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शिव पार्वती की तरह हो पति-पत्नी का रिश्ता

Updated: IST chhindwara
परिवार के बच्चों में संस्कार माता-पिता से ही आए हैं क्योंकि वे उन्हीं के अंश होते हैं। बच्चों विनम्र,प्रेमी,प्रसन्नचित्त तब रहेंगे जब माता-पिता में यह संस्कार की बीज होंगे।

छिंदवाड़ा. परिवार के बच्चों में संस्कार माता-पिता से ही आए हैं क्योंकि वे उन्हीं के अंश होते हैं। बच्चों विनम्र,प्रेमी,प्रसन्नचित्त तब रहेंगे जब माता-पिता में यह संस्कार की बीज होंगे। बच्चों को संस्कारित बनाने के उनका आपस में व्यवहार प्रेमपूर्ण होना जरूरी है, एक दूसरे के प्रति विनम्रता जरूरी है। दोनों के बीच वार्तालाप के समय प्रसन्न चित्त होना चाहिए। यह बात दशहरा मैदान पर चल रही भागवतकथा के दूसरे दिन महाराजश्री ने कही।

उन्होंने कहा कि भारत में विवाह को इसीलिए संस्कार कहा गया है। और जगह यह एक सेलीबेशिन या आयोजन होता होगा। शिव पार्वती का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि शिव पार्वती दोनों योगी थे। अकेले में जब शिव और पार्वती आपस में वार्तालाप करते थे तो वह समय दिव्य होता था। यही कारण था कि उनकी संताने भी वैसी भी हुए। पहले हुए कार्तिकेय जिन्होंने देवताओं का नेतृत्व किया। दूसरे भगवान श्रीगणेश जो प्रथम पूज्य कहलाए और तीसरे हुए हनुमान।

महाराजजी ने कहा कि सुनीति ने अपने बेटे ध्रुव केा पांच वर्ष की उम्र में घोर तपस्या के लिए भेज दिया। जब वे चले तो बीच में नारद मिले। उन्होंने धु्रव से कहा कि भगवान को पाना इतना आसान नहीं है। ध्रुव ने कहा कि आप मुझे भटकाइए मत ये बताइए मुझे जतन क्या करना होगा। नारद ने उन्हें मंत्र दिया जपो ओम नमो भगवते वासुदेवाय और इसी मंत्र जाप से ध्रुव ने भगवान को पा लिया।

जीवन में गुरु का महत्व बताते हुए उन्होंने कहा कि शिष्य और गुरु के बीच में मंत्र का रिश्ता होता है। गुरु से दीक्षा के समय वह आपको मंत्र ही देता है। भरत के चरित्र का भी उन्होनंे बड़ा सुंदर वर्णन किया। कथा रोजाना दोपहर 2 बजे से शाम 5 बजे तक हो रही है।

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