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यहां रहती है एक आत्मा!, नाराज किया तो गिरा देती है ट्रेन

Updated: IST patalpani station
महू के पास पातालपानी के जंगल में कालाकुंड रेलवे ट्रेक के पास अंग्रेजों ने गोली मारकर दफनाया था इन्हें। इसके बाद से लगातार हो रहे हादसों को देखते हुए रहवासियों ने बनाया मंदिर।

भोपाल। इस मंदिर के पास से गुजरने वाली सभी ट्रेनें मंदिर को दो मिनट सलाम करती हैं। कहा जाता है कि इसके बाद ही ट्रेन में सवार यात्री सही सलामत अपने गंतव्य तक पहुंच पाते हैं। स्थानीय लोग बताते हैं कि यदि यहां पर ट्रेन रुककर सलामी न दे तो वह दुर्घटनाग्रस्त हो जाती है या खाई में गिर जाती है।

ऐसी भी कहानियां हैं कि सलामी देना भूलने पर कई बार तो ट्रेन यहां से आगे ही नहीं बढ़ सकी। इसलिए यहां भारतीय रेल ने खुद एक अघोषित नियम बना लिया है कि यहां रेल ड्राइवर कुछ देर ट्रेन को रोके और सलामी के रूप में हार्न बजाकर ही गाडी आगे बढ़ाए।

दरसअल, यह मंदिर कभी अंग्रेजों के छक्के छुड़ा देने वाले (आजादी के जननायक) और मध्यप्रदेश के रॉबिनहुड यानि टंट्या मामा भील का है। वहीं टंट्या भील जिसे अंग्रेजों ने फांसी देने के बाद उनका शव पातालपानी के जंगलों में कालाकुंड रेलवे ट्रैक के पास दफना दिया था। लोगों का मानना है कि टंट्या मामा का शरीर तो खत्म हो गया, लेकिन आत्मा अमर हो गई। जो आज भी इन जंगलों में निवास करती है।

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इस हत्या के बाद से यहां लगातार रेल हादसे होने लगे। इन हादसों में सैंकड़ों लोग शिकार होने लगे, लगातार होने वाले इन हादसों के मद्देनजर आम रहवासियों ने यहां टंट्या मामा का मंदिर बनवाया। तब से लेकर आज तक मंदिर के सामने हर रेल रुकती है और मामा प्रतीकात्मक सलामी देने के बाद अपने गंतव्य तक पहुंचती है।

वहीं रेलवे अधिकारी इस कहानी को सिरे से नकारते हैं, उनकी मानें तो यहां से रेल का ट्रैक बदला जाता है, पातालपानी से कालाकुंड का ट्रैक काफी खतरनाक चढ़ाई है, इसलिए ट्रेनों को ब्रेक चेक करने के लिए यहां रोका जाता है। चूंकि यहां मंदिर भी बना है, इसलिए सिर झुकाकर ही आगे बढ़ते हैं।

ट्रेन नहीं रुकी, तो होता है एक्सीडेंट!
स्थानीय लोग बताते हैं कि जब-जब ट्रेन यहां नहीं रोकी गई, तब-तब यहां रेल एक्सीडेंट हुए हैं। जिसके चलते अब कोई भी ट्रेन यहां से गुजरने से पहले टंट्या मामा को सलामी जरूर देती है। वे कहते हैं आज भी यदि कोई ट्रेन यहां नहीं रूकती और बिना सलामी दिए आगे बढ़ जाती है, तो उसका एक्सीडेंट होना सुनिश्चित मान लिया जाता है।

महू मीटरगेज लाइन पर स्थित आजादी के जननायक टंट्या मामा भील के मंदिर के पास से गुजरने वाली ट्रेनें उन्हें एक मिनट सलाम करती है। कहते हैं यदि यहां पर ट्रेन रुककर सलामी न दे तो वह दुर्घटनाग्रस्त हो जाती है या खाई में गिर जाती है। ऐसी भी कहानियां हैं कि सलामी देना भूलने पर कई बार तो ट्रेन उस स्थान से आगे ही नहीं बढ़ सकी। इसलिए यहां भारतीय रेल ने खुद एक अघोषित नियम बना लिया है कि यहां रेल ड्राइवर कुछ देर ट्रेन को रोके और सलामी के रूप में हार्न बजाकर ही गाडी आगे बढ़ाए।

जाने 'टंट्या मामा भील' के बारे में...
इतिहासकारों की मानें तो खंडवा जिले की पंधाना तहसील के बडदा में सन् 1842 के करीब भाऊसिंह के यहां टंट्या का जन्म हुआ। पिता ने टंट्या को लाठी-गोफन व तीर-कमान चलाने का प्रशिक्षण दिया। टंट्या ने धर्नुविद्या में दक्षता हासिल करने के साथ ही लाठी चलाने और गोफन कला में भी महारत प्राप्त कर ली। युवावस्था में ही अंग्रेजों के सहयोगी साहूकारों की प्रताडऩा से तंग आकर वह अपने साथियों के साथ जंगल में कूद गया।

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रॉबिनहुड बनने की कहानी
टंट्या एक गांव से दूसरे गांव घूमता रहा। मालदारों से माल लूटकर वह गरीबों में बांटने लगा। लोगों के सुख-दु:ख में सहयोगी बनने लगा। इसके अलावा गरीब कन्याओं की शादी कराना, निर्धन व असहाय लोगों की मदद करने से ‘टंट्या मामा’ सबका प्रिय बन गया। जिससे लोग उसकी पूजा करने लगे।
अमीरों से लूटकर गरीबों में बांटने के कारण वह आदिवासियों का रॉबिनहुड बन गया। ज्ञात हो कि रॉबिनहुड विदेश में कुशल तलवारबाज और तीरंदाज था, जो अमीरो से माल लूटकर गरीबों में बांटता था।

टंट्या का प्रभाव मध्यप्रांत, सी-पी क्षेत्र, खानदेश, होशंगाबाद, बैतुल, महाराष्ट्र के पर्वतीय क्षेत्रों के अलावा मालवा के पथरी क्षेत्र तक फ़ैल गया। टंट्या ने अकाल से पीडि़त लोगों को सरकारी रेलगाड़ी से ले जाया जा रहा अनाज लूटकर बटवा दिया। कहते हैं उस समय टंट्या मामा के रहते कोई गरीब भूखा नहीं सोएगा, यह विश्वास भीलों में पैदा हो गया था।

तब देखने को मिली लोकप्रियता
अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाला टंट्या मामा गरीबों की मदद करने के कारण काफी लोकप्रिय था। इसकी बानगी तब देखने को मिली, जब 11 अगस्त, 1896 को उसे गिरफ्तार करके अदालत में पेश करने के लिए जबलपुर ले जाया गया। इस दौरान टंट्या की एक झलक पाने के लिए जगह-जगह जनसैलाब उमड़ पड़ा था।
इसके बाद 19 अक्टूबर 1889 को टंट्या को फांसी की सजा सुनाई गयी और महू के पास पातालपानी के जंगल में उसे गोली मारकर फेंक दिया गया था। यहीं पर इस ‘वीर पुरुष’ की समाधि बनी हुई है, और यहां से गुजरने वाली ट्रेनें रूककर सलामी देती हैं।

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