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'ध्वजा को देखने से ही जिन मंदिर होने का आभास होने लगता है'

Updated: IST acharya vidyasagar maharaj
धुआं दूर से देखने मात्र से ही अग्नि होने का अहसास होने लगता है। इसी तरह कई किलो मीटर दूर से ध्वजा दिखाई देने से जिन मंदिर होने का आभास होने लगता है।

सिलवानी. धुआं दूर से देखने मात्र से ही अग्नि होने का अहसास होने लगता है। इसी तरह कई किलो मीटर दूर से ध्वजा दिखाई देने से जिन मंदिर होने का आभास होने लगता है। यह आभास भी होता है कि यहां पर जिनालय है, भगवान का आवास है।

ध्वजा में लोगों को बुलाने की क्षमता होती है। श्रावकों को चाहिए कि वह भी ध्वजा को देख कर भगवान का मंदिर होने का अहसास कर प्रभु को ह्रदय में विराजमान कर स्तुति करें, जीवन सार्थक होता जाएगा। यह उपदेश राष्ट्र संत आचार्य विद्यासागर महाराज ने गुरूवार को व्यक्त किए। वह त्रिमूर्ति जैन मंदिर परिसर में आयोजित किए जा रहे पंच कल्याणक एवं गजरथ महोत्सव में उपस्थित श्रावकों को ध्वजा का महत्व बता रहे थे।

प्रारंभ से ही सार्थक रहा है सिलवानी का नाम
आचार्य श्री ने कहा कि हवा प्रवाहित होने से ध्वजा लहराती है, जबकि हवा को न तो कैमरे में कैद किया जा सकता है और न ही डिब्बे में बंद की जा सकती है। जबकि ध्वजा को ह्रदय में स्थापित किया जा सकता है। ध्वजा उत्प्रेरित करने का काम करती है। प्रेरणा के कारण ही रुकना पड़ता है और इसी प्रेरणा के कारण ही नगर में रुकना पड़ा।

सिलवानी का नाम प्रारंभ से ही सार्थक रहा है जो कि भावनात्मक रूप किसी को भी आने तथा रुकने के लिए प्रेरित करने का कार्य करता है। आचार्य ने कहा कि विधान का एकमात्र उद्देश्य बीतरागता है। बीतरागता उसी श्रावक को प्राप्त होती है जो कि वैभवशाली होते हुए भी वैभव से नाता नहीं रखता है। वैभव को जीवन में आत्मसात करने वाले को कभी बीतरागता प्राप्त नहीं हो सकती है। गृहस्थ श्रावक भी भगवान की स्तुति विधान कर बीतरागता को बीलारोपण कर देता है, दूसरों को बीतरागता की प्रेरणा देने के लिए प्रेरक बना जा सकता है।

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