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सरकार ने परामर्श पर फूंके करोड़ों,काम हुआ शून्य

Updated: IST bangalore news
परियोजनाओं को शुरू करने से पहले ही सरकारी उपक्रम सलाहकारों पर करोड़ों रुपए खर्च कर रहे हैं जबकि बाद में संबंधित योजनाएं पर कागज पर सिमट जाती हैं

बेंगलूरु. परियोजनाओं को शुरू करने से पहले ही सरकारी उपक्रम सलाहकारों पर करोड़ों रुपए खर्च कर रहे हैं जबकि बाद में संबंधित योजनाएं पर कागज पर सिमट जाती हैं।

शहर में पेयजल आपूर्ति से जुड़ी एक परियोजना के क्रियान्यवन को लेकर इस साल बेंगलूरु जलापूर्ति व मल निकासी बोर्ड (बीडब्ल्यूएसएसबी) सलाहकारी पर 24 करोड़ रुपए खर्च करेगा। इसमें कावेरी पांचवें चरण की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तथा तिप्पगोंडनहल्ली टैंक के पुनरुद्धार के कार्य शामिल हैं। वृषभावती और हेब्बाल घाटी में वर्षा जल के उपयोग के संदर्भ में सलाह पर ही 4.89 करोड़ रुपए लागत का अनुमान है।

बीडब्ल्यूएसएसबी के अतिरिक्त मुख्य अभियंता (नवाचार व नव जल) पीएन रवीन्द्र कहते हैं कि सभी चीजें निविदाओं के माध्यम से हो रही है, जो भी सलाहकार कम कीमत लगाएगा, उसे काम सौंपा जाएगा।

करीब अब 18 हजार 400 करोड़ रुपए की अनुमानित लागत वाली 109 किलोमीटर लंबी ऐलिवेटेड पूर्व-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण गलियारा परियोजना के व्यवहार्यता अध्ययन पर सरकार 20 करोड़ रुपए खर्च कर रही है।

परंतु यह कार्यरूप में आएगी, कुछ कहा नहीं जा सकता। सिर्फ सलाह पर ही करोड़ों रुपए खर्च करने और फिर संबंधित परियोजनाओं को कार्यान्वित न करने के मामलों की बेंगलूरु में लंबी सूची है। सबसे बड़ा उदाहरण विवादों में रही इस्पात फ्लाईओवर परियोजना थी। भारी जन विरोध के कारण सरकार को इस परियोजना को रद्द करने की घोषणा करनी पड़ी थी। चालुक्य चौराहे से हेब्बाल फ्लाईओवर तक प्रस्तावित इस परियोजना पर 2500 करोड़ से ज्यादा का खर्च आने का अनुमान था। यलहंका में एक इंटरमॉडल ट्रांजिट हब की योजना बनी। व्यवहार्यता अध्ययन के बाद भी सरकार ने कदम खींच लिए जबकि सरकार ने इस पर बड़ी रकम खर्च की थी।

इच्छाशक्ति पर निर्भर क्रियान्वयन

बस रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (बीआरटीएस) की डीपीआर तैयार करने वाले डब्ल्यूआरआई में एकीकृत परिवहन विभाग के प्रमुख पवन मुलुकुतला कहते हैं कि प्रत्येक बड़ी परियोजना के लिए मात्र सलाह के मसले पर ही कम से कम 2 से 3 करोड़ रुपए खर्च होते हैं। बीआरटीएस परियोजना को बाद में रद्द कर दिया गया। कोई भी कार्य यदि मास्टर प्लान से संबद्ध नहीं है तो उसका धरातल पर उतरना सिर्फ इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है।

साल 2013 में यूनाइटेड किंग्डम की सलाहकार कंपनी कैपिटा साइमंड्स ने 10875 करोड़ रुपए की अनुमानित लागत वाले 40 किलोमीटर लंबे लाइट रेल ट्रांजिट नेटवर्क के लिए डीपीआर तैयार की। बेंगलूरु एयरपोर्ट रेल लिंक लिमिटेड (बीएआरएल) ने रिपोर्ट पर 4.5 करोड़ रुपए खर्च किए, मगर परियोजना को लेकर अनिश्चितता है। यही नहीं सिटी सेंटर से देवनहल्ली तक हाई स्पीड रेल लिंक के लिए दिल्ली मेट्रो रेल निगम ने डीपीआर बनाई, लेकिन परियोजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

शहर में यातयात के दबाव को कम करने और सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए सरकार ऐलिवेटेड लाइट रेल ट्रांजिट सिस्टम (ईएलआरटीएस) परियोजना लाई गई। वर्ष 1996 में इसका काम उद्योगपति विजय माल्या के यूबी समूह के नेतृत्व वाले उपक्रम को सौंपा गया। इसके लिए बेंगलूरु मास रैपिड ट्रांसपोर्ट लिमिटेड का भी गठन किया गया लेकिन काम आगे बढ़ता पाता इससे पहले ही वर्ष 2000 में एसएम कृष्णा सरकार ने पूरी परियोजना को रद्द कर दिया।

डीपीआर बनने के बाद काम छोडऩा गलत

&किसी भी परियोजना को लेकर डीपीआर अथवा व्यवहार्यता अध्ययन पर तभी काम करना चाहिए जबकि संबंधित परियोजना का कार्यान्वयन सुनिश्चित हो। डीपीआर बनने के बाद परियोजनाओं को रद्द करना मूर्खता है।

विवेक मेनन, शहरी योजना विशेषज्ञ

पहले रायशुमारी करा ले सरकार

&यहां डीपीआर बनने के बाद परियोजनाओं का व्यवहार में आने की संभावना महज 60 फीसदी ही होती है। अच्छा हो कि डीपीआर तथा व्यवहार्यता अध्ययन पर जनता का पैसा खर्च करने से पहले स्वयं लोगों से परियोजनाओं के बारे में पूछा जाए कि वे यह कार्य चाहते भी हैं या नहीं। बीबीएमपी ने 2014 में एक ऐलिवेटेड गलियारा को लेकर थर्ड पार्टी मूल्यांकन के लिए काम में लगाया, लेकिन यह परियोजना कभी धरातल पर नहीं उतरी।

एच एस जगदीश, सिविल इंजीनियरिंग व्याख्याता

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