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यहां प्रभुराम और माता सीता की स्मृति  में महर्षि ने की थी शिवलिंग की स्थापना

Updated: IST durvasha dham
त्रिदेवों की तपोस्थली है दुर्वाषा धाम

आजमगढ़. यह धरती वास्तव में आध्यात्मिक ऋषि मुनियों की तपोस्थली रही है। यह जनपद आध्यत्मिक जगत में अपना विशेष मुकाम रखता है। त्रिदेवों की इस धरती पर विशेष कृपा रही है। उन्होंने इसे अपनी कर्मभूमि तथा तपोस्थली होने का सम्मान प्रदान किया। भगवान शिव के अंश और रूद्रावतार चारों युगों के द्रष्टा महर्षि दुर्वाषा ने निजामाबाद तहसील में तमसा किनारे अपनी तपोस्थली त्रेता युग में बनाया था जो आज भी जन आस्था का प्रमुख केंद्र है। तीन तहसील क्षेत्रों फूलपुर, निजामाबाद और अम्बेकर नगर के त्रिकोण पर तमसा किनारे स्थापित दुर्वाषा धाम पर भगवान शिव का पौराणिक काल का मंदिर स्थित है। यहां देश के कोने कोने से भक्त सावन मास में आते हैं और भगवान शिव और दुर्वाषा ऋषि का दर्शन पूजन कर अपनी मनोकामना पूरी करते हैं। बिहार स्थित बाबा धाम जाने वाले कांवरियों का सावन माह भर रेला लगा रहता है। मान्यता है कि दुर्वाषा धाम स्थित शिवलिंग का जलाभिषेक किये बिना तमसा के पावन जल के बिना बाबा धाम की यात्रा सफल नहीं होती।

धाम स्थित भगवान शिव का लिंग की स्थापना त्रेता युग में हुई थी जिसे ऋषि दुर्वासा ने भगवान राम और माता सीता की स्मृति में स्थापित किया था। इस धाम में ऋषि दुर्वाषा की दो तपोस्थली स्थित है जिनमें से एक उन्हीं के युग की है और तमसा के दूसरे छोर पर जर्जर हालत में है जबकि दूसरे छोर पर धाम का अधिकांश चमचमाता हिसा मौजूद है मगर यहां बाद में भक्तों द्वारा स्थापित तपोस्थली है। यहां दूर-दूर से आकर श्रद्धालु शिवलिंग और बाबा दुर्वाषा का पूजन अर्चन कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

पंचक्रोसी परिक्रमा के बिना अधूरी होती है यात्रा
दुर्वाषा धाम की यात्रा का पुण्य लाभ तब तक नहीं होता जब तक कि पंचक्रोसी की यात्रा पूरी नहीं की जाती। गौरतलब है कि तमसा किनारे ही त्रिदेवों के अंश चंद्रमा मुनि आश्रम, दत्तात्रेय आश्रम और दुर्वाषा धाम स्थित है। इन तीनों पावन स्थलों की परिक्रमा पांच कोस की दूरी तय करके की जा सकती है। इन्हीं तीनों धामों की यात्रा के बिना श्रद्धालुओं को पुण्य लाभ नहीं मिलता सो सभी श्रद्धालु पंचक्रोसी परिक्रमा पूरी करते हैं।

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