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कर्नाटक को नहीं मिली राहत तमिलनाडु को देना पड़ेगा पानी

Updated: IST bangalore news
कावेरी जल बंटवारा विवाद में मंगलवार को फिर कर्नाटक को उच्चतम न्यायालय से कोई फौरी राहत नहीं मिल पाई। कर्नाटक को अगले आदेश तक तमिलनाडु को रोजाना 2 हजार क्यूसेक पानी देना पड़ेगा

बेंगलूरु/ नई दिल्ली. कावेरी जल बंटवारा विवाद में मंगलवार को फिर कर्नाटक को उच्चतम न्यायालय से कोई फौरी राहत नहीं मिल पाई। कर्नाटक को अगले आदेश तक तमिलनाडु को रोजाना 2 हजार क्यूसेक पानी देना पड़ेगा।

जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने अंतरिम आदेश में 4 अक्टूबर के रोजाना दो हजार क्यूसेक पानी देने के आदेश को जारी रखते हुए अगले आदेश तक कर्नाटक को तमिलनाडु के लिए पानी छोडऩे के लिए कहा। इससे पहले तमिलनाडु की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता शेखर एन ने कहा कि हम पानी के अभाव की स्थिति का सामना कर रहे हैं। पीने के लिए पानी नहीं है और पानी के अभाव में हमारे यहां फसलें सूख रही हैं।

इस पर कर्नाटक के वकील फाली एस. नरीमन ने आपत्ति करते हुए कहा कि जब कर्नाटक में ही पानी नहीं है तो वह तमिलनाडु के लिए कहां से पानी छोड़ें। कर्नाटक को 11 टीएमसी पानी की कमी का सामना करना पड़ रहा है और राज्य में न तो फसलों और ना ही पेयजल के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध है।

उन्होंने अदालत से अपील की कि और अधिक पानी छोडऩे का आदेश नहीं दिया जाए। केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए महाधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि दोनों ही राज्यों को पानी की समान आवश्यकता है। पीठ ने कहा कि तमिलनाडु मेें अभी उत्तर-पूर्व मानसून नहीं पहुंचा और उसके 26 अक्टूबर तक आने की संभावना है। इसके बाद अदालत ने अंतरिम आदेश जारी किया। अदालत ने दोनों राज्यों को उच्च स्तरीय तकनीकी समिति की वस्तुस्थिति रिपोर्ट पर आपत्ति दायर करने के भी निर्देश दिए। समिति ने दोनों राज्यों का दौरा करने के बाद सोमवार को रिपोर्ट पेश की थी जिसमें तमिलनाडु के लिए और पानी छोडऩे को लेकर कोई सिफारिश नहीं की गई थी।

शांति व सद्भाव बनाएं रखें

पीठ ने कहा कि दोनों राज्यों की सरकार को शांति और सद्भाव बनाए रखना चाहिए। पीठ ने कहा कि जब मामला अदालत के समक्ष विचाराधीन है और उसके समाधान की कोशिश जारी है,ऐसे मेें लोगों को कानून हाथ में लेने की इजाजत नही दी जा सकती है। पीठ ने कहा कि यह दोनों राज्यों की सरकार का दायित्व है कि वह शांति-व्यवस्था रखें।

जस्टिस मिश्रा के अलावा इस पीठ में जस्टिस अमिताव राय और जस्टिस ए एम खानविलकर भी हैं। कावेरी से जुड़े मसलों की सुनवाई के लिए इस पीठ का गठन पिछले सप्ताह किया गया था। पहले इस मामले की सुनवाई जस्टिस मिश्रा और जस्टिस यू यू ललित की पीठ कर रही थी।

केंद्र के कहा सुनवाई का अधिकार नहीं

इससे पहले रोहतगी ने करीब 90 मिनट तक दलीलें देते हुए कहा कि कावेरी पंचाट के अंतिम फैसले के खिलाफ राज्यों द्वारा दायर की गई मूल याचिकाओं सुनवाई नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत को इस मामले में अपीलों पर सुनवाई का अधिकार नहीं है। पुदुचेरी ने भी यही बात कही। रोहतगी ने दलील दी कि संविधान और अंतरराज्यीय नदी जल विवाद कानून के प्रावधानों के मुताबिक संसद से पारित किसी कानून के आधार पर पंचाट गठित होने के बाद अदालत को ऐसे मामले में दखल देने का अधिकार नहीं है।

पंचाट का फैसला ही आखिरी है। रोहतगी ने कहा कि पंचाट के फैसले को शीर्ष अदालत के फैसले के समान माना जाता है। रोहतगी की दलीलों का विरोध करते हुए नरीमन ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत सुनवाई अदालत विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई कर सकती है।

रोहतगी के पंचाट के फैसले के अंतिम होने की दलील पर आपत्ति करते हुए नरीमन ने कहा कि अगर पंचाट का फैसला प्राकृतिक सिद्धांतों के विपरीत हो तो क्या वह अंतिम हो सकता है। नरीमन ने कहा कि शीर्ष अदालत को अनुच्छेद 136 के तहत अपीलों पर सुनवाई का विशेषाधिकार है और संसद उसमें दखल नहीं दे सकती है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पीठ ने बुधवार तक के लिए स्थगित कर दी। पीठ ने कहा कि पहले वह इस बात का फैसला करेगी कि पंचाट के फैसले के खिलाफ दायर याचिका सुनवाई लायक हैं या नहीं। कर्नाटक ने मामले को संविधान पीठ के पास भेजने की मांग की।

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