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Photo Icon माननीय हो गए मालामाल, इनकी जिंदगी है बेहाल

Updated: IST chitrakkoot
जिस गरीबी के मुद्दे को ढाल बनाकर नेता चुनाव जीतने का प्रयास करते हैं उसी गरीब को भूल जाते हैं।

चित्रकूट।"गरीब की थाली में पुलाव आ गया लगता है चुनाव आ गया" किसी कवि की कही हुई ये बात हमारे लोकतांत्रिक व्यवस्था में साफ़ कटाक्ष करती है कि सिर्फ लोकतंत्र के मन्दिर (विधानसभा, लोकसभा) में पहुंचने के लिए किस तरह नेता चुनाव के वक्त जनता के सामने हाथ जोड़ते हैं और विजय का सेहरा पहनने के बाद उसी जनता को भूल जाते हैं। फिर पांच साल बाद जनता की चौखट पर वोट के लिए दस्तक देने आते हैं। जिस गरीबी के मुद्दे को ढाल बनाकर नेता चुनाव जीतने का प्रयास करते हैं उसी गरीब को भूल जाते हैं। जब ये नेता माननीय बन जाते हैं।

गरीबी और माननीयों की उदासीनता की कुछ ऐसी ही तस्वीर नजर आती है बुंदेलखंड में, जहां कोल आदिवासी नेता जी को जिताने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं लेकिन सरकारें और नेता इन आदिवासियों की जिंदगी बदलने में आज तक महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभा पाए। एक बार फिर चुनावी मैदान के लम्बरदार (प्रत्याशी) आ धमके हैं। इन आदिवासियों की चौखट पर वादों का पिटारा लेकर। कुछ ऐसी ही स्थिति है भगवान राम की तपोभूमि चित्रकूट के कोल आदिवासियों की, जो किसी भी सफेदपोश को चुनाव में जिताने का माद्दा तो रखते हैं। लेकिन जीत का स्वाद चखने के बाद ये नेता पाठा क्षेत्र की शान और जान इन कोल आदिवासियों की खैरियत तक नहीं पूछते। शायद यही कारण है की व्यवस्थाओं से बगावत कर अधिकांश कोल युवा खूंखार डकैतों (ददुआ ठोकिया बलखड़िया) की गैंग में शामिल हो गए और खुद बड़े डकैत बन गए। ददुआ गैंग का खूंखार डकैत राजू कोल व वर्तमान में पांच लाख का इनामी डकैत बबुली कोल इस बात का उदाहरण हैं।

बुंदेलखंड का चित्रकूट जनपद जिसे भगवान राम की तपोभूमि माना जाता है। यहां के पाठा क्षेत्र (मानिकपुर) में कोल आदिवासी आपको जंगल से लकड़ियां लाते व पत्तों को तोड़ते हुए मिल जाएंगे। पहाड़ों पर पत्थर तोड़ते हुए ये आदिवासी दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करते हैं । हर पांच साल बाद चुनाव के दौरान इन 40 हजार कोल आदिवासियों को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए नेता इनके सामने लोकलुभावन वादों का पिटारा तो खोलते हैं लेकिन जीतने के बाद इनके गांवों का रास्ता भूल जाते हैं। पूरे मऊ मानिकपुर विधानसभा क्षेत्र में लगभग 40 हजार कोल आदिवासी हैं जो किसी भी प्रत्याशी का भाग्य बदलने के लिए काफी हैं। चाहे रोजगार हो या साक्षरता सभी क्षेत्रों में कोल आदिवासियों की हालत बद से बदतर है।

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बीहड़ इलाकों में बसे कोल आदिवासी आधुनिकता व विकास की दौड़ से एकदम बाहर हैं। हां यह अलग बात है की चुनाव के दौरान नेताओं की लग्जरी गांडियां इनके गांव की शोभा बढाने पहुंच जाती हैं और फिर पांच साल होता है नेता जी का इन्तजार। मऊ मानिकपुर से जीतने वाले माननीय तो मालामाल हो गए लेकिन इन आदिवासियों की जिंदगी अभी भी संघर्ष के चौराहे पर खड़ी है। अधिकांश कोल आदिवासी परिवार झोपड़ियों व पत्तों से बनी कुटिया में रहते हैं। विकासपरक योजनाएं इन तक नहीं पहुंच पाती। कुछ एक जागरूक कोल समाजसेवी हैं जो इन तक सरकारी मदद पहुंचाने का कार्य करते हैं। ऐसे ही एक समाजसेवी राजन कोल व नत्थू कोल (थोड़ा क्रोधित होकर) कहते हैं की चाहे जो सरकार हो हमारी सुध लेने वाला कोई नहीं। हर बार हम चुनाव में बढ़चढ़कर हिस्सा लेते हैं लेकिन जीतने के बाद यही नेता कोल आदिवासियों को पहचानते तक नहीं। कोई नहीं बदल पाया जंगल के इन बाशिंदों की जिंदगी।

अलबत्ता दस्यु गैंगों ने जरूर फायदा उठाया इन आदिवासियों की बेबसी का। रोजगार की तलाश में भटकते न जाने कितने कोल आदिवासी युवा इन दस्यु गैंगों द्वारा भटकाव के रास्ते पर चलते हुए बन्दूक उठाने को मजबूर हुए और फिर बन गए खौफ का दूसरा नाम। डकैत ददुआ रहा हो या बलखड़िया या रागिया (सभी पांच से दस लाख के इनामी) इन सभी दस्यु सरगनाओं के खासमखास सिपहसलारों में इन्हीं कोल युवाओं की गिनती होती थी। क्योंकि जंगल के चप्पे चप्पे से वाकिफ मजबूत कद काठी व फुर्तीले कोल नौजवान दस्यु गैंगों की मदद के लिए मुफीद साबित होते हैं। राजू कोल चेलवा कोल (पुलिस इनकाउंटर में मारे गए) ये ददुआ गैंग के ऐसे खौफनाक डकैत थे जिनसे पुलिस भी खौफ खाती थी। अब वर्तमान में पांच लाख का इनामी डकैत बबुली कोल दहशत का पर्याय बन गया है। इन सबके के बीच यह सोचने की जरूर आवश्यकता है की अगर माननीयों व राजनीति की यही बेरुखी रही तो वह दिन दूर नहीं जब चित्रकूट भी छत्तीसगढ़ के किसी नक्सल प्रभावित इलाके की तरह जाना जाएगा।

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