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ऐसे तो किसान से ज्यादा अमीर है मजदूर

Updated: IST mandi
मंडी में फसल आते ही गिरे अनाजों के भाव, भाड़ा और फसल लागत निकाल दें तो मजदूर से भी बदतर किसान

भिण्ड. कई सालों से सरकार की ओर से किसानों को मुनाफे में लाने का सपना दिखाया जा रहा है। मगर हकीकत में किसानों की आर्थिक स्थित लगातार बिगड़ती जा रही है। रबी की जिन फसलों के भाव आसमान छू रहे थे किसानों की फसल मंड़ी में आते ही नीचे आ गए हैं। विकल्प के आभाव में किसान खून पसीने की कमाई को माटी मोल बेचने को मजबूर है।

मार्च में गेहूं व्यापारियों के हाथ में था तो मंडी में भाव १८०० से लेकर १९०० तक था। जैसे ही किसानों क ा गेहूं मंडियों में आना शुरू हुआ भाव गिरने शुरू हो गए। वर्तमान में गेहूं की बंपर आवक शुरू हो गई है तो भाव लुढ़क कर १५०० से १५५० रुपए प्रति क्विंटल पर आ गया है। गांव में तो गेहूं १४०० रुपए में ही व्यापारी खरीद रहे हैंं। कहने को तो समर्थन मूल्य पर सरकार की ओर से भी गेहूं की खरीद की जा रही है लेकिन खाते से ऋण राशि काट लिए जाने के भय से इस बार गत वर्ष की अपेक्षा १० हजार से ज्यादा किसानों ने पंजीयन ही नही कराया था इन किसानों को मजबूरी में गेहूं औने-पौने भाव में ही बेचना पड़ रहा है। इसी प्रकार फरवरी में सरसों का भाव ३८०० रुपये प्रति क्विंटल के आसपास था लेकिन फसल आते ही भाव गिरकर ३१०० से लेकर ३२०० रुपए प्रति क्विंटल पर आकर लटक गए। वैसे सरकार ने सरसों का समर्थन मूल्य ३७०० रुपये घोषित कर रखा है लेकिन भारी पैदावार होने के बाद भी जिले भर में सरसों खरीदने की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। यही हाल चने का है। तीन माह पहले तक चने का बाजार भाव ८५०० प्रति क्विंटल था जो अब ५५०० रह गया है। इन हालातों मेंं किसान कितने दिनों तक सर्वाइव कर सकता है सरकार को विचार करने की आवश्यकता है।

भाव तय करने में किसानों की हो सहभागिता

गेहूं की फसल बेचने आए ऐंतहार के श्रीकृष्ण और विठौली के रामप्रसाद ने बताया कि हर उत्पादक अपने उत्पाद का भाव खुद तय करता है के वल किसान ही ऐसा है जिसके उत्पाद का मूल्य एअरकंडीशन में बैठे लोग तय करते हैं। सरकार वास्तव में किसान को सुखी देखना चाहती है तो राष्ट्रीय स्तर पर एक आयोग गठित किया जाए जिसमें किसानों को भी शामिल किया जाए। फसल की लागत और किसान की मजदूरी, फ सल में होने वाले जोखिम क ो देखकर भाव तय किए जाएं। मंडियों में किसानों के साथ होने वाली लूट क ो रोकने के लिए कड़े कदम उठाएं जाएं।

जाने क्या बचता है किसान को

गेहूं

जुताई, सिंचाई, बीज खाद पर लागत ३०००

मंडी तक लाने का भाड़ा १५०० रुपए

एक बीघा में होने वाली पैदावार क्विंटल

पैदावार से आय १२०००

दो लोगों क ो चार माह की मजदूरी १८०००

नुकसान १०५०० रुपए

सरसों

सरसों की लागत ३००० रुपए

मंडी तक लाने का भाड़ा १००० रुपए

एक बीघा में पैदावार ४ क्विंटल

पैदावार से आय १२०००

-दो लोगों क ो चार माह की मजदूरी १८०००

नुकसान १० हजार रुपए

आंकड़े प्रतिबीघा के

वर्सन

गेहूं के भाव अधिक होने के कारण गत वर्ष की अपेक्षा १० हजार से अधिक किसानों ने रजिस्टे्रशन नहीं कराया था लेकिन अब भाव गिर जाने के कारण मंडी में जाने के सिवाय कि सानो पर दूसरा चारा नही हैं।

अरूण जैन जिला प्रबंधक खाद्य एवं आपूर्ति निगम भिण्ड

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