Patrika Hindi News

> > > > babu bagheshwer yadav birth day celebration in azamgarh

UP Election 2017

पूर्व सीएम रामनरेश यादव ने भी सीखे थे बाबू बागेश्वर से राजनीति के हुनर 

Updated: IST baghshwer
गरीबों के लिए जिंदगी भर किये थे संघर्ष, जयंती आज

आजमगढ़. पिछडे़ एवं दलित शोषित समाज को न्याय दिलाने के लिये अपना सर्वस्व समर्पित कर देने वाले बाबू बागेश्वर यादव जी के लिये यही कहा जा सकता है कि वह कभी झुके नहीं, कभी रूके नहीं। समाज की लड़ाई लड़ते हुये तमाम कठिनाईयां सामने आयी मगर उन्होने कभी कोई समझौता नहीं किया। रिश्तों की दीवार भी सामने आकर खड़ी हो गयी तो भी उसके संघर्षों का रूख कभी नहीं मुड़ा। अविभाजित आजमगढ़ जिला (तब मऊ अलग नहीं) के मोहम्मदाबाद तहसील अन्तर्गत चिरैयाकोट थानाक्षेत्र के मुसीबीर मउवा (समस्तीपुर) गांव में एक दिसम्बर 1912 को एक साधारण किसान परिवार में जन्में बाबू बागेश्वर यादव का सम्पूर्ण जीवन संघर्षों से भरा पड़ा रहा। अंग्रेजी दासता की जंजीरों में जकड़े होने के बावजूद आपके पिता श्री देवनन्द यादव जी ने आपको बेहतर उच्च शिक्षा दिलाने की ठानी।

गांव से ही प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद आपने हाई स्कूल की शिक्षा आजमगढ़ शहर के वेस्ली इण्टर कालेज से ग्रहण की। तत्पश्चात् आप उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय चले गये। शिक्षा-दीक्षा पूरी करने के बाद वकालत करते हुये आप अंग्रेजी हुकूमत को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिये आन्दोलनकारियों की अगुवाई करते रहे। आपकी शादी आजमगढ़ शहर के समीपवर्ती गांव जमालपुर में रामाज्ञा यादव की पुत्री रामराजी देवी के साथ हुई। शादी के बाद भी आप समाज के दबे कुचले लोगों को उनका हक-हकूक दिलाने के लिये संघर्षरत रहे।

देश के आजाद होने के बाद भी जब आपने देखा कि समाज के आखिरी पायदान पर मौजूद लोग अभी भी परतन्त्रता की बेड़ियों में जकड़े हुये हैं और चंद जमींदार अंग्रेजों की तरह ही उन पर सितम बरपा रहे हैं तो आपका मन द्रवित हो गया। आपने ठान लिया कि इन दबे-कुचले लोगों को जमींदारों की जंजीरों के जकड़न से मुक्ति दिलानी है। फिर क्या था, आपके संघर्षों का रथ एक बार फिर चल पड़ा कर्तव्यपथ पर। इसके लिये आपने पिछड़े समाज का पिछड़ापन एवं निरक्षता दूर करने की ठानी। समाज को जागरूक करने के लिए आपने टोलियां बनाना शुरू किया। आपके साथ दो छात्र बिषहम के हनुमान सिंह यादव व बसगित के रामदेव यादव मजबूती के साथ जुड़ गये। आपने नेतृत्व की अद्भूत क्षमता थी। आपने पिछड़े समाज को जगाने के लिये जगह-जगह सभायें करनी शुरू की। अपार जनसमर्थन मिला और बड़ी-बड़ी सभायें हुई। ऐसे में आपको जमींदार तबके के लोगों का भारी विरोध भी झेलना पड़ा। तब भी आप जरा भी विचलित नहीं हुये। इसी का परिणाम रहा क आगे चकलकर रानी की सराय के बड़े स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी श्री शुकदेव प्रसाद गुप्त जी, बाबा हुलास दास, बाबा भगवान दास उर्फ बाना बाबा, वैद्य जगदेव राम यादव जी, श्री रामाज्ञा यादव जी जैसे बड़ी शख्सियतें भी आपके साथ जुड़कर आपके आंदोनल में शरीक हो गयी।

फिर क्या था, आपका आंदोलन देखते ही देखते एक वृहद स्वरूप ले लिया। उस समय पिछडे समाज की तत्कालीन सबसे बड़ी कुरीति ने आपका ध्यान आकर्षित कि। उस समय पिछड़ा समाज के पुरूष घर पर ही रहकर कृषि एवं गृहस्थी सम्बन्धी कार्य करते रहते थे तथा उनके घर की महिलायें घर से निकलकर शहर में दूध बेचने आया करती थी। इससे सामाजिक व्यवारबाद में कुरीतियों उत्पन्न हो रही थी तथा कुछ त्रुटिपूर्ण बातें मिलने लगी थी। ऐसे में बाबू बागेश्वर जी ने तय कर लिया कि स्त्रियों को दूध बेचना बंद कराना है। इसके लिये बाना बाबा सर्वोच्च सेनापति बनाये गये। रामदवर, रामध्यान, रमई चौधरी सहित तमाम लोग इसके लिये साथ आ गये। समाज के लोगों ने भी इस आंदोलन में पूरा साथ दिया। कार्यकर्ताओं की टोली जगह-जगह महिलाओं को दूध बेचने जाने से रोकने लगी। इसके लिये जगह-जगह आपके कार्यकर्ताओं के ऊपर हमले भी हुये। कुछ अधिकारियों एवं अवांछनियों तत्वों

ने मुकदमा कायम करके एवं अन्य तरीकों से परेशान भी किया। बावजूद इसके आपके आन्दोलन का कारवां थमा नहीं और आपका आंदोलन अपने लक्ष्यों को भी प्राप्त हुआ। आप भी देश की उन्ही चिंतकों की सोच रखते थे कि देश आजाद होने के साथ ही कांग्रेस का लक्ष्य पूरा हो चुका है और इस संगठन को खत्म ही कर देना चाहिए। इसी सोच के साथ आप विधान सभा व लोकसभा का चुनाव लड़े और अपनी जीतती हुई सीट को अपने परमशिष्य चन्द्रजीत यादव जी को दे दिया और उन्हे चुनाव भी जीतवाया। आगे चलकर चन्द्रजीत यादव ने राजनीति में बहुत ऊचा मुकाम हासिल किये। उन्ही के शिष्य स्व0 रामनरेश यादव जी भी थे, जो दिन रात उन्ही के साथ रहते थे भी बाद में वह भी राजनीति में बहुत ऊंचे स्थान पर पहुंचे। यह अलग बात है कि पूंजीवादी सोच के लोगों ने यह सोचकर आपका विधानसभा व लोकसभा जाने का रास्ता रोक दिया कि यदि ऐसा हुआ तो उनकी तरक्की का रास्ता बंद हो जायेगा। फिलहाल आप जीवनपर्यन्त समाज के लिए लड़ते रहे। गंभीर बिमारी के चलते ही आप असमय ही 19 सितम्बर 1957 को काल के गाल में समां गये। आपका महाप्रयाण के बाद आपके समर्थक पूरी तरह से निराश हो गये, किन्तु आजमगढ़ सहित पूर्वांचल की राजनीति को दिशा देने का जो काम बाबू जी ने किया वह अतुलनीय है।

यह भी पढ़े :
अपने विवाह के सपने को सपने भारत मैट्रीमोनी से साकार करे।- निःशुल्क रजिस्ट्रेशन करे!

Latest Videos from Patrika

Patrika.com

लेटेस्ट ख़बरें ई-मेल पर पाने के लिए सब्सक्राइब करें

Dus ka Dum
Ad Block is Banned Click here to refresh the page

???? ??????? ?? ??? ???? ????? ???