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बेटा नहीं जीता तो इस मंत्री के लिए अपने ही घर में खड़ी हो जाएगी मुसीबत

Updated: IST Balram Yadav
बाहुबली और व्‍यवसायी के बीच बुरे फंसा मंत्री का यह बेटा

आजमगढ़. अतरौलिया विधानसभा क्षेत्र हमेशा से प्रत्‍याशियों के लिए अबुझ पहेली रही है। इस सीट पर लड़ने वाला कोई प्रत्‍याशी कई दावे के साथ नहीं कह सकता है वह चुनाव जीत रहा है। कारण है कि यहां के लोगों ने हमेशा परिवर्तन में विश्‍वास किया है। इस चुनाव में भी कुछ परिस्थिति अलग नहीं है। भाजपा ने जब तक प्रत्‍याशी घोषित नहीं किया था तब तक सीधी लड़ाई सपा और बसपा के बीच मानी जा रही थी। सवर्ण बाहुल्‍य सीट होने के कारण मामला फिफ्टी- फिफ्टी पर था लेकिन भाजपा ने अति पिछड़ी जाति के कन्‍हैंया निषाद पर दाव खेल कर लड़ाई दिलचस्‍प बना दिया है। अब यहां त्रिको‍णीय संर्घष दिख रहा है।

सबसे बड़ी चुनौती माध्‍यमिक शिक्षा मंत्री बलराम यादव के लिए है जो मुलायम सिंह यादव के करीबी माने जाते थे लेकिन जब सपा मुखिया के सितारे गर्दिश में दिखे और अखिलेश ने पार्टी पर कब्‍जा किया तो उनके पाले में चले गए। यहां से सपा ने बलराम के पुत्र विधायक डा. संग्राम यादव को दुबारा प्रत्‍याशी बनाया है। वहीं बसपा से बाहुबली अखंड प्रताप सिंह मैदान में। भाजपा ने व्‍यवसायी पर दाव खेला है। डा. संग्राम बाहुबली अखंड और व्‍यवसायी कन्‍हैंया के बीच फंसे दिख रहे है। कारण कि सपा हमेशा ने निषाद मतो के भरोसे ही बाजी पलटती रही है लेकिन इसबार भाजपा ने निषाद मैदान में उतार इस जाति के लोगों को अपना प्रत्‍याशी दे दिया है।

बता दें कि अतरौलिया विधानसभा सपा के गढ़ के रुप में जानी जाती है। सपा के बलराम यादव यहां से पांच बार विधायक चुने जा चुके हैं। जब भी प्रदेश में सपा की सरकार बनी इन्हें कोई न कोई मंत्री का पद जरुर मिला। स्वास्थ मंत्री, पंचायत राज मंत्री, कारागार मंत्री से लेकर माध्‍यमिक शिक्षा मंत्री तक का सफर तय कर चुके हैं। वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा प्रत्याशी सुरेंद्र प्रसाद मिश्रा से इन्हें शिकस्त झेलनी पड़ी। इसके बाद पार्टी ने इन्हें एमएलसी बना दिया। इसके बाद में वर्ष 2012 के चुनाव में सपा ने मंत्री के पुत्र डा संग्राम को अतरौलिया से उम्‍मीदवार बनाया और वे जीतकर विधानसभा पहुंच गए।

अब वर्ष 2017 के चुनाव में सपा को छोड़ सभी दलों ने नये चेहरे पर दाव खेला है। बसपा ने सपा को मात देने के लिए बाहुबली अखंड प्रताप सिंह को मैदान में उतारा तो यह माना जाने लगा कि मंत्री पुत्र की राह आसान नहीं होगी। कारण कि यह सीट सवर्ण बाहुल्‍य है और सवर्ण प्रत्‍याशी होने का लाभ बसपा फिर उठा सकती है।

भाजपा से भी कई सवर्ण दावेदारी कर रहे थे। ऐसे में यह भी चर्चा थी कि यदि कोई सवर्ण भाजपा से आ गया तो सपा की राह आसान हो जाएगी लेकिन चुनाव घोषणा के बाद भाजपा ने इस सीट से निषाद जाति के प्रत्‍याशी कन्‍हैंया को मैदान में उतार कर बड़ा दाव खेल दिया। अब सवर्ण मतों के साथ ही भाजपा निषाद मतों पर भी दावा कर रही है। हालत यह है कि यहां लड़ाई त्रिकोणीय हो चुकी है। कौन जीतेगा यह कह पाना मुश्किल है।

इस सीट पर सबसे अहम बात है यहां से सपा से चुनाव संग्राम यादव लड़ रहे है लेकिन प्रतिष्‍ठा हमेशा अखिलेश के खिलाफ खेमें मे खड़े रहने वाले बलराम यादव की दाव पर लगी है। यह वही बलराम यादव है जिन्‍हें अखिलेश विल्‍कुल भी पसंद नहीं करते और कौएद विलय के मामले में मंत्रीमंडल से बर्खाश्‍त कर दिया था। बाद में मुलायम के दबाव में उन्‍हें फिर मंत्रीमंडल में शामिल किया। ऐसे में इनके भविष्‍य संग्रमा का चुनाव जीतना जरूरी है। यदि संग्राम असफल रहे तो मंत्री का कद सपा में घटना तय है।

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