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लोग कहेंगे,मैंने अच्छा नेतृत्व किया
अपनी कोशिश, परिश्रम और नेतृत्व से टाटा समूह को एक नई दिशा दिखाने वाले रतन टाटा ने हाल ही इस समूह के मुखिया पद से अवकाश ले लिया है। लगभग 74 वर्ष के रतन टाटा ने दो दशक से ज्यादा समय तक समूह के अध्यक्ष का पद संभाला है। रतन टाटा से मिलने के लिए मैं उनके मुख्यालय दोपहर में चाय के समय पहुंचा था। ऊनी सूट पहने टाटा ने गाढ़ी नीली टाई लगा रखी थी और वे लगातार मुस्कुरा रहे थे। वे बेहतरीन अमरीकी उच्चारण के साथ अंग्रेजी बोल रहे थे।

1991 में टाटा ने विश्वविद्यालय छोड़कर परिवार के व्यवसाय में सहभागिता आरंभ की और आरंभ में कंपनी में शॉप फ्लोर पर काम करते हुए अपने चाचा जेआरडी के बाद चेयरमैन बने, जो आधी सदी से भी ज्यादा समय तक पूरे समूह के इंचार्ज रहे। यह वही साल था, जब भारत अपनी अर्थव्यवस्था से दुनिया को परिचित करवा रहा था और कंपनी व देश दोनों में बड़े पैमाने पर विकास आरंभ हुआ, जिसका परिणाम है कि आज इस कंपनी की उपस्थिति 80 से ज्यादा देशों में दिखाई देती है। 150 साल पहले एक छोटी सी टेक्सटाइल और ट्रेडिंग कंपनी के रूप में उद्योग जगत में कदम रखने वाली यह कंपनी आज देश के महत्वपूर्ण व्यावसायिक घरानों की सूची में शामिल है, जो स्टील और कार से लेकर पावर प्लांटों और आईटी आउटसोसिंüग तक के व्यवसाय पूरी शिद्दत से कर रही है।

भले ही यह समूह विश्व भर में ग्लोबल कंपनियों में शामिल है, पर यह अब भी यह अन्य समूहों से सबसे अलग है, जिसके मालिकाना हक की संरचना में मुख्य धारा की कंपनी, टाटा संस के साथ-साथ 100 से अधिक कंपनियां कार्यरत हैं। टाटा संस का दो-तिहाई हिस्सा एक चैरीटेबल ट्रस्ट द्वारा चलाया जाता है, जिसने पिछले साल लाभांश में 100 मिलियन डॉलर से अधिक की राशि का योगदान दिया है।

अलग मिजाज के हैं टाटा
रतन टाटा भारतीय उद्योगपतियों के समूह से अलग हैं। अपने पहले दशक में ग्रहण किए गए पद के समय को याद करते हुए वे बताते हैं, "एक दौर वह था जब समूह के नियंत्रण को केंद्रीकृत करने के लिए लगातार आंतरिक लड़ाई लड़नी पड़ी और धीरे-धीरे इसकी परफॉर्मेन्स बढ़ी।" हालांकि उनका दूसरा दशक वैश्विक रोमांच से भरा रहा क्योंकि इस दौरान टाटा अपनी कंपनी को विदेशों तक ले गए, जिनका लक्ष्य था भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था को सहारा देना।

यह खासतौर पर ब्रिटेन में सच था, क्योंकि वहां इस समूह ने खुद को सबसे बड़ी निर्माता कंपनी और रोजगार देने वाली कंपनी के रूप में स्थापित किया, जहां टाटा ने आकर्षित करने वाले अधिग्रहणों के साथ-साथ 2007 में स्टीलमेकर कंपनी कोरस की खरीदारी और एक साल बाद ब्रिटिश कार निर्माता कंपनी जगुआर लैंड रोवर का अधिग्रहण किया। यह एक तरह से कंपनी का विस्तार था। वे कहते हैं, "मैंने महसूस किया कि यद्यपि हम वह सफलता प्राप्त नहीं कर सके, जितनी हमें करनी चाहिए थी।

मैं भारत की परेशानियों और पिछड़ेपन को अपनी पूंजी से दूर करने की इच्छा रखता हूं।" इसी समय वेटर चांदी का कप और गाढ़े भूरे रंग के आलूबुखारे का केक ट्रे में लिए आते हैं। जिस गति से उन्होंने चाय को कपों में डाला, मैंने अब तक देखा नहीं था। शायद वह शिकायत करने के आदी नहीं थे। जो लोग टाटा की सरलता के बारे में बातें करते हैं, उनके अनुसार वह अपने लिए इंतजार कर रहे लोगों का विनम्रता से धन्यवाद करते हैं।

मैंने उन परियोजनाओं के बारे में पूछा, जिनसे टाटा व्यक्तिगत रूप से जुड़े रहे, नैनो, एक बेहद सस्ती कार, जो भारत के गरीबों के लिए उपयुक्त हो। यह चेयरमैन का अपना प्रोजेक्ट था, जो ऑटोमोबाइल के शौकीन हैं, पर इसे साल 2009 में लांचिंग से काफी सोच-विचारकर बेचा गया।

मैंने केक का छोटा सा टुकड़ा खाया। टाटा ने वह केक छुआ तक नहीं, पर वे शांति से चाय के घूंट पीते रहे। जब मैंने उनसे भारत और इसमें तेजी से होने वाले परिवर्तन के बारे में पूछा तो वे बोले, "मैंने महसूस किया है कि भारत ऎसा देश है, जिसमें क्षमता की कमी नहीं है, यहां सफल होने के लिए पर्याप्त प्रतिभा है। पर आप शांति से सोचें, क्या यह सफल हो पाया है? आपको यहां असंतुलन दिखाई देगा।"

भारत एक बड़ा बाजार
टाटा ने ऊर्जा की कमी से लेकर जमीन अधिग्रहण तक ऎसी कई नीतियों का जिक्र किया, जिनसे व्यवसाय को हानि होती है। ऎसे कई कारण रहे हैं कि उनके समूह को विकास के लिए विदेशों में भी जाना पड़ा। सबसे पहले यूरोप में। वे कहते हैं, "भविष्य में हम अफ्रीका और एशिया के दूसरे देशों में भी जा सकते हैं। अगर हमें उद्योग में इसी तरह का प्रोत्साहन मिलता रहा। मैं सोचता हूं कि भारत चीन के साथ निश्चित रूप से मुकाबला कर सकता है। निश्चित रूप से चीन के राजनीतिक तंत्र ने लोकतंत्र के मुकाबले अधिक काम किया है, पर इस अंतर के बावजूद मैं सोचता हूं कि भारत एक बड़ा बाजार है। यहां कानून का राज है, यहां एक भाषा है। ऎसी कई और बातें हैं, जो भारत के लिए सकारात्मक रूप से आती हैं।

अगर मेरा परिवार होता...
रतन टाटा के बारे में कहा जाता है कि वह ऎसे व्यक्ति हैं, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी कंपनी को समर्पित कर दी। उनसे पूछने पर कि क्या उन्हे शादी नहीं करने और परिवार न बसाने का अफसोस है? ये सवाल उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में थे, बावजूद इसके वे बोले, "अगर मेरा परिवार होता तो मैं अपने समूह को इतना ज्यादा समय नहीं दे पाता।" वे टाटा चैरीटेबल ट्रस्ट को चलाने के लिए अपनी नई भूमिका को भी देख रहे हैं, खासकर बच्चों के पोषण, स्वच्छ पेयजल और कम कीमत वाले घरों को लेकर।

वे कहते हैं, "मैं उपयुक्त समय का इंतजार करने के पक्ष में नहीं हूं।" हवाई उड़ान उनका एक और शौक है। वे बताते हैं, "इसमें भी मैंने अपना खूब समय दिया है। मैं कंपनी के जहाज में उड़ता हूं। इसलिए मैं एक इंजन वाले एक जहाज की कल्पना कर रहा हूं या ऎसे हेलिकॉप्टर की, जो मेरे शौक को जिंदा रखे। मुझे संगीत सुनने और पेंटिंग का भी शौक है। हम हमेशा ऎसी चीजों की कमी महसूस करते हैं, जिसे हम एक बार ही कर पाते हैं और कई बार करने का मौका नहीं मिलता। मैं ऎसी ही चीजों को फिर से वापस लाने का ख्याल करता हूं।"

यह पूछने पर कि आप अपनी छवि के बारे में क्या सोचते हैं? वे कहते हैं, "मुझे उम्मीद है कि लोग यह कहेंगे कि मैंने इस समूह का पूरी प्रतिष्ठा के साथ नेतृत्व किया और इस दिशा में मैंने सही कदम उठाए।"

इसके बाद उन्होंने गुडबाय कहा और एक चीफ एग्जीक्यूटीव से मिलने के लिए उठ गए, जो हमारी बातचीत खत्म होने का इंतजार कर रहे थे। मै बाहर निकल आया।

- जेम्स के्रबटरी (द इंडियन एक्सप्रेस से साभार)
 
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