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MP के इस अधूरे मंदिर में पूरी होती है मनोकामनाएं, विश्व में सबसे बड़ा है शिवलिंग

Updated: IST bhojpur temple
महाशिवरात्रि के मौके पर mp.patrika.com आपको बता रहा है भोजपुर के इस ऐतिहासिक मंदिर के बारे में दिलचस्प रहस्य...। लोगों का मानना है कि इस शिवलिंग के दर्शन का महत्व सोमनाथ के मंदिर के जैसा है...।

भोपाल। देवों के देव महादेव के दुनियाभर में हजारों ऐतिहासिक मंदिर हैं। हर एक के पीछे रोचक कहानी है। इन्हीं में से एक है मध्यप्रदेश का भोजपुर मंदिर। दुनिया के सबसे विशाल शिवलिंग और इसके मंदिर निर्माण की कहानी भी दिलचस्प है। यह मंदिर मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से 28.1 किमी दूर स्थित भोजपुर में बेतवा नदी के किनारे है।

इसे भोजेश्वर मंदिर या मध्य भारत का सोमनाथ मंदिर भी कहा जाता है। लोगों का मानना है कि जो सोमनाथ दर्शन करने नहीं जा पाते, वे भोजेश्वर मंदिर में दर्शन करके उतना ही पुण्य प्राप्त कर सकते हैं। कुछ लोग इसे राजाभोज के कार्यकाल का बताते हैं वहीं कुछ लोग मानते हैं कि वनवास के दौरान इस शिव मंदिर को पांडवों ने बनवाया था और भीम इसी मंदिर पर घुटनों के बल बैठकर शिवलिंग पर फूल चढ़ाया करते थे।

महाशिवरात्रि के मौके पर mp.patrika.com आपको बता रहा है भोजपुर के इस ऐतिहासिक मंदिर के बारे में दिलचस्प रहस्य...।

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पिता की स्मृति में बनवाया
माना जाता है कि इस मंदिर को राजा भोज ने एक हजार साल पहले 1010 से 1055 के बीच बनवाया था। यह मंदिर उन्होंने अपने पिता की याद में बनवाया था। भोजपुर के शिवधाम से जुड़ी एक कहानी भी काफी प्रचलित है। वह यह है कि पांडवों की मां कुंती ने बेतवा नदी में कर्ण को छोड़ा था। यहां के स्थानीय लोगों की माने तो मंदिर का निर्माण पांडवों के हाथों से हुआ था।

इस अधूरे मंदिर में मनोकामनाएं होती है पूरी
दुनियाभर में शिवालय हैं, लेकिन भोजपुर का मंदिर अपने आप में अनोखा है। यह मंदिर भोजपुर की छोटी से पहाड़ी पर है जो अधूरा शिवमंदिर है। लोगों की आस्था है कि यहां हमारी मनोकामना पूरी होती है। इसलिए श्रावण के प्रत्येक सोमवार को यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है, वहीं महाशिवरात्रि पर बड़ा मेला लगता है, जिसमें एक लाख से अधिक लोग दर्शन करने पहुंचते हैं।

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यह है इस मंदिर की खासियत

1. एक ही पत्थर से बना है शिवलिंग
इस मंदिर का निर्माण परमारवंश के राजा भोज ने बनवाया था। इस मंदिर की खासियत यह है कि इसका शिवलिंग काफी विशाल है जो विश्व का एक मात्र ऐसा शिवलिंग है जो एक ही पत्थर से बना हुआ है। इसकी लम्बाई 18 फीट (साढ़े पाच मीटर), व्यास साढ़े सात फीट (2.3 मीटर) है। जबकि लिंग की लंबाई 12 फीट (3.85 मीटर) है।

2. 70 टन वजनी पत्थरों के लिए बना था रास्ता
गौर करने वाली बात यह भी है कि मंदिर के पिछले हिस्से में एक ढलान है, जिसकी मदद से विशाल पत्थरों को ढोकर मंदिर तक लाया गया था। प्राचीन काल में यही तकनीक अपनाई जाती थी। इतिहासकार भी इसके प्रमाण के बारे में बताते हैं।

3. अधूरा रह गया भोजेश्वर मंदिर
इस मंदिर की तीसरी खासियत यह है कि इसका निर्माण अधूरा रह गया था। यह अधूरा क्यों रह गया इसके पीछे इतिहास में कोई प्रमाण नहीं मिलते हैं, लेकिन ऐसी मान्यता है कि यह मंदिर एक ही रात में बनाया गया था, लेकिन छत का काम पूरा होने से पहले ही सूर्योदय हो गया इसलिए काम छोड़ दिया गया था।

4. सबसे बड़ा है इसका दरवाजा
चौथी खासियत यह मानी जाती है कि इस मंदिर का दरवाजा किसी भी हिन्दू इमारत के दरवाजों में सबसे बड़ा है। इस मंदिर के गर्भ गृह के ऊपर जो गुम्बद आकार की छत है वह भी भारत में ही निर्माण के प्रचन को प्रमाणित करती है। कुछ विद्वान मानते हैं कि यह भारत में सबसे पहली गुम्बद आकार की छत है।

5. चार स्तम्भों पर टिका है मंदिर
इस मंदिर की पांचवी खासियत यह है कि मात्र चार स्तम्भों पर गुम्बज टिका हुआ है। यह जमीन से करीब 40 फीट ऊंचा है। इन्हीं गुम्बजों पर अधूरी छत टिकी हुई है। मंदिर के ठीक सामने पार्वती गुफा नामक गुफा है। यहां पुरामहत्व की अनेक मूर्तियां रखी हुई है। मंदिर के पास ही चट्टानों पर नक्शे बने हुए हैं। उससे पता चलता है कि मंदिर पर मंडल, महामंडल और अंतराल बनाने की योजना थी जो नहीं बन पाई।

6. जैन मंदिर भी है अधूरा
मंदिर के पीछे महज आधा किलोमीटर दूर एक जैन मंदिर है वह भी अधूरा ही है। इस मंदिर में भगवान शांतिनाथ की मूर्ति है। जो जमीन से 6 मीटर ऊंची है। इनके अलावा दो अन्य मूर्तियां भी हैं जो पार्श्वनाथजी व पुपारासनाथजी की हैं। इस मंदिर के शिलालेख पर भी राजाभोज का नाम लिखा है। इसी मंदिर परिसर में आचार्य माटूंगा का समाधिस्थल भी है। इस पर लिखा है भक्तामर स्रोत्र।

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