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सिंगाजी मंदिर जैसी बनेगी स्वामी विवेकानंद के गुरुभाई अमूर्तानंद की समाधि

Updated: IST Swami Maharaj
संत अमूर्तानंद की समाधि को मूल स्थान पर रखते हुए वहां परकोटे का निर्माण कर ऊंचा किया जाएगा तथा उसकी छत पर समाधि की प्रतिकृति बनाएंगे। इसका समाधि का मॉडल भी बना लिया गया है। समाधि के सरंक्षण पर 1.56 करोड़ रुपए खर्च होंगे।

बड़वानी.सरदार सरोवर बांध की डूब में आ रही स्वामी विवेकानंद के गुरुभाई अमूर्तानंद महाराज की समाधि को खंडवा के संत सिंगाजी की समाधि की तर्ज पर सहेजेंगे। नमामि देवी नर्मदे यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने समाधि के दर्शन के बाद इस काम में तेजी के निर्देश दिए। खंडवा में संत सिंगाजी महाराज की समाधि का इंदिरा सागर की डूब में आने के बाद संरक्षण किया गया था। अब इसी तर्ज पर संत अमूर्तानंद की समाधि को मूल स्थान पर रखते हुए वहां परकोटे का निर्माण कर ऊंचा किया जाएगा तथा उसकी छत पर समाधि की प्रतिकृति बनाएंगे। इसका समाधि का मॉडल भी बना लिया गया है। समाधि के सरंक्षण पर 1.56 करोड़ रुपए खर्च होंगे।

कौन है अमूर्तानंद
स्वामी जी विवेकानंद जी के गुरुभाई स्वामी अमूर्तानंद का बड़वानी जिले के अंजड़ के निकट मोहिपुरा में मां रेवा आश्रम आश्रम है। उन्होंने यहीं अपना पूरा जीवन गुजारा। बड़वानी के संघ कार्यालय में उनका संग्रहालय बना हुआ है। स्वयंसेवकों का कहना है कि स्वामी अमूर्तानंदजी स्वामी विवेकानंद केगुरुभाईथे। खरगोन में स्वामी अमूर्तनंद न्यास सेवा समिति की ओर से पिछले तीन साल से उनकी स्मृति में व्याख्यानमाला का आयोजन हो रहा है।

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आजादी के सिपाही थे स्वामी अमूर्तानंद
कलकत्ता के समृद्ध परिवार में 22 मई 1889 को स्वामी अमूर्तानंद महाराज का जन्म हुआ। उनके जन्म का नाम हरिदास मुखर्जी थी। पिता सूर्यकांत मुखर्जी बर्मा में लकड़ी के बड़े व्यापारी थे। स्वामीजी का बचपन बनारस में बीता। 14 वर्ष की आयु में वे शिक्षा के लिए कोलकाता आए। यहां एमए में स्वर्णपदक प्राप्त करने के बाद क्रांतिकारी गरम दल के वंदे मातरम आंदोलन से जुड़ गए। हावड़ा बमकांड के बाद वे 1911 में अज्ञातवास में चले गए और 1912 में तारातोगाची आश्रम से जुड़े। इस दौरान वे 1926 तक स्वामी रामकृष्ण परमहंस के शिष्य अखंडानंद महाराज की सेवा में रहे। 1927 में संन्यास की दीक्षा ली और उनका नाम अमिताभ भारत स्वामी अमूर्तानंद महाराज पड़ा। 1934 से स्वामीजी रामकृष्ण मिशन से जुड़ गए।

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खरगोन में स्वामी अमूर्तनंद न्यास सेवा समिति की ओर से आयोजित

व्याख्यानमाला को संबोधित करतीदीनदयाल शोध संस्थान मुंबई की

प्रमुख डॉ. नंदिता पाठक

108 वर्ष की आयु में देहावसान

आजादी के बाद 1960 में इंदौर आए, यहां से वे ओंकारेश्वर के निकट राजराजेश्वर आश्रम से जुड़े। 1962 में बड़वानी के मोहीपुरा आए और मां रेवा आश्रम की स्थापना की। स्वामीजी ने 1966 में आकाल और 1972 में बाढ़ के दौरान दीन-दुखियों की सेवा की। स्वामीजी ने सामाजिक कर्तव्य निभाते हुए गांव में स्कूल, रोड, बिजली, पेयजल की व्यवस्था कराई। साथ ही नशामुक्ति अभियान, सामाजिक कुरीतियों, बेटियों को पढ़ाने का अलख भी जलाया। 7 मई 1997 में 108 वर्ष की आयु में उनका देहावसानहुआ। उनके शिष्यों ने मां नर्मदा तट पर ही उनकी समाधि बनाई।

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