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ढाई करोड़ खर्च करने के बाद भी इस उद्योग की तस्वीर नहीं बदली

Updated: IST women making silk thread in the industry.
एक किलो रेशम धागे की उत्पादन लागत 3200 रुपए, भाव मिल रहे मात्र 2500, 100 किलो धागे का माल स्टॉक में पड़ा, कोकून की खराबी के कारण अधिक लागत में बन रहा धागा

बुरहानपुर. रेशम उद्योग को कोकून की खराब गुणवत्ता का शिकार होना पड़ रहा है। धागे के उत्पादन लागत से कम भाव मिलने के कारण 100 किलो धागा बनकर उद्योग में पड़ा है, जिसका उठाव दो माह से नहीं हुआ है। इसे लेकर अफसरों में भी चिंता है। इधर उद्योग में काम करने वाले कर्मियों को भी तीन माह से वेतन नहीं मिला है और अब तक मजदूरी बढ़ाने की मांग को लेकर भी विरोध शुरू कर दिया है।

ढाई करोड़ रुपए की लागत से बने रेशम उद्योग की शुरुआत हुए छह साल हो चुके हैं। अभी तक इसकी तस्वीर नहीं बदली है। शुरुआत के तीन सालों में अफसरों ने इस ओर ध्यान दिया जिससे तेजी से उछाल देखने को मिला। मात्र 4 किसानों से शुरू हुई कोकून की खेती करने वाले उत्पादकों की संख्या 900 तक पहुंच गई। लेकिन अप्रैल 2015 से हालत खराब है। इसमें भारी गिरावट देखने को मिली। रेशम धागे के भाव बाजार में गिरने के बाद किसानों को उचित भाव नहीं मिले। रेशम उद्योग का यह हाल देख नए उत्पादक नहीं जुड़े। कोकून की खेती करने वाले किसानों की संख्या भी 600 हो गई।

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1500 से 2 हजार का टेंडर

बाजार में रेशम धागा पहले 3200 से 4 हजार रुपए प्रति किलो बिकता था, जो घटकर अब टेंडर 1500 से 2 हजार रुपए किलो पर खुल रहा है। जब भाव उचित नहीं मिल हैं, तो धागे का उठाव भी नहीं हो पा रहा है। इस चक्कर में 100 किलो धागा बनकर पड़ा है। अफसरों का कहना है कि कोकून उचित गुणवत्ता वाला नहीं आ पा रहा है। इसलिए 3200 रुपए की लागत एक किलो धागा बनाने में पड़ रही है। इसलिए धागा नहीं बेच पा रहे हैं। विभाग के मुताबिक 10 किलो कोकून में 1 किलो धागा बन रहा है। जबकि उच्च गुणवत्ता का कोकून हो तो 4 किलो धागा बन जाता है। यही हाल रहे तो उद्योग को फीका कर सकता है।

होशंगाबाद में बनता था धागा

कोकून को पहले होशंगाबाद भेजा जाता था, जहां धागे का निर्माण होता था। इसका उत्पादन बुरहानपुर में हो इसके लिए इंदौर-इच्छापुर रोड पर 2 करोड़ 46 लाख रुपए की लागत से रेशम उद्योग के लिए भवन तैयार किया गया। ऐसे तो उद्योग पिछले छह-साल से चल रहा है, लेकिन एक साल पहले से धागा बनने की शुरुआत बुरहानपुर में हुई। मशीन की क्षमता के हिसाब से शुरुआत में मात्र 150 ग्राम धागा बना। बाद में 300 ग्राम तक पहुंचा।

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ऐसे होती है खेती

रेशम विभाग किसानों को कोकून के कीड़े देता है, जिसे शिशुक्रमी कहते हैं। किसान एक साल में यह खेती लेता है। कोकून की गुणवत्ता के आधर पर विभाग इसकी खरीददारी करता है। इसके बाद उद्योग में धागा तैयार होता है। जिसे होशंगाबाद में ले जाकर नीलामी की जाती है।

आंकड़े एक नजर में-

2600 किलो कोकून का उत्पादन इस बार

1500 से 2000 पर आए धागे के भाव

700 किसान जिले में करते हैं खेती

1 एकड़ में 200 से 400 किलो तक उत्पादन

1500 एकड़ में बुरहानपुर में प्लांटेशन

300 ग्राम धागा प्रतिदिन बुरहानपुर में उत्पादन

25 महिलाएं वर्तमान में कर रही काम

यह भी है रुचि घटने का कारण

रेशम विभाग की ओर से पहले उत्प्रेरक विकास कार्यक्रम योजना चलती थी, जो बंद कर दी गई। इसमें ड्रीप, मकान, उपकरण आदि दिए जाते थे। अब किसानों को यह व्यवस्था करनी पड़ रही है। इसकी जगह मनरेगा में इसका प्रावधान किया है। लेकिन यह योजना 5 एकड़ जमीन वाले किसानों तक सीमित है।

1500 की जगह 5 हजार देने की मांग

यहां 25 महिलाएं काम कर रही है, जो दिनभर की मजदूरी के बाद मात्र 50 रुपए रोज के हिसाब से 1500 रुपए माह कमा पाती है। बुरहानपुर से आने वाली महिलाओं का कहना है कि 20 रुपए रोज तो बस के किराये में चला जाता है। मजदूर वैशाली पाटिल, ज्योति गवले, छाया बाई सोनवणे, सुवर्णा वारुडे, सुलोचना वारुडे, अनिता वारुडे, कविता लोंडे आदि ने कहा कि शासन से हमें मजदूरी के रूप में कम से कम 5 हजार रुपए मिलना चाहिए।

पहले से उत्पादन अच्छा बढ़ गया है। होशंगाबाद में टेंडर पर अच्छे रेट मिलने पर हम धागा बेचते हैं। कोकून की क्वालिटी पर भी धागा उत्पादन निर्भर करता है। महिलाओं की मजदूरी उच्च विभाग से तय है।- एचआर सोनी, नोडल अधिकारी रेशम उद्योग

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