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#GAS TRAGEDY: लगातार होते रहे हादसे, पर भोपाल की मौत को करते रहे नजरअंदाज

Updated: IST Bhopal gas tragedy,2-3 december 1984,bpl,mp
अशरफ की मौत के महीना भर बाद 10 फरवरी 1982 को एक और दुर्घटना हुई, जिसमें 25 कर्मचारियों को जहरीली गैस के प्रभाव में तुरंत अस्पताल में भर्ती करना पड़ा।तो रुक सकती थी विनाशलीला..अंश दो

भोपाल। मोहम्मद अशरफ पहला ऐसा शख्स था जो गैस के संपर्क में आया और मौत की नींद सो गया। हालांकि किसी ने इस हादसे से सबक नहीं लिया। लेकिन हद तब हुई जब अशरफ की मौत के महीना भर बाद 10 फरवरी 1982 को एक और दुर्घटना हुई, जिसमें 25 कर्मचारियों को जहरीली गैस के प्रभाव में तुरंत अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। संयोग से इस बार कोई मौत नहीं हुई। तो रुक सकती थी विनाशलीला..अंश दो

फॉसजीन पंप से गैस लीक हुई थी
अशरफ की मौत के बाद दोनों ही ट्रेड यूनियन के कर्मचारियों में रोष था। दरअसल एक सुरक्षा नियम था, जिसके तहत फॉसजीन का निर्माण करने वाली इकाई में उत्पादन का काम बंद होने की स्थिति में गैस के भंडारण करने पर पाबंदी थी। अशरफ के अपना आखिरी काम करने के वक्त उत्पादन बंद था। लिहाजा पाइपों में जरा भी गैस नहीं होनी चाहिए थी। लेकिन इस नियम के बावजूद टैंकों में कुछ मात्रा में गैस छोड़ दी गई। किसी भी जिम्मेदार अधिकारी ने उस अभागे ऑपरेटर को इसकी चेतावनी तक नहीं दी थी। यह एक ऐसा तथ्य था, जिसके लिए कंपनी जवाबदेही थी। उस समय दो ट्रेडयूनियनों के नेताओं के मुताबिक यह स्पष्ट रूप से कार्बाइड के सुरक्षा मानकों में आई गिरावट की ओर संकेत था। इसलिए वे लोग मध्यप्रदेश सरकार से यह कहने वाले थे कि तुरंत ही फैक्टरी को अत्यधिक जोखिमपूर्ण उत्पाद बनाने वाली फैक्टरियों की श्रेणी में डाले, जिससे कंपनी के लिए ज्यादा कड़ी सुरक्षा जरूरतों का पालन करना अनिवार्य हो जाए।

पहली बार अहसास हुआ सुरक्षा मानकों की अनिवार्यता का

पहली बार लोगों को यह अहसास हुआ था कि सुरक्षा मानकों की अनिवार्यता होनी चाहिए। जिन वस्तुओं के साथ वे काम कर रहे थे, ये प्राणघातक भी थीं और इस बार खतरे का एक भयानक चेहरा भी सामने आ चुका था। ट्रेड यूनियन नेताओं का गुस्सा सिर्फ इस बात पर था कि गैस से पीडि़त लोगों में से किसी को संवेदनशील इलाके में जाते हुए सुरक्षा मास्क पहनने का आदेश किसी ने नहीं दिया था। इसके विपरीत प्रबंधन ने खुद को बचाते हुए मशीनी खामी बताकर यह तक कह डाला था कि मशीनी खामी के चलते होने वाले गैस रिसाव का विषैलापन इतना नहीं हो सकता कि जान ले ले।

पांच अक्टूबर को फिर हुआ हादसा

पांच अक्टूबर को फैक्टरी में एक बार फिर हादसा हुआ। अशरफ की मौत के बाद यह तीसरा हादसा था। लेकिन इस बार मिथाइल आइसोसाइनेट बनाने वाली यूनिट में यह हादसा हुआ। जब एक ऑपरेटर एमआईसी पाइपलाइन में एक वॉल्व को खोल रहा था, तो उसे कई अन्य पाइपों से जोडऩे वाला जोड़ अचानक फट पड़ा था। जिससे जहरीली गैस का एक विशाल बादला सा बन गया। भाग निकलने से पहले ऑपरेटर ने अलार्म सायरन बजा दिया। मस्तूल के ऊपर लगी चिडिय़ा बता रही थी कि उत्तर-पूर्वी दिशा की ओर हल्की हवा बह रही थी। फैक्टरी के भीतर मौजूद सारे लोग जितनी तेजी से सम्भव था, उसकी विपरीत दिशा में दौडऩे लगे यानी काली ग्राउंड्स की बस्तियों की ओर।

उस वक्त भी मंजर यही था कि लोग चिल्ला रहे थे। भागो-भागो एक दुर्घटना घटी है। एक ने अपनी उफनती सांसों को थामने की कोशिश करते हुए कहा कि संयंत्र में गैस भर गई है। अगर अवा इस दिशा में बहने लग गई, तो तुम सब चपेट में आ जाओगे। लेकिन उस समय फैक्टरी के सायरन की लगातार आ रही आवाज फैक्टरी के सर्वेसर्वा के रूप में बैठे लोगों के इस विश्वास को नहीं तोड़ पाया था कि कोई भयावह अनहोनी भोपाल को तबाह कर देगी।

अभागे अशरफ को छोड़ दिया जाए, तो कार्बाइड में अब तक हुए हादसों ने किसी की जान नहीं ली थी। दोनों ही ट्रेड यूनियन के नेताओं ने इस दौरान छह हजार नोटिस छपवाए, जिन्हें उनकी यूनियन के सदस्यों ने पूरे शहर में फैक्टरियों और अन्य कई जगह चस्पा किया था।

नोटिस की इबारत में दर्ज थे हादसे

सावधान!सावधान!सावधान! दुर्घटनाएं!दुर्घटनाएं!दुर्घटनाएं! बड़े-बड़े लाल अक्षरों में विरोध की आवाज मुखर थी, जिसके चलते हजारों कर्मचारियों और भोपाल के लाखों बाशिंदों की जान खतरे में है। इस नोटिस में अब तक हुए सारे हादसों की सूची के अलावा श्रम कानून के बार-बार उल्लंघन और सुरक्षा मानकों में ढिलाई का हवाला दिया गया था, लेकिन वास्तव में जनमत जुटाने के इरादे से यूनियन नेता मालवीय एक ज्यादा असरदार हथियार आजमाने की फिराक में था।

एक पत्रकार ने लिखे थे कई आलेखों ने चेताया, कोई नहीं जागा

* 17 सितम्बर 1982 को पहला आलेख था 'कृपया हमारे शहर को बख्शें' कई उदाहरण देकर फैक्टरी द्वारा पैदा किए जा रहे जोखिम का चित्रण किया था। पूरी आबादी को खतरे का इशारा दिया था। लेकिन यह पहला आर्टिकल छपा पढ़ा भी गया। चर्चा में नहीं आया।

* दो हफ्ते बाद फिर एक नया आलेख लिखा...भोपाल: हम एक ज्वालामुखी पर बैठे हैं... इसमें साफ था वह दिन दूर नहीं जब भोपाल एक मृत शहर होगा..
लेकिन इस आर्टिकल को भी किसी ने गंभीरता से नहीं लिया।

* अगले सप्ताह फिर एक और आलेख प्रकाशित था, 'अगर तुमने समझने का प्रयास न किया, तो तुम धूल में मिल जाओगे।'

लेकिन अब भी उतनी ही उपेक्षा और नजरअंदाजी ने उस पत्रकार का दिल तोड़ दिया। उसने अखबार बंद कर दिया। भोपाल छोड़कर इंदौर चला गया। लेकिन उसने भोपाल छोडऩे से पहले मध्यप्रदेश के रोजगार मंत्री को जवाब देना चाहा, जिसने उस समय विधानसभा में यह घोषणा की थी कि 'कार्बाइड फैक्टरी की मौजूदगी से कोई खतरा नहीं है, क्योंकि वहां पैदा होने वाली फॉसजीन गैस जहरीली नहीं है।' दो लंबे पत्रों में उस पत्रकार ने अपनी व्यक्तिगत रूप से की गई छानबीन के निष्कर्षों का सार लिखा था। पहला पत्र उसने तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को लिखा, जो कार्बाइड के निदेशकों को निजी तौर पर जानते थे। दूसरा पत्र सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को एक याचिका के रूप में लिखा, जिसमें फैक्टरी बंद करने की अपील थी। लेकिन दोनों में से किसी ने भी लेखक को उत्तर देेने की आवश्यकता नहीं समझी।

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