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कावेरी जल विवाद :  कृष्णा की राह चलेंगे सिद्धू तो पैदा होगा संवैधानिक संकट

Updated: IST bangalore vidhan soudha
पानी छोडऩे के आदेश के खिलाफ प्रस्ताव पारित किए जाने की संभावना

बेंगलूरु. तमिलनाडु को 42 हजार क्यूसेक पानी और देने के आदेश को लेकर अगर सिद्धरामय्या के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार पूर्व मुख्यमंत्री एस एम कृष्णा वाली सरकार की राह पर चलती है तो संवैधानिक संकट की स्थिति पैदा हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर चर्चा के लिए राज्य विधानमंडल की आपात बैठक बेंगलूरु में शुरू हो चुकी है और इसमें पानी छोडऩे के आदेश के खिलाफ प्रस्ताव पारित किए जाने की संभावना है। माना जा रहा है कि इसी प्रस्ताव को आधार बनाकर सरकार तमिलनाडु को और पानी देने से इनकार कर देगी और 27 सितम्बर को मामले की सुनवाई के दौरान अदालत में यही दलील दी जाएगी कि विधानमंडल ने पानी नहीं छोडऩे का फैसला किया है। इससे विधायिका,कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच गतिरोध की स्थिति बन जाएगी।

संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप कहते हैं कि यह काफी हास्यास्पद स्थिति है जो नहीं होनी चाहिए। संविधान लोकतंत्र के तीनों ही अंगों को परस्पर सहयोग की भावना से काम करने की बात कही गई है और अगर विधानमंडल ऐसा कोई प्रस्ताव पारित करता है तो यह सही नहीं होगा।

राज्य में सिद्धरामय्या से पहले भी मुख्यमंत्रियों को पानी छोडऩे के आदेश के कारण मुश्किल स्थितियों का सामना करना पड़ चुका है। वर्ष 1991 में कावेरी पंचाट ने अंतरिम आदेश में कर्नाटक को 205 टीएमसी पानी तमिलनाडु के लिए छोडऩे के आदेश दिए थे लेकिन बंगारप्पा ने इसके खिलाफ अध्यादेश लाया। इसी दौरान राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिं्रित काफी बिगड़ गई और बेंगलूरु में पानी को लेकर दंगे हुए। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने बंगारप्पा सरकार के अध्यादेश को खारिज कर दिया और सरकार को पानी छोडऩा पड़ा। इसके बाद 2002 में कृष्णा सरकार ने कावेरी बेसिन क्षेत्र में पानी की किल्लत का हवाला देकर शीर्ष अदालत के फैसले को मानने से इनकार कर दिया था। सरकार ने आदेश के बावजूद पानी छोडऩे के लिए कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगडऩे की आशंका हवाला दिया था,जिसे लेकर अदालत ने न सिर्फ सरकार की खिंचाई बल्कि काफी तल्ख टिप्पणी करते हुए यह तक कह दिए दिया था कि अगर कानून-व्यवस्था नहीं संभाल सकते तो सत्ता छोड़ दें। बाद में कृष्णा ने अदालत से बिना शर्त माफी मांग ली और आदेश के मुताबिक पानी भी छोड़ा। हालांकि,पानी छोडऩे से राजनीतिक नुकसान की भरपाई के लिए कृष्णा ने बेंगलूरु से मण्ड्या तक पदयात्रा की।

क्या सिद्धू ने खेला राजनीतिक दांव

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा है कि सिद्धरामय्या ने मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा की घेराबंदी करने के लिए पानी छोडऩे के आदेश के क्रियान्वयन का टालने के साथ ही विधानमंडल अधिवेशन बुलाने का निर्णय किया। भाजपा ने सर्वदलीय बैठक का बहिष्कार कर कांग्रेस को राजनीतिक तौर पर फायदा भी करा दिया।

भाजपा सरकार को पहले ही पानी नहीं छोडऩे के लिए कह चुकी थी लेकिन सरकार ने उसके सुझाव को खारिज कर दिया था। सरकार ने प्रधानमंत्री से मामले में दखल की मांग की थी लेकिन प्रधानमंत्री ने इस मसले पर मुलाकात के लिए मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या को समय भी नहीं दिया। पीएम के दखल की मांग के साथ जहां कांग्रेस ने भाजपा को घेरने की कोशिश की वहीं भाजपा नेता यह कहते हुए मोदी के बचाव में उतर आए कि मामला अदालत में है लिहाजा प्रधानमंत्री दखल नहीं दे सकते हैं। साथ ही भाजपा ने पानी छोडऩे के फैसले का उपयोग कांग्रेस पर हमला करने के लिए भी किया। भाजपा के दांव से सकते में आई कांग्रेस ने भी अपनी राजनीतिक चाल बदल दी। मंगलवार को अदालत का आदेश ही विधानसौधा के गलियारों में यह चर्चा होने लगी थी कि सरकार इस बार तुरंत पानी छोडऩे का आदेश नहीं मानेगी। कुछ ही देर में सर्वदलीय बैठक के साथ यह भी साफ हो गया था कि कांग्रेस भी अब कावेरी के भावनात्मक मुद्दे को सियासी तौर पर भुनाने की तैयारी कर चुकी है। विपक्ष की मांग को स्वीकारते हुए सरकार ने विधानमंडल का अधिवेशन बुलाए जाने के संकेत भी दे दिए थे। भाजपा ने कांग्रेस के रुख को देखते हुए सर्वदलीय बैठक के बहिष्कार का दांव खेला और उसके नेता केंद्रीय जल संसाधन मंत्री से मिलने दिल्ली पहुंच गए।

भाजपा के सरकार का सरकार साथ छोडऩे के साथ ही जद ध का रूख भी बदल गया। जद ध इस मसले पर सरकार के खिलाफ काफी आक्रामक रहा है और बुधवार सुबह उसके भी बैठक का बहिष्कार करने की खबरें आई लेकिन कुछ ही घंटों में सबकुछ बदल गया। मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या ने राजनीतिक दांव खेलते हुए पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा से मुलाकात का निर्णय कर उनका समर्थन हासिल करने की कोशिश की। सिद्धू की यह पहल रंग लाई और कांग्रेस को जद ध का साथ मिल गया। सिद्धू के विशेष आमंत्रण पर देवेगौड़ा न सिर्फ खुद बैठक में आए बल्कि उनकी पार्टी जद ध के सभी प्रमुख नेता भी मौजूद थे।

सीमित हैं सरकार के पास विकल्प

कानून के जानकारों का कहना है कि इस मामले में सरकार के पास कानूनी तौर पर काफी सीमित विकल्प हैं और पानी छोडऩे के सिवा उसके पास तत्काल दूसरा कोई रास्ता भी नहीं है। कानून विशेषज्ञों के मुताबिक सरकार ने सुप्रीम को दो जजों की पीठ के फैसले को अब तक बड़ी पीठ में चुनौती देने के बारे में कोई निर्णय नहीं किया और न ही पुनरीक्षण याचिका के बारे में कुछ कहा है। ऐसे में कानूनी तौर पर राज्य को राहत नहीं मिलेगी और उससे अदालत की ओर से तय समय सीमा से पहले पानी छोडऩा ही होगा। अगर सरकार 27 सितम्बर से पहले तय मात्रा में पानी नहीं छोड़ती है तो तमिलनाडु राज्य के खिलाफ अवमानना का मामला दायर कर सकता है और उससे राज्य को मुश्किल स्थिति का सामना करना पड़ेगा। कानूनी विशेषज्ञों की राय है कि तीन दिन तक पानी छोडऩे के आदेश का क्रियान्वयन टालना और उस पर चर्चा के लिए विधानमंडल अधिवेशन बुलाना सिर्फ राजनीतिक कदम है। विधि विशेषज्ञों की राय है कि अगर समय सीमा के अंदर देरी से ही सही राज्य सरकार तय मात्रा में पानी छोड़ देती है तो वह अवमानना की स्थिति का सामना करने से बच सकती है। राजनीतिक हलकों में भी चर्चा है कि विधानमंडल अधिवेशन के समापन साथ सरकार संवैधानिक गतिरोध की स्थिति से बचने के लिए पानी छोडऩे और कानूनी राहत के लिए फिर से शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाने का ऐलान कर सकती है। इससे कांग्रेस के राजनीतिक हितों की पूर्ति भी हो जाएगी और सरकार को संवैधानिक दायित्व निभाने का रास्ता भी मिल जाएगा।

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