" होती देश की महिलाएं

तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का दम भरने के बावजूद भारत के श्रम-बाजार से लाखों महिलाओं के कदम लौट कर घर की चौहद्दी तक सिमट रहे हैं। इनमें से एक करोड़ 27 लाख महिलाओं के हाथ में स्नातक या इससे ज्यादा की डिग्री है। श्रम बाजार से एक बार फिर घरेलू दायित्वों की तरफ लौटने के लिए आर्थिक से लेकर सामाजिक कारण जिम्मेदार हैं, जिनमें पुरूष सहकर्मियों के बराबर वेतन या भुगतान नहीं मिलना जैसा भेदभाव शामिल हैं।
एक हालिया अनुसंधान में प्रख्यात अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन की भारत की जनसंख्या में "मिसिंग विमिन" की अवधारणा को भारत की वर्कफोर्स में "लापता महिलाएं" के संदर्भ में प्रस्तुत करते हुए लिखा गया है, "सन 2009-10" में भारत में घरेलू कार्यो में लगी महिलाओं की संख्या 216 मिलियन थी, जो ब्राजील की कुल आबादी से भी ज्यादा है।"
एक सोशल साइंस जर्नल में हाल में प्रकाशित हुए इस रिसर्च पेपर में लेखक जयान जोस थॉमस ने लिखा है, "श्रम बाजार से लापता हुई इन महिलाओं में 37 मिलियन महिलाएं 10वीं या 12वीं तक पढ़ी हुई हैं, जबकि 12.7 मिलियन महिलाओं के पास स्नातक या इससे ज्यादा की डिग्री है, जबकि उनके पास इसका कोई व्यावसायिक उपयोग नहीं रह गया है और और वे घरेलू जिम्मेदारियां निभाने में जुटी है।"
ठेका-श्रमिक ज्यादा उच्च पद कम
रिसर्च में बताया गया है कि हाल के वर्षो में उच्च पदों पर महिलाओं की हिस्सेदारी बहुत कम पाई गई हैं। दो हजार के दशक में फाइनेस, रीयल स्टेट और बिजनिस सर्विस जैसे क्षेत्रों में महिलाओं के लिए केवल 20 फीसदी पदों का सृजन हुआ है। दूसरे शब्दों में 5.2 मिलियन महिलाओं में से सिर्फ 9 लाख महिलाएं ही इन क्षेत्रों में काम पा सकी थी। जहां तक कम्प्यूटर या ऎसी ही किसी तकनीकी गतिविधि से जुड़े काम हैं, दो हजार के दशक के आखिरी पांच वर्षो में 9, 80 हजार महिलाओ में से सिर्फ एक लाख या लगभग 10 फीसदी महिलाओं ने ही श्रम बाजार में हाथ बंटाया। निर्माण जैसे क्षेत्रों में महिलाओं के लिए अस्थायी रोजगार या ठेका-श्रमिकों के रूप में जरूर काम बढ़ा है, जो दो हजार के दशक के मध्य में बहुत कम हो गया था।
इनमें मनरेगा जैसी योजनाओं का हाथ रहा, लेकिन यह भी कोई बहुत आशाजनक स्थिति नहीं है। दूसरे शब्दों में उच्च गुणवत्ता वाले कार्यो से महिलाओं को दूर रखा जा रहा है या अपने सामाजिक-आर्थिक कारणों, घरेलू जिम्मेदारियों की वजह से वे स्वयं इन कामों से दूर हो गई हैं। श्रम बाजार में इन महिलाओं की कमी खलती है। रिसर्च के अनुसार "दुनिया की कोई भी अर्थव्यवस्था महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के बिना तरक्की नहीं कर सकती। इसलिए महिलाओं को तरक्की के मौके दिए जाने चाहिए।"
सामाजिक वर्जनाएं भी
बांध रही पांव
घर के बाहर महिलाओं की गतिविधि पर पति या परिजनों की ओर से लगाए गए प्रतिबंध भी श्रम बाजार में महिलाओं की कमी का एक बड़ा कारण है। रिसर्च में कहा गया है कि "यह एक विडम्बना ही है कि शहरी भारत में शिक्षा और आधुनिकीकरण का दम भरने के बावजूद देश में महिलाएं अपनी इच्छा से श्रम बाजार में अपना योगदान नहीं दे सकती। दूसरी तरफ रिसर्च में यह भी कहा गया है कि ग्रामीण महिलाओं को शहरी शिक्षित महिलाओं की अपेक्षा अपने परिजनों की अनुमति लेने जैसे मसले से ज्यादा जूझना होता है।
घरेलू दायित्वों का बोझ
बढ़ने नहीं देता
परिजनों की टोकाटाकी के अलावा महिलाओं पर घरेलू दायित्वों का बोझ भी है। इनमें संपूर्ण परिवार की संभाल शामिल हैं, जिसमें अकसर पुरूष सक्रिय भूमिका का निर्वाह नहीं करते। उन्हें घर के कामों से इतना समय नहीं मिल पाता कि वे श्रम बाजार में योगदान देकर अपना आर्थिक पक्ष मजबूत कर सकें।
महिलाओं में रोजगार में विशुद्ध वृद्धि (लाख में)
क्षेत्र 1993-94 से 1999-2000 2004-05 से
1999-2000 से 2004-05 2009-2010
कृषि, शिकार, वानिकी, मत्स्यपालन -11 143 -216
विनर्माण 8 37 -31
खाद्य उत्पाद, पेय पदार्थ, तम्बाकू उत्पाद 7 -1 -2
कपड़ा, परिधान और चमड़े के उत्पाद -1 24 -12
निर्माण 4 8 37
रेस्तरां, होटल, थोक और खुदरा व्यापार 15 9 -4
परिवहन, भंडारण और संचार 2 2 -1
वित्त, बीमा, अचल सम्पत्ति और व्यापार 0 5 4
कम्प्यूटर और संबंधित गतिविधि - 1.2 1.0
सामुदायिक, सामाजिक और व्यक्तिगत सेवाएं 4 44 -3
लोकप्रशासन और रक्षा सेवाएं -1 -1 4
शिक्षा, विज्ञान और अनुसंधान 5 21 2
व्यक्ति सेवा या दूसरी सेवाएं -7 23 -8
कुल गैर कृषि वर्कर में वृद्धि का हिस्सा 14 25 2
स्त्रोत : इंडियाज लेबर मार्केट डयूरिंग द 2000, रिसर्च: जयान जोस थॉमस
शिक्षा बढ़ी लेकिन उपयोग नहीं
देहात से लेकर शहर तक लड़कियों के माध्यमिक स्कूल में नामांकन बढ़े हैं, लेकिन यह पढ़ाई उनके जीवन को आर्थिक रूप से बेहतर बनाने में अपना योगदान नहीं कर पा रही। अधिकांश महिलाएं आज भी चूल्हा-चौकी की अपनी पारम्परिक भूमिका में नजर आ रही है।
अमित पुरोहित