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एमपी के ये स्थान देखकर यूनेस्को भी हैरान!

Updated: IST mp tourist place
विश्व धरोहरों में मध्यप्रदेश की कई विरासतें हैं शामिल,स्थलों के संरक्षण की पहल संयुक्त राष्ट्र के अंतर्राष्ट्रीय संगठन यूनेस्को ने 1968 में की थी।

भोपाल। विरासतों को संरक्षित करने के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए 18 अप्रैल को पूरे विश्व में विश्व धरोहर दिवस मनाया जाता है। इस दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य यह है कि पूरे विश्व में मानव सभ्यता से जुड़े ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों के संरक्षण के प्रति चेतना जगायी जा सके।

धरोहर यानि मानवता के लिए अत्यंत महत्व की जगह, जो आगे आने वाली पीढिय़ों के लिए बचाकर रखी जाती हैं, उन्हें विश्व धरोहर के रूप में जाना जाता है। ऐसे महत्वपूर्ण स्थलों के संरक्षण की पहल संयुक्त राष्ट्र के अंतर्राष्ट्रीय संगठन यूनेस्को ने सन् 1968 में की थी।

इसके तहत सर्वप्रथम विश्व प्रसिद्ध इमारतों और प्राकृतिक स्थलों की रक्षा के लिए एक साझा विचार बनाया गया। फिर 1972 में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान इस प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र के सामने प्रस्ताव पारित किया गया। इस दौरान विश्व के लगभग सभी देशों ने मिलकर ऐतिहासिक और प्राकृतिक धरोहरों को बचाने की शपथ ली। इस तरह ‘यूनेस्को वल्र्ड हेरिटेज सेंटर’ का अस्तित्व प्रकाश में आया।

इसके बाद 18 अप्रैल, 1978 ई. में सर्वप्रथम विश्व के कुल 12 स्थलों को विश्व विरासत सूची में शामिल किया गया। इस दिन को तब ‘विश्व स्मारक और पुरातत्व स्थल दिवस’ के रूप में मनाया गया। था। लेकिन यूनेस्को वर्ष 1983 से इस दिवस को "विश्व विरासत दिवस" के रूप में मनाने लगा।
वहीं 1972 में लागू एक अंतर्राष्ट्रीय संधि के तहत विश्व भर के धरोहर स्थलों को मुख्यत: तीन श्रेणियों में विभक्त किया गया। पहला प्राकृतिक धरोहर स्थल, दूसरा सांस्कृतिक धरोहर स्थल और तीसरा मिश्रित धरोहर स्थल।

भारत का महत्वपूर्ण स्थान:
विश्व धरोहरों के मामले में भारत का दुनिया में महत्वपूर्ण स्थान है और यहां के ढाई दर्जन से अधिक ऐतिहासिक स्थल, स्मारक और प्राचीन इमारतें यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल हैं।
भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों का जिक्र करें तो ऐसे बहुत से स्थानों का नाम जहन में आता है, जिन्हें विश्व धरोहर सूची में महत्वपूर्ण स्थान हासिल है।

अनेक भारतीय स्थलों को विश्व धरोहर स्थल के रूप में घोषित किया जा चुका है। इनमें प्रमुख हैं- आगरा का किला (उत्तर प्रदेश), अजंता, एलोरा व एलीफैन्टा की गुफाएं (महाराष्ट्र), सांची के बौद्ध स्तूप (मध्य प्रदेश),चंपानेर-पावागढ का पुरातत्व पार्क (गुजरात), छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (महाराष्ट्र), गोवा के चर्च, फतेहपुर सीकरी, चोल मंदिर (तमिलनाडु), हम्पी के स्मारक (कर्नाटक), महाबलीपुरम के स्मारक (तमिलनाडु), पट्टाडक्कल के स्मारक(कर्नाटक), हुमायूं का मकबरा( दिल्ली), काजीरंगा राष्ट्रीय अभ्यारण्य (असम), केवलदेव राष्ट्रीय अभ्यारण्य (राजस्थान), खजुराहो के मंदिर एवं स्मारक (मध्य प्रदेश),महाबोधी मंदिर(बोधगया, बिहार), मानस राष्ट्रीय अभ्यारण्य(असम), भारतीय पर्वतीय रेल (पश्चिम बंगाल), नंदादेवी राष्ट्रीय अभ्यारण्य व फूलों की घाटी (उत्तरांचल), कुतुब मीनार(दिल्ली), भीमबटेका (मध्य प्रदेश), लाल किला (दिल्ली), कोणार्क मंदिर (उड़ीसा), सुंदरवन राष्ट्रीय अभ्यारण्य (पश्चिम बंगाल), चित्तौडग़ढ़ व गागरोन का किला (राजस्थान), रानी का वाव (गुजरात), ग्रेट हिमालय राष्ट्रीय उद्यान (हिमाचल प्रदेश)आदि शामिल हैं।

मध्य प्रदेश की विरासत -

1. सांची के बौद्ध स्तूप(1989):
सांची का बौद्ध विहार, महान स्तूप के लिए प्रसिद्ध है। यह रायसेन जिले के सांची शहर में स्थित है और भोपाल से उत्तर-पूर्व में 46 किलोमीटर(किमी) दूर है।
सांची स्तूप के निर्माण कार्य का कारोबार अशोक महान की पत्नी देवी को सौंपा गया था, जो विदिशा के व्यापारी की ही बेटी थी। सांची उनका जन्मस्थान और उनके और सम्राट अशोक महान के विवाह का स्थान भी था। पहली शताब्दी में वहां चार आभूषित द्वार बनाए गए थे। सांची के स्तूप का निर्माण मौर्य के समय में ईंटो से किया गया था।

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भोपाल से 46 किमी व बेसनगर और विदिशा से 10 किमी की दूरी पर स्थित सांची मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित एक छोटा सा कस्बा है। यहां स्थित सांची स्तूप प्रेम, शांति, विश्वास और साहस का प्रतीक है। सांची स्तूप और उसके चारों तरफ बने भव्य तोरण द्वार व उन पर की गई मूर्तिकारी भारत की प्राचीन वास्तुकला और मूर्तिकला के सर्वोत्तम उदाहरणों में से एक है। सांची से मिलने वाले अभिलेखों में इस स्थान को 'काकनादबोट' नाम से चिह्नित किया गया है। सांची की कीर्ति राजपूत काल तक तो बनी रही, किन्तु बाद में यह गुमनामी में खो गया।

सांची के स्तूप से संबन्धित जानकारी:
>> सांची के स्तूप का निर्माण मौर्य सम्राट अशोक ने तीसरी शती ई.पू. में करवाया था।
>> ऐसा माना जाता है अशोक ने यहीं इस स्तूप का निर्माण इसलिए कराया क्योंकि उसकी पत्नी देवी, जो विदिशा के एक व्यापारी की बेटी थी, का संबंध सांची से था।
>> चौदहवीं सदी से लेकर वर्ष 1818 में जनरल टेलर द्वारा पुन: खोजे जाने तक सांची सामान्य जन की जानकारी से दूर बना रहा।
>> सर जॉन मार्शल के नेतृत्व में 1912 से लेकर 1919 तक सांची के स्तूप की मरम्मत कराई गयी।
>> सर जॉन मार्शल ने 1919 में सांची में पुरातात्विक संग्रहालय की स्थापना की, जिसे बाद में वर्ष 1986 में सांची की पहाड़ी के आधार पर नए संग्रहालय भवन में स्थानांतरित कर दिया गया।
>> सांची में स्थित स्तूप संख्या-1 या ‘महान स्तूप’ भारत की सबसे पुरानी शैल संरचना है।
>> सांची में स्तूप संख्या-1 या ‘महान स्तूप’ सबसे महत्वपूर्ण स्मारक है।
>> सांची स्तूप में बुद्ध के अवशेष पाये जाते हैं।
>> सांची, विशेष रूप से स्तूप संख्या-1, में ब्राह्मी लिपि के शिलालेख उत्कीर्ण हैं।
>> सांची के स्तूप का व्यास 36.5 मी. और ऊँचाई लगभग 21.64 मी. है।
>> सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाने के बाद सबसे पहले जिस स्तूप का निर्माण कराया वह सांची का स्तूप ही था।
>> बौद्ध धर्म में सांची ऐतिहासिक महत्व का स्थल है,जबकि बुद्ध ने कभी भी सांची की यात्रा नहीं की थी।
>> सांची का निर्माण बौद्ध अध्ययन व शिक्षा केंद्र के रूप में किया गया था।
>> सारनाथ से मिले अशोक स्तम्भ, जिस पर चार सिंह बने हुए हैं, के जैसा ही एक अशोक स्तम्भ सांची से भी मिला है। इन स्तंभों का निर्माण ग्रीको-बौद्ध शैली में किया गया था।
>> सांची का स्तूप बुद्ध के ‘महापरिनिर्वाण’ का प्रतीक है।
>> वर्ष 1989 में इसे युनेस्को द्वारा ‘विश्व विरासत स्थल’ का दर्जा प्रदान किया गया।

2. खजुराहो के मंदिर एवं स्मारक(1986) :

खजुराहो राजपूत वंश के चंदेल शासकों की राजधानियों में से एक रही है यह शासक 10वीं शताब्दी की शुरूआत में सत्ता में आए और यह वंश सन 950 और 1050 के बीच अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचा। चंदेल शासन काल के दौरान खजुराहो में बनाए गए 85 मंदिरों (और जो सन 1335 में इब्ने बतूता जैसे महान यात्री द्वारा देखे जाने के समय भी वैभवशाली थे) में से 22 अभी भी अस्तित्व में हैं और ये लगभग 6 वर्ग किमी में फैले हैं। चंदेल शासकों ने यहां अनेकों तालाबों, शिल्पकला की भव्यता और वास्तुकलात्मक सुंदरता से सजे विशाल मंदिर बनवाए।

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यशोवरमन (954ईं.) ने विष्णु का मंदिर बनवाया जो अब लक्ष्मण मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है और यह चंदेल राजाओं की प्रतिष्ठा का दावा करने वाले इसके समय के एक उदाहरण के रूप में एक आभूषण के रूप में स्थित है।

खजुराहो के मंदिर अपनी वास्तुकलात्मक कला के लिए विश्वविख्यात है और इसे यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत घोषित किया गया है। विश्वनाथ, पाश्र्वनाथ और वैद्यनाथ के मंदिर राजा डांगा के समय से हैं जो यशोवरमन के उत्तरवर्ती थे। जगदम्बी चित्र गुप्ता खजुराहो के भाव्य मंदिरों में पश्चिमी समूह के बीच उल्लेखनीय है। खजुराहो का सबसे बड़ा और महान मंदिर अनश्वर कंदारिया महादेव का है, जिसे राजा गंडा (1017-29ई.) ने बनवाया। इसके अलावा कुछ अन्य उदाहरण भी हैं जैसे कि बामन, आदि नाथ, जवारी, चतुर्भुज और दुल्हादेव कुछ छोटे किन्तु विस्तृत रूप से संकल्पित मंदिर हैं। खजुराहो का मंदिर समूह अपनी भव्य छतों (जगती) और कार्यात्मक रूप से प्रभावी योजनाओं के लिए भी जाना जाता है। यहां की शिल्पकलाओं में धार्मिक छवियों के अलावा परिवार, पाश्र्व, अवराणा देवता, दिकपाल और अप्सराएं व सूर सुंदरियां भी हैं, जो उनकी कोमल और युवा नारीत्व के रूप में अपनी अपार सुंदरता के लिए विश्वभर में प्रशंसित हैं। यहां वेशभूषा और आभूषण भव्यता और मनमोहक हैं।

3. भीमबेटका मध्य प्रदेश (2003) :
भीमबेटका की पहाड़ी गुफाओं को यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत स्थल के रूप में मान्यता दी गई है जो मध्य प्रदेश के मध्य भारतीय पठार के दक्षिण सिरे पर स्थित विंध्याचल पर्वत की तराई में मौजूद हैं। भीमबेटका को पांच पाण्डव राजकुमारों में से एक भीम का निवास स्थान भी कहते हैं। यह प्रागैतिहासिक कला का प्रहरी होने के साथ ही भारतीय स्थापत्य कला का अनुपम खजाना है।

यहां सेंड स्टोन के बड़े खण्डों के अंदर अपेक्षाकृत घने जंगलों के ऊपर प्राकृतिक पहाड़ी के अंदर पांच समूह हैं, जिसके अंदर मिज़ोलिथिक युग से ऐतिहासिक अवधि के बीच की तस्वीरें मौजूद हैं। इस स्थल के पास 21 गांवों के निवासियों की सांस्कृतिक परम्परा में इन पहाड़ी तस्वीरों के साथ एक सशक्त साम्यता दिखाई देती है।

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वास्तव में, इन गुफाओं की पहचान देश के सबसे बड़े प्रागैतिहासिक कला के खजाने के रूप में किया जाता है। भारत के प्रसिद्ध पुरातत्व विशेषज्ञ डॉक्टर वीएस वाकांकर ने इन गुफाओं की खोज की थी। 1958 में उन्होंने नागपुर जाने के रास्ते में अचानक ही दूर के एक पहाड़ी से इन गुफाओं को चिह्नित किया। भीमबेटका गुफाओं की खोज से इस क्षेत्र को अपार प्रसिद्धि मिली। यह पूरा क्षेत्र गुफाओं से पटा है, यहां करीब 600 गुफाएं हैं। यह पूरा क्षेत्र खड़े और बिखरे पत्थरों के बीच सागवान और सखुआ पेड़ों से अटा पड़ा है। इनमें से कुछ गुफाओं में उकेरे हुए चित्र कई युगों पुराने हैं।
वास्तव में, ये गुफाचित्र ही यहां के प्रमुख आकर्षण हैं और ये ऑस्ट्रेलिया के सवाना क्षेत्र और फ्रांस के आदिवासी शैल चित्रों से मिलते हैं जो कालीहारी मरुस्थल के बौनों द्वारा किया गया है। चूंकि, इन गुफाओं का इस्तेमाल विभिन्न कालों में आदिमानवों ने अपने घर के रूप में किया, इसलिए यहां उकेरे गए पेंटिंग्स उनकी जीवनशैली और सांसारिक गतिविधियों को दर्शाते हैं। मौलिक रूपरेखा और रंगों के निपुण चयन ने हमारे पूर्वजों की इन गतिविधियों में जान डाल दी है।

विभिन्न सामुदायिक गतिविधियां जैसे- जन्म, मरण, धार्मिक अनुष्ठान, नृत्य, शिकार खेलना या आखेट दृश्य, जानवरों की लड़ाइयां और आमोद-प्रमोद को इन चित्रों में स्थान दिया गया है. गैंडा, बाघ, जंगली भैंस, भालू, मृग, सूअर, शेर, हाथी, छिपकली इत्यादि को इन चित्रों में देखा जा सकता है। वहीं इन पेंटिंग्स में जो रंग भरे गए थे वो कई युगों बाद अभी तक वैसे ही बने हुए हैं। इन पेंटिंग्स में आमतौर पर प्राकृतिक लाल और सफेद रंगों का प्रयोग किया गया है। अकसर इनमें हरे और पीले रंग का प्रयोग भी किया गया है।
यहां जो सबसे पुरानी पेंटिंग है वो करीब 12 हजार साल पुरानी है जबकि सबसे नवीन पेंटिंग हजार साल पुरानी। सैलानियों के लिए केवल 12 गुफाएं खुली है।

भीमबेटका में पायी जाने वाली कुछ कलाकृतियां तो तकऱीबन 30,000 साल पुरानी हंै। यहां की गुफाये हमें प्राचीन नृत्य कला का उदाहरण भी देती हैं। 2003 में इन गुफाओं को वल्र्ड हेरिटेज साईट घोषित किया गया था।

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