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 इस गाँव में कभी नहीं चला डकैतों का फरमान, क्योंकि यहां रहती है पाठा की शेरनी 

Updated: IST Ramlali
एक बार ददुआ ग्रामीण का अपहरण करने पहुंचा, उसी दौरान राम लली ने गैंग को ललकारा और राम लली की हिम्मत देख गाँव की अन्य महिलाएं व पुरुष भी गैंग से मोर्चा लेने को आ डटे, जिस पर ददुआ को कदम पीछे खींचने पड़े।

चित्रकूट. बुंदेलखंड की सियासत का इतिहास गवाह है कि यहाँ तीन दशकों तक लोकतंत्र के मन्दिर(विधानसभा व लोकसभा) में पहुंचने के लिए सफेदपोश खूंखार डकैतों का सहारा लेते रहे। जो हलचल आज बुंदेलखंड में चुनाव के दौरान दिखती है वो दस वर्ष पहले नहीं दिखती थी। चाहे वह ग्राम पंचायत के चुनाव हों या विधानसभा या लोकसभा के। क्योंकि लोकतंत्र के इस महापर्व पर सीधा दखल होता था उन खूंखार डकैतों का जिनका नाम ही खौफ का दूसरा नाम कहा जाता था। लेकिन वहीं पाठा क्षेत्र में एक ऐसा गाँव भी है जिसके ऊपर कभी डकैत ददुआ, ठोकिया, बलखडिय़ा जैसे खूंखार दहशतगर्दों का असर नहीं हुआ क्योंकि यहाँ रहती हैं "राम लली" जिन्हें चित्रकूट सहित पूरे बुंदेलखंड में "पाठा की शेरनी" के नाम से जाना जाता है। एक ग्रामीण का अपहरण करने आए ददुआ को भी राम लली की हिम्मत के आगे भागना पड़ा और फिर कभी डकैतों ने इस गाँव का रुख नहीं किया।

चुनाव की रणभेरी बजते ही पाठा(मानिकपुर) के जंगलों से डकैतों द्वारा अपने चहेते उम्मीदवार को जिताने का फरमान चित्रकूट सहित पूरे बुंदेलखंड में पहुंच जाता था और खौफ के साए में मतदान करते हुई जनता चुपचाप लौट आती थी। यहाँ तक की जिन इलाकों में किसी जाति के कारण राजनैतिक समीकरण बिगड़ रहा होता था, उस इलाके में उन डकैतों का खौफ ऐसा की कोई मतदान करने की हिमाकत तक नहीं करता था।

ददुआ का नाम सबसे पहले आता है

डकैतों की सियासत के रास्ते में दखल की बात की जाए तो खूंखार डकैत ददुआ का नाम सबसे पहले आता है और यह जगजाहिर है कि ददुआ ने अपने फरमानों से न जाने कितने नेताओं को विधानसभा, लोकसभा व ग्राम पंचायत के चुनाव जितवाए। ददुआ की राह पर खूंखार डकैत ठोकिया भी राजनीति के पायदान पर कदम रखते हुए अपनी चाची को कर्वी(चित्रकूट) का निर्विरोध ब्लाक प्रमुख बनवाया था, लेकिन इससे पहले की ठोकिया और ज्यादा दखल देता सियासत की बिसात पर एसटीएफ के द्वारा 2008 में उसका एनकाउंटर कर दिया गया।

क्योंकि यहाँ राम लली रहती हैं
Ramlali
जनपद का पाठा (मानिकपुर) क्षेत्र। चुनाव चाहे विधानसभा का हो लोकसभा का या ग्राम पंचायत का। लोकतंत्र के हर उत्सव पर खूंखार डकैतों का साया साफ़ नजर आता था। पिछले तीन दशकों से चुनाव की तारीख घोषित होते ही प्रत्याशियों की चहलकदमी नहीं बल्कि पूरे पाठा क्षेत्र में सन्नाटा पसर जाता था क्योंकि जंगल से डकैत ददुआ, ठोकिया, बलखडिय़ा का फरमान जारी होता था किस पर ठप्पा लगाना है। यहाँ तक की दस्यु गैंग द्वारा नारा दिया जाता था (जिसको वो चाहते थे) की "ठप्पा लगाओ::::::::पर वर्ना गोली खाओ छाती पर " मगर इन सबके बीच पाठा के बीहड़ में बसा एक गाँव ऐसा भी है जो हमेशा बेख़ौफ़ होकर हर चुनाव में अपने मताधिकार का बखूबी उपयोग करता था और वह भी भयमुक्त होकर।

बेखौफ होकर जीना सिखाया

पाठा के इस गाँव का नाम है हरजनपुर और अपने गाँव को अलग पहचान दिलाई इस गाँव की एक आम दलित महिला राम लली ने, जिनकी हिम्मत ने गाँव को बेख़ौफ़ होकर जीना सिखाया और डकैतों से टक्कर लेना भी। चित्रकूट सहित पूरे बुंदेलखंड में राम लली की बहादुरी के किस्से आम हैं और इसीलिए उन्हें पाठा की शेरनी कहा जाता है। गाँव के बड़े बुजुर्ग से लेकर खुद राम लली बताती हैं कि 2007(ददुआ के एनकाउंटर) से पहले जब तक ददुआ जि़ंदा था पूरे पाठा क्षेत्र में किसी की मजाल जो उसके फरमान पर न चले, लेकिन उन्होंने(राम लली) ददुआ के खौफ के आगे घुटने नहीं टेके और मन में सोचा की मरना तो एक बार ही है तो क्यों न बहादुरी से जिया जाए।

जब पीछे खींचने पड़े ददुआ को अपने कदम

राम लली बताती हैं कि एक बार ददुआ उनके गाँव के एक ग्रामीण का अपहरण करने पहुंचा, उसी दौरान उन्होंने गैंग को ललकारा और सामने आ गईं राम लली की हिम्मत देख गाँव की अन्य महिलाएं व पुरुष भी गैंग से मोर्चा लेने को आ डटे, जिस पर डकैत ददुआ को कदम पीछे खींचने पड़े। राम लली की इस बहादुरी का किस्सा जब शासन व प्रशासन तक पहुंचा तो 2004 में तत्कालीन राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री ने उन्हें सम्मानित किया और पाठा की शेरनी कहा। राम लली की हिम्मत को देखते हुए तत्कालीन डीएम चित्रकूट(2004) जगन्नाथ सिंह ने उन्हें डकैतों से मुकाबला करने के लिए बन्दूक का लाइसेंस दिया। उत्साह से लबरेज इस बहादुर महिला ने अपने गाँव सहित अन्य आस पास के गाँव की महिलाओं व लड़कियों को बन्दूक चलाने का प्रशिक्षण दिया, जिसकी वजह से इन गाँवों में लोग डकैतों से बेख़ौफ़ हुए और चुनाव में निडर होकर मतदान करने लगे।

कभी फरमान भेजने की हिम्मद नहीं की

राम लली कहती हैं की ददुआ से मुकाबला होने के बाद गैंग ने कभी उनके गाँव में चुनाव के दौरान फरमान भेजने की हिम्मत नहीं की। हरजनपुर सहित आस पास के लगभग आधा दर्जन दलित बाहुल्य गाँव राम लली को अपना आदर्श मानते हैं और आज भी प्रशासन चुनाव के वक्त रामलली के गाँव को लेकर बेफिक्र रहता है। राम लली कहती हैं कि ददुआ, ठोकिया, बलखडिय़ा व रागिया को राजनीतिक समझ थी, जिसकी वजह से ये खूंखार डकैत चुनाव में खुलकर दखल देते थे, लेकिन इनके सफाए के बाद स्थिति काफी बदल गई है। प्रशासन भी दूर दराज के इलाकों तक पहुंचने लगा है, हालाँकि अभी भी पाठा के बीहड़ में पांच लाख के इनामी डकैत बबुली कोल का खौफ कायम है, लेकिन ददुआ, ठोकिया, बलखडिय़ा की तरह उसे सियासत की समझ नहीं है, इसलिए अब पाठा में फरमान का कोई असर नहीं होता।

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