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Photo Icon #GAS TRAGEDY : इन संकेतों से सबक सीखते, तो इतिहास में दर्ज नहीं होती 'तारीख'

Updated: IST bhopal gas trragedy,union carbide factory,bpl mp
चारों और लाशों का अंबार, पशु-पक्षियों के शव, अपनों के शव देखकर बिलखते लोग, बच्चों के मृत शरीर को अपनी बाहों में उठाए चीखती मां की ममता, सीने में जलन, जलती आंखें फूट पड़ीं। वो चाहते तो ये विनाश रुक सकता था...

भोपाल। बुजुर्ग और बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। दम घुटने और हार्ट अटैक ने हजारों को मौत की नींद सुला दिया। रेल की पटरियां हो या पानी, शहर के अस्पताल और एशिया की सबसे बड़ी मस्जिद की सीढिय़ां, शहर के गली-कूंचों में हाहाकार नहीं जहरीली गैस मिथाइल आइसोसाइनाइट से प्रभावित उन पीडि़तों की कराह थी जो उस समय जिंदा बच गए थे। यही मंजर था 2-3 दिसंबर की दरमियानी रात यूनियन कार्बाइड से लीक हुई जहरीली गैस मिथाइल आइसोसाइनाइट के बादल छंटने के बाद 4 दिसंबर का। भले ही भोपाल गैस ट्रेजेडी के समय हम नहीं थे, लेकिन कई लेखकों और फिल्म निर्माताओं ने उस वक्त के भोपाल के भयावह मंजर को शब्दों में और दृश्यों में ऐसा पिरोया कि उसका अहसास भर होते ही रूह कांप जाती है। यानी 32 साल बाद भी पीडि़तों के जख्म हरे हैं।

इन किताबों, फिल्मों और डॉक्यूमेंट्रीज को देखकर ये सच भी सामने आया कि जिम्मेदार संवेदनशील होता, तो वह इस जहरीली गैस के सच को स्वीकारते हुए भविष्य के हादसों को भांपकर गंभीर और ठोस कदम उठाता। लेकिन कई बार संकेत मिलने के बावजूद किसी ने कुछ नहीं किया...जानें कुछ ऐसे ही अंश जो अहसास दिलाते हैं कि अगर इशारा समझते तो पीढिय़ों का विनाश नहीं होता...

'आज तुम्हारा लबादा ओढऩे की कोई जरूरत नहीं है।' उसने सामान-घर में रहुक लटके रबर के भारी कोट की ओर संकेत करते हुए अपने साथी हरीश खान से कहा, 'फैक्टरी चल नहीं रही, इसलिए गैस लीक होने की कोई सम्भावना नहीं है।' लेकिन खान ने तीखे स्वर में कहा, सब कुछ रुका हुआ हो तो भी गैस निकल पड़ती है। सुरक्षित रहना ही बेहतर है। उस विनाशक फॉसजीन की कुछ बूंदे तुम्हारे पुलोवर पर गिर गईं, तो तुम्हें नुकसान पहुंचा सकती हैं।

कौन थायह शख्स
आप सोच रहे होंगे कि यह आखिर कौन है, जिसे गैस लीक होने पर नुकसान से बचने के लिए सुरक्षा संसाधनों के उपयोग की हिदायत दी गई थी? यह शख्स है लोकप्रिय सितारे शशि कपूर सा दिखने वाला 32 वर्षीय अशरफ। वह शशिकपूर सा दिखने के कारण ही संयंत्र में सबसे लोकप्रिय कर्मचारी था। जो मिथाइल आइसोसाइनाइट का सबसे पहला शिकार बना था। इसकी मौत के बाद भी किसी जिम्मेदार ने इस संयंत्र के खतरनाक प्रभावों से सबक नहीं लिया।

भरोसेमंद तकनीशियनों में से एक
अशरफ कंपनी के सबसे भरोसेमंद तकनीशियनों में से एक था। बाजार के एक छोटे व्यापारी के इस बेटे के पास जो भी कुछ था वह कार्बाइड की बदौलत ही था। उनका निकाह एक कपड़ा व्यापारी की बेटी के साथ भी इसीलिए हो सका कि वह इस फैक्ट्री में काम करता था। अर्थशास्त्र में स्नातक उसकी पत्नी का नाम साजदा बानों था। अशरफ के दो बेटे अरशद और शोएब थे। वे दोनों अपने बेटों का भविष्य भी कार्बाइड के भावी कर्मचारियों के रूप में ही देखा करते थे।

खुद को बचाने की जुगत ही उसकी मौत का कारण बन गई

अशरफ को संयंत्र के कुछ जोड़ अलग करने में चंद मिनट लगे। लेकिन जब वह नया जोड़ लगा रहा था, तब उसने अपने मास्क से देखा कि पाइप के ऊपरी सिरे से थोड़ी-सी तरल फॉसजीन बाहर निकल रही है। कुछ बूंदें उसके स्वेटर पर गिर पड़ीं। खतरा भांपकर वह अपने कपड़ों पर तेजी से पानी डालने के इरादे से तेजी से एक शॉवर केबिन में घुस गया।

यहां पहुंचते ही उसने जानलेवा भूल कर दी। गैस की बूंदों का असर पानी की तेज धार से खत्म होने तक का इंतजार करने के बजाया उसने अपना मास्क उतार दिया। तुरंत उसके स्वेटर की ऊन में फंसी फॉसजीन की बूंदे उसके सीने की गरमी से भाप बनकर उसके नथुनों में घुस गईं। उस समय उसे ज्यादा परेशानी महसूस नहीं हुई। सिर्फ आंखो व गले में हल्की जलन महसूस हुई, वह भी तेजी से गायब हो गई। उसे यह पता ही नहीं था कि फॉसजीन मैकेवली के सिद्धांत की तरह छुपकर अपने शिकार की जान लेती है। पहले तो वह उसमें उल्लास का एक ज्वर पैदा कर देती है। उसकी पत्नी साजदा बानो याद करते हुए बताती है कि उसने इससे पहले उसे कभी खुश नहीं देखा था, सिवाए सगाई वाले दिनों के। वह शायद अपने साथ हुए उस हादसे को भूल ही गया था। वह हम सबको कार में बाहर के इलाके में नर्मदा के किनारे बने उस मकान को दिखाने ले गया, जिसे वह खरीदना चाहता था।

उसके फेफड़ों में मानों उफान आने लगा
साजदा कहती है कि लेकिन फिर वह अचानक गिर पड़ा। उसके फेफड़ों में मानों उफान आने लगा। वह खून मिले पारदर्शी पदार्थ की उल्टियां कर रहा था। घबराकर साजदा ने फैक्टरी में खबर की। उसे हमीदिया अस्पताल में कार्बाइड की ओर से ही बनाए गए गहन चिकित्सा कक्ष में उसे ले जाया गया। ऑक्सीजन दी गई। लेकिन उसकी पीड़ा बढ़ती गई। उसकी उल्टियां भी बढ़ती जा रही थीं और बलगम की मात्रा भी। हालत यह हो गई कि उसमें कै करने की ताकत न रही।

चादर की तरह सफेद हो गया था अशरफ
साजदा को अपने ससुराल वालों में से कुछ को धक्का देकर ही पति के पास जाने का मौका मिला। उसने बताया कि अशरफ चादर की तरह सफेद हो गया था। लेकिन जैसे ही उसे मेरी मौजूदगी का अहसास हुआ। उसने अपनी आंखें खोल दीं और ऑक्सीजन मास्क उतार दिया। उसने कहा मेरे दोनों बेटों को लाओ उनसे अलविदा कहना है।

सबकुछ एक पल में खत्म
साजदा अपने दोनों बेटों के साथ लौटी तो अशरफ ने छोटे वाले बेटे को अपनी बाहों में भर लिया। मुस्कराने की कोशिश करते हुए उसने पूछा बेटा मछली पकडऩे के लिए एक यात्रा की कल्पना तुम कैसे कर सकते हो? लेकिन उसकी इस कोशिश ने खांसी का जबरदस्त दौरा शुरू कर दिया। उसके बाद वह थोड़ी देर छटपटाया और मौत के आगोश में चला गया।

पूरी फैक्टरी इस शहीद को लेकर गमगीन थी। हादसे से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाला कंपनी का प्रबंध निदेशक भी था। वारेन वूमर। उसका कहना था कि हमारे पास खुद को उलाहना देने के लिए कुछ भी नहीं था। मोहम्मद अशरफ को इस पेशे के खतरों के प्रति पूरी ईमानदारी से प्रशिक्षित किया गया था। अपना रबर कोट न पहनकर और मास्क को जल्दी उतारकर उसने भयंकर भूल की थी।

एक बड़ा सबक किया नजरअंदाज
गैस ट्रेजेडी के दो साल पहले हुआ ये हादसा एक बड़ा सबक हो सकता था, जिसे किसी ने गंभीरता से नहीं लिया। ऐसे ही कुछ अंश हम आपसे शेयर करेंगे, जिनसे आप अब तक हैं अनजान...

साभार: भोपाल, बारह बजकर पांच मिनट
लेखक : डोमिनीक लापिएर, जेवियर मोरो

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