Last updated - Tue, May 21, 2013
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खुशहाल जिंदगी के नायाब 13 सूत्र
क्या जीवन का हर दिन, हर पल नया हो सकता है? तो फिर जान लीजिए कि अगर इंसान का मन अंदर से बदले तो यह संभव है। हालांकि मन को बदलना शायद आसान तो नहीं है लेकिन थोड़ी सी कोशिश इसे अंजाम तक पहुंचा सकती है। ऎसे में ओशो के कुछ सूत्र, जिन पर अमल से आपका अंतस नया हो सकता है और आपके लिए हर दिन नई सुबह लेकर आ सकता है।

सफलता नहीं सुख को चुनें
अपनी तरक्की करना अच्छी बात है लेकिन दूसरों को पछाड़ने की रूग्ण इच्छा पालना गलत है। एक साधारण मान्यता है कि स्वस्थ प्रतियोगिता प्रगति के लिए लाभदायी होती है। लेकिन क्या प्रतियोगिता स्वस्थ हो सकती है? स्वस्थ प्रतियोगिता कब रूग्ण हो जाए कहना मुश्किल है। आपने देखा होगा कि सफल व्यक्ति दुखी और उदास हो जाते हैं या दिल के मरीज होते हैं।

क्यों? क्योंकि उनकी निगाह खुद की सफलता पर कम, दूसरे की विफलता पर अधिक होती है। बिजनेस में लोग सोचते हैं, मुझे लाभ हो न हो, मेरे प्रतिद्वंद्वियों को फायदा नहीं होना चाहिए। ऎसी सफलता दुख ही देगी। सफलता और सुख में कुछ चुनना हो तो सुख को चुनें क्योंकि सुखी आदमी स्वयं के साथ सफल होता है इसलिए जीवन उसे कभी विफल नहीं बना सकता।

झूठ बोलना छोड़ेंगे तो हल्का रहेंगे
लोग मानते हैं कि इस समाज में सफल होने के लिए झूठ बोलना ही पड़ता है। लेकिन क्या आपने सोचा है कि झूठ बोल-बोलकर आप स्वयं भी झूठ बन जाते हैं। आज जो दिल के मरीज इतने बढ़ रहे हैं उसका एक कारण यह झूठ का अंबार भी है। इस झूठ के नीचे ह्वदय कुचला जा रहा है।

इस झूठ से बाहर निकलने के लिए ओशो एक ध्यान विधि बताते हैं, उसे करके देखिए। तीन बातें खयाल रखें- पहली, जब आप किसी से झूठ बोल रहे हैं, तत्काल बीच में ही रूककर उस व्यक्ति से क्षमा मांगिए। उसी वक्त उसे कहें, "यह झूठ था, कृपा मुझे माफ करें।" दूसरी, जब आप झूठ बोलने वाले हों तो उसी समय जाग जाएं। जैसे ही यह जुबान पर आए, उसी समय उसी स्थिति में इसे रोक दें। गहरी सांस लें, झूठ पिघल जाएगा। आप हल्का अनुभव करेंगे और तीसरी: जब आपके ह्वदय में झूठ उठने लगे तो उसी समय जाग जाएं। यदि आप जागरण के ये तीन चरण पूरे कर लेते हैं तो झूठ विदा हो जाएगा।

विरोध त्यागना सीखें शांत रहेंगे
ज ब भी आप किसी वाहन में बैठते हैं, तो उस वाहन के हिचकोलों से आपका शरीर दुखने लगता है। आप सोचते हैं, यह सफर की थकान है। लेकिन जरा सोचिए, आपने तो कुछ किया ही नहीं फिर थकान क्यों? थकान होती है आपके विरोध करने से। वाहन की एक गति है, उस गति के साथ आप विरोध कर रहे हैं। आप चाहते हैं कि वाहन इतने जोर से न चले, उसमें हिचकोले न हों। तो जब वाहन दाई ओर हिलता है, आप अपने शरीर को रोकते हैं, सख्त करते हैं। आप वाहन से लड़ रहे हैं भीतर ही भीतर।

ऎसे में विरोध छोड़ दें बिलकुल। सोचें कि आपका शरीर पानी से बना है, उसकी अपनी कोई इच्छा नहीं है। दूसरी बात, लयबद्ध वर्तुल बनाएं। अगर वाहन बाई ओर झूल रहा है, आप भी झूल जाएं। उसके संग आप भी डोलें। मन में विरोध न हो, शरीर में विरोध न हो। जैसे ही मन का विरोध टूटेगा, शरीर लचीला होगा। आप न केवल शांत होंगे, वरन सफर का आनंद लेना भी शुरू करेंगे।

खुद में जगाएं देखने की कला
ट्रै फिक से बहुत परेशान हैं? घर से बाहर निकले नहीं कि यातायात का सैलाब मानो निगलने लगता है। ओशो कहते हैं, इससे अच्छा ध्यान का अवसर और कहां मिलेगा? कभी बहुत व्यस्त समय में सड़क पर जाएं और राह पर चल रही यातायात को देखिए।

सिर्फ देखना है, अंदर कोई निर्णय नहीं करना है कि कौन अच्छा ड्राइवर है, कौन बुरा है? कौन सी कार या स्कूटर किस कंपनी का है, इत्यादि तफसील में न जाइए। आपको सिर्फ तटस्थ भाव से देखना है। शीघ्र ही आप पाएंगे कि आपके अंदर एक दृष्टा जग गया, आप यातायात से बिलकुल अलग हो गए। यह दृष्टा आपके भीतर हमेशा सोया रहता है। अब यही ध्यान आप घर आकर या किसी पार्क में बैठकर आंख मूंदकर करें। चुपचाप बैठ जाएं और देखें, आपके मन की सड़क पर भी विचार चल रहे हैं। लेकिन अब आप देखने की कला सीख गए हैं। आप इस सबसे अलग हैं। यह जो अलग है वही आपका स्वभाव है।


अकारण प्रसन्नता में मस्ती होती है
आ ज-कल दिन हैं रिमोट कंट्रोल के। रिमोट का इलेक्ट्रॉनिक उपकरण भले ही आधुनिक लगता हो, आदमी के भीतर यह रिमोट बहुत पुराने समय से फिट है। गौर से देखें तो सभी लोग रिमोट कंट्रोल से जी रहे हैं। आपका रिमोट किसी और के हाथ में है और दूसरों का रिमोट आपके हाथ में।

कोई भी बटन दबा देता है और आपको गुस्सा दिला सकता है, या प्रसन्न कर सकता है। आपसे किसी ने कहा,"आज तो आप बहुत सुंदर लग रहे हैं," और वह व्यक्ति प्रसन्न हो गया। यह खेल निरंतर चलता रहता है। अपने सुख को दूसरे पर निर्भर मत रहने दें। आप अपने मालिक हैं। कभी खाली बैठे हैं, तो भी प्रसन्न रहे। प्रसन्न कैसे रहा जाए। इसका तरीका है कि ज्यादा सोच-विचार में न उलझें। थोड़ी गहरी सांसें लें और अपने ह्वदय पर ध्यान दें, धीरे-धीरे आप एक गहराई का अनुभव करेंगे। वहां आप देखेंगे कि हमेशा प्रसन्नता रहती है। अकारण होनेवाली प्रसन्नता में मस्ती होती है।

जीवन में संतुलन लाएं
कभी खड़े होते हैं तो खुद को देखिए, आप हैरान होंगे कि या तो आपका वजन बाएं पैर पर है या दाएं पैर पर है। अगर पता चले कि आपके शरीर का वजन बाएं पैर पर है, तो थोड़ी देर रूके हुए देखते रहें। आप थोड़ी देर में पाएंगे कि वजन दाएं पैर पर हट गया। अगर दाएं पैर पर वजन मालूम पड़े, तो वैसे ही खड़े रहें और अंदर देखते रहें तत्काल आप पाएंगे कि वजन बाएं पैर पर हट गया।

अब अगर इस छोटे-से अनुभव में आप एक प्रयोग करें, उस स्थिति में अपने को ऎसा समतुल करके खड़ा करें कि न वजन बाएं पैर पर हो, न दाएं पैर पर। दोनों पैरों के बीच में आ जाए। एक क्षण को भी उसकी झलक आपको मिलेगी, तो आप हैरान हो जाएंगे। एक क्षण आप ऎसे खुद को समतुल करें कि बीच में रह गए। उसी क्षण आपको लगेगा कि शरीर नहीं है। जमीन का जो भार है, वह असली भार नहीं है। असली भार तो मन का है, जो निरंतर हर छोटी चीज में द्वंद्व को खड़ा करता है।

थोड़ा बोलें, थोड़ा सुनें
यह युग बहुत बातून युग है। लोग निरर्थक बोलते रहते हैं। और जब वे बोल रहे हैं तो उसे सुनना भी पड़ता है। यह मन की अशांति का कारण बनता है। अधिक बोलना हमेशा नुकसान की वजह बनता है। ज्यादा बोलने से गलतफहमी पैदा होती है, लोग नाराज होते हैं। बातें उलझती हैं। शांति चाहते हैं तो कम बोलने की आदत डालें। जितना जरूरी है उतना ही बोलें।

जितना आपके काम का है उतना ही सुनें। व्यर्थ ही पास-पड़ोस की खबरें, अफवाहें इत्यादि सुनने से कोई लाभ नहीं होता, उल्टे दिमाग में अधिक कचरा भर जाता है। बोलने और सुनने में संक्षिप्त रहें। अगर आप थोड़ा बोलें, थोड़ा सुनें तो धीरे-धीरे आप देखेंगे कि एक स्वच्छता, एक पवित्रता का भाव उभरने लगेगा। मानो आपने स्नान किया हो। आप अपने भीतर एक खाली स्थान पाएंगे जो कि ऊर्जा से लबालब होगा। ध्यान के लिए यह अत्यंत आवश्यक भूमि है।

दीवारों से बातें करना सीखें
अपने कमरे में बैठ कर दीवार की तरफ मुंह करें और जो मन में आए, बोलना शुरू करें। जरूरी नहीं है उसे कोई सुने। वैसे भी कौन किसी को सुनता है? कोई किसी को नहीं सुनता, अक्सर लोग दीवारों से ही बात करते होते हैं। यह विधि बहुत रिलैक्स करती है। आप दीवार के आगे बेतहाशा बोलना शुरू करें। पहले-पहले हंसी आएगी लेकिन जल्द ही आपकी गाड़ी रफ्तार पकड़ लेगी और जो भी आपने भीतर दबाया है वह फट पड़ेगा।

दीवार के आगे आप बेझिझक सब कुछ कह पाएंगे। इससे आप जो दूसरे लोगों पर अपनी भड़ास निकालते हैं, उसकी जरूरत नहीं रहेगी। आपके संबंध अच्छे बने रहेंगे और आपका मन भी हल्का हो जाएगा। लगभग आधा घंटा दीवार से बात करने के बाद आप बहुत शांत अनुभव करेंगे, उस शांति में आंखें बंद कर निश्चिन्त बैठ जाएं। इतना सुकून आपने पहले कभी महसूस नहीं किया होगा। इस प्रयोग को नियमित कर सकते हैं।

प्रतीक्षा और कृतज्ञता को अपनाएं
आज की दुनिया तेज रफ्तार वाली है। उस कारण लोगों में धीरज खो गया है, और साथ में कृतज्ञता भी। ये दोनों एक ही भावदशा के दो छोर हैं। लालच इतनी बढ़ गई है कि जो मिला है उसके लिए कभी धन्यवाद नहीं उठता। और अधैर्य इतना है कि लोग प्रतीक्षा करना भूल गए हैं। कोई भी एक मिनट भी रूकने के लिए तैयार नहीं है। इसीलिए लोग इतना परेशान रहते हैं। इस साल आप छोटी-छोटी बातों के लिए कृतज्ञ अनुभव करना सीखें।

किसी ने चाय बना दी, किसी ने दरवाजा खोला, कहीं फूल खिला, हर बात पर धन्यवाद अनुभव करें। आपका ह्वदय भी खिलने लगेगा। और जो अभी घटा नहीं उसके लिए प्रतीक्षा करना सीखें। प्रतीक्षा करने से मस्तिष्क रिलैक्स होता है, मन शांत होने लगता है, दिल को सुकून सा मिलता है। समय की गति तो वही होगी, चीजें जब घटनी हों तभी घटेंगी, आपके अधैर्य के कारण आप चीजें अस्त-व्यस्त करते हैं।

हंसते रहेंगे तो स्वस्थ रहेंगे
आधुनिक विज्ञान कहता है कि अकारण हंसना आरोग्य की कुंजी है। हास्य एक टॉनिक है, जो मुफ्त में शरीर और मन को तंदुरूस्त बनाता है। हास्य एक आंतरिक जॉगिंग है। एक दिलदार हंसी आपके चेहरे के स्नायुओं, श्वास के परदे और पेट को बेहतरीन व्यायाम देते हैं। उससे दिल की धड़कन और रक्तचाप क्षणिक रूप से बढ़ता है, सांस तेज और गहरी होती है और आपके खून में ऑक्सीजन दौड़ने लगती है।

अगर लोगों के बीच का फासला कम करना हो तो दिल खोलकर हंसिए। एक भरपूर हंसी आपकी उतनी ही कैलोरी जला सकती है, जितना कि तेज चलना। एक अनुसंधान के अनुसार, छात्रों को गणित के मुश्किल सवाल हल करने हों तो अच्छा होगा उन्हें बीस मिनट तक चुटकुले सुनाए जाएं और बाद में उनसे पढ़ाई करवाई जाए। वे अधिक सुगमता से पढ़ पाएंगे। दिन की शुरूआत हंसते हुए करिए, और दिन भर हंसी के बहाने ढूंढिए। आप कभी बीमार नहीं होंगे।

शांति का सुरक्षा कवच
सुबह नींद खुलने के बाद जिस क्षण आपको लगे कि नींद जा चुकी है तो फौरन आंखें नहीं खोलें, पहले इस प्रयोग को दस मिनट करें फिर अपनी आंखें खोलें। पूरी रात के विश्राम बाद शरीर शिथिल है। मन में कोई उथल-पुथल नहीं है, अभी दिन शुरू नहीं हुआ। ध्यान में उतरने के लिए यह स्थिति और यह समय बहुत बढिया है। लेटे-लेटे अपना ध्यान दोनों आंखों के बीच ह्रदय पर ले आएं। अपने ह्वदय को गहन शांति से भरा अनुभव करें।

चित्त को पूरी तरह शांत रखें। दस मिनट तक उसी शांति में डूबें जैसे झील में डूब रहे हैं, और फिर आंखें खोलें। संसार बिलकुल अलग नजर आएगा। यह शांति दिन भर आपके साथ एक सुरक्षा कवच की तरह रहेगी। आप ध्यान में जितने गहरे गए होंगे उतनी आप शांति को देर तक अनुभव कर पाएंगे। नव वर्ष के संकल्पों में एक संकल्प ऎसा भी ले लेंगे तो जीवन सहज और सुकून वाला हो सकता है।

जो हाथ में नहीं उससे कैसा भय
जब तक मृत्यु हो ही नहीं जाती तब तक हम उसे जान ही नहीं सकते। फिर हम उससे क्यों भयभीत हैं? हमारा व्यक्तित्व जिसमें हमारा नाम,जाति, परिवार, शिक्षा इत्यादि शामिल है, सब सांयोगिक है। अगर आप भीतर खोजें तो पता चलेगा कि आपका शरीर एक संयोग है, जोड़ है। कुछ चीज मां से मिली है, कुछ पिता से मिली है और शेष सब भोजन से मिला है। फिर मन पर ध्यान करें। आपके विचार, भाव क्या आपके अपने हैं? कुछ विचार यहां से आए हैं, कुछ वहां से आए हैं।

मन में कुछ भी ऎसा नहीं है जो मौलिक हो। वह भी एक संग्रह है। अगर गहरे खोजते चले गए तो आपको पता चलेगा कि आपका व्यक्तित्व एक प्याज की तरह है। एक पर्त को हटाओ कि दूसरी पर्त सामने आ जाती है। दूसरी को हटाओ, तीसरी आ जाती है। पर्त पर पर्त हटाते जाओ और अंत में आपके हाथ में शून्य बचेगा। शून्य कभी मर नहीं सकता। एक बार अपने शून्य का साक्षात्कार कर लें तो फिर भय नहीं रहेगा।
 
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