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थैलेसीमिया से पीडि़त बच्चों को जिला अस्पताल में नहीं मिला ब्लड, परिजन खरीदकर लाए  

Updated: IST Ashoknagar, District Hospital, Thalassemia patient
अशोकनगर. जिला अस्पताल में थैलेसीमिया के मरीजों को बाहर से ब्लड खरीदकर लाना पड़ा, जबकि शासन के निर्देशानुसार उन्हें निशुल्क ब्लड उपलब्ध करवाने का प्रावधान है। इसके लिए उन्हें बदले में खून देने की आवश्यकता भी नहीं है।

अशोकनगर. जिला अस्पताल में थैलेसीमिया के मरीजों को बाहर से ब्लड खरीदकर लाना पड़ा, जबकि शासन के निर्देशानुसार उन्हें निशुल्क ब्लड उपलब्ध करवाने का प्रावधान है। इसके लिए उन्हें बदले में खून देने की आवश्यकता भी नहीं है। गुरुवार को जिला अस्पताल में ऐसे दो मरीज मिले, जो निजी ब्लड बैंक से 950 रुपए देकर ब्लड लाए और बदले में ब्लड भी दिया।

उल्लेखनीय है कि थैलेसीमिया के मरीजों को हर 20-25 दिन में खून की आवश्यकता होती है। ऐसे मरीजों को सरकार ने राहत देते हुए निशुल्क उपलब्ध करवाने के निर्देश दिए हैं। जिले में थैलेसीमिया के 10-15 मरीज हैं। जो जिला अस्पताल में ब्लड चढ़वाने आते हैं। उन्हें अस्पताल की ओर से निशुल्क ब्लड के लिए कार्ड भी इश्यु किया गया है। लेकिन जिले में मरीजों को रक्त के लिए परेशान होना पड़ रहा है। जिला अस्पताल में गुरुवार को दो बच्चों के परिजनों ने प्राइवेट ब्लड बैंक से ब्लड लाए जाने की जानकारी दी। जबकि इनमें से एक दो दिन से जिला अस्पताल में ही भर्ती है।

इस बार गौरव भी रहा खाली हाथ

जिला मुख्यालय पर तुलसी कॉलोनी निवासी गौरव (9) पुत्र नीतेश परिहार भी थैलेसीमिया से पीडि़त है, उसे अस्पताल से एक कार्ड मिला था, इससे हर महीने निशुल्क ब्लड उसे मिलता था। लेकिन इस बार वह भी रक्त के लिए भटकता रहा और अंत में उसके नाना पूरनसिंह परिहार एडवांस ब्लड बैंक से 970 रुपए में ब्लड लेकर आए। उन्होंने बताया कि हर महीने में अस्पताल से ब्लड मिल जाता था, लेकिन इस बार नहीं मिला।

नहीं दी रसीद

गज्जू आदिवासी व पूरनसिंह परिहार ने बताया कि उन्हें ब्लड खरीदने की रसीद नहीं दी गई। जबकि उन्हें रसीद दी जानी चाहिए थी। नंदनी के नाम 50 रुपए की एक रसीद व गौरव के नाम 70 रुपए की रसीद दी गई है।र सीद मांगने पर ब्लड बैंक संचालक ने कहा कि हम बात कर लेंगे आप जाओ।

क्या है थैलेसीमिया

थैलेसीमिया अनुवांशिक बीमारी है, इसमें बच्चे का खून बनना कम हो जाता है। मेजर थैलेसीमिया होने पर 15 से 20 दिन में खून चढ़ाने की आवश्यकता होती है। बार-बार खून चढ़ाने से शरीर में आयरन की मात्रा बढ़ जाती है। इससे किडनी, लीवर, हार्ट खराब होने का अंदेशा रहता है। यदि दवा से आयरन की मात्रा कम कर दी जाए तो इन अंगों को सुरक्षित रखा जा सकता है। रोगी की आयु बढ़ाई जा सकती है। इसमें काफी पैसा खर्च होता है। हर सप्ताह 400-500 रुपए की दवा लगती है।

दो दिन से भर्ती है नंदनी

पीडि़त बच्ची नंदनी (01) पुत्री देशराज आदिवासी के नाना के गज्जू आदिवासी निवासी निदानपुर ने बताया कि वे मंगलवार को बच्ची को जिला अस्पताल लाए थे, उसे थैलेसीमिया बताया गया था। दो दिन जिला अस्पताल में भर्ती रहने के बावजूद जिला अस्पताल से ब्लड नहीं मिला। फिर बताया गया कि एडवांस पर चले जाओ, वहां 950 रुपए में खून उन्हें दिया गया और बदले में उनका खून भी ले लिया। बच्ची की जांच भी मंगलवार को हुई थी और उसका हीमोग्लाबिन 1.6 आया था।

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