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राज्यों की जिम्मेदारी है ठगी को रोकना, रेरा को सख्ती से लागू करना होगा

Updated: IST real estate city infrastructure
बहुत से लोगों ने रीयल एस्टेट को अपना कालाधन खपाने का साधन बना लिया था

रीयल एस्टेट रेगुलेशन एक्ट (रेरा) के लागू होने से अब उम्मीद बंधी है कि अपना घर चाहने वाले लोगों की गाढ़े पसीने की कमाई डूबने का खतरा कम होगा। अस्पष्ट जानकारी के कारण पहले ग्राहक ठगी के शिकार हो जाया करते थे। सरकारें शहरों का सुनियोजित विकास चाहती हैं तो इस कानून के प्रावधानों को सख्ती से लागू करना होगा।

बहुत से लोगों ने रीयल एस्टेट को अपना कालाधन खपाने का साधन बना लिया था। पहली बार 'रेरा' के माध्यम से रीयल एस्टेट क्षेत्र को नियंत्रित करने की कोशिश की गई है। यह ऐसा क्षेत्र है जिस पर अर्थव्यवस्था संचालन की बड़ी जिम्मेदारी होती है।

हरी विकास को लेकर देश की सोच में अब बदलाव आ रहा है। यह बहुत ही सुखद है कि अब न केवल सरकारी बल्कि समाजिक व व्यक्तिगत स्तर पर नागरिकों की सोच में भी परिवर्तन देखने को मिल रहा है। नागरिक चाहते हैं कि शहर की बसावट बेतरतीब नहीं, नवीन तकनीक पर आधारित हो। शहर स्वच्छ दिखाई दे। दूसरी ओर, शहरी विकास के लिए सरकार की सोच में नीति और कार्यक्रम के साथ कानून भी जुड़ गया है। सरकार अब सख्ती के साथ शहरों को नियोजित तरीके से बसाना चाहती है। पहली मई को देश भर में लागू हुआ रीयल एस्टेट रेगुलेशन एक्ट (रेरा) इसी का प्रतीक है। आजादी के बाद से नीतिगत तौर पर देश का ध्यान ग्रामीण विकास की ओर अधिक रहा।

शुरुआत में ऐसा मानकर चला जाता था कि आवास की समस्या का हल भी सरकार को ही खोजना है। सरकार या तो मकान बनाकर बेचेगी या फिर भूखंडों का बेचान कर दिया जाएगा और लोग उस पर मकान बना लेंगे यानी लोगों के व्यवस्थित आवास की जिम्मेदारी सरकार ही रही। जब सरकार सभी को आवासीय सुविधा देने में नाकाम रही तो इसका लाभ उठाकर निजी स्तर पर ठेकेदारों, बिल्डरों ने आवासीय मकानों का निर्माण शुरू कर दिया। आवासीय कॉलोनियों के भूखंड काटे जाने लगे। शहर बसे लेकिन बेतरतीब तरीके से।

लोगों की आवश्यकता की तीव्रता को देखते हुए बहुत से ऐसे लोग भी इस कारोबार में शामिल हो गए, जिनकी वजह से जरूरतमंद लोगों के साथ धोखाधड़ी होने लगी। बहुत से लोगों ने रीयल एस्टेट को अपना कालाधन खपाने का साधन बना लिया। लेकिन, पहली बार रेरा के माध्यम से रीयल एस्टेट क्षेत्र को नियंत्रित करने की कोशिश की गई है। हकीकत यह है कि रीयल एस्टेट ऐसा क्षेत्र है जिस पर अर्थव्यवस्था संचालन की बड़ी जिम्मेदारी होती है। इस क्षेत्र के सुचारू तौर पर चलने से न केवल स्टील व सीमेंट की खपत होती है बल्कि श्रमिकों को भी बड़ी संख्या में रोजगार मिलता है। अमरीका जैसे देश में तो रीयल एस्टेट को विकास के पैमाने की तरह इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन, रीयल एस्टेट क्षेत्र का बहुत बड़ा हिस्सा अनियंत्रित होने से, शहर को इसका पर्याप्त लाभ नहीं मिल पा रहा था।

आमतौर पर किसी आदर्श शहर में 40 फीसदी क्षेत्र खुला रहता है और 60 फीसदी को आबादी के लिए छोड़ दिया जाता है। लेकिन भारत में इस 40 फीसदी खुले क्षेत्र का भी इस्तेमाल होने लगा था। यदि भारत के विकास की तुलना हम चीन से करते हैं तो हमने पाया कि चीन में एक बार बीजिंग से नियम बनने के बाद वे पूरे देश में उसी रूप में लागू हो जाते हैं। भारत लोकतांत्रिक देश है। यहां की व्यवस्थाएं अमरीका की तरह हैं। नागरिकों के लिए आवास की जिम्मेदारी राज्यों के कार्यक्षेत्र का विषय है इसीलिए केंद्र सरकार की ओर से आधारभूत कानून मॉडल दे दिया गया जिसे राज्य सरकारों को अपने स्तर पर कानून बनाकर पालन करवाना है। यही एक बड़ी वजह है कि हर राज्य में रेरा से संबंधित कानून में समरूपता नहीं है। बहुत से राज्य जैसे महाराष्ट्र में यह कानून बेहतर तरीके से काम करता है लेकिन कई राज्यों में शासन-प्रशासन पर बिल्डर लॉबी हावी होती दिखती है। वह कानूनों को अपने अनुसार बनवाने की कोशिश में रहती है।

इसके बावजूद मेरा मानना है कि शुरुआत के लिहाज से काफी अच्छा है। बहुत से मामलों में अस्पष्ट जानकारी के कारण ग्राहक ठगी के शिकार हो जाया करते थे। लोगों के गाढ़े पसीने की कमाई डूब जाया करती थी। लेकिन, अब इस अधिनियम के होने से इसमें कमी आएगी। इस अधिनियम के मुताबिक पंजीकृत कंपनी को पारदर्शिता रखनी होगी। उसे इमारत के बारे में पूरी जानकारी उपलब्ध करानी होगी। कौन सी परियोजना का कौन बिल्डर है? डेवलेपर कौन और रिटेलर कौन है? नक्शे कहां से पास कराए गए? परियोजना खर्च का 70 फीसदी पैसा परियोजना पर ही खर्च करवाने की कोशिश है। इंजीनियर और आर्किटेक्ट के साथ चार्टर्ड अकाउंटेंट को भी इस नियम के तहत पाबंद करने की कोशिश की गई है। इस अधियिम के लागू होने पर बिल्डर ग्राहकों से गलत वायदे नहीं कर सकते। पूर्व में यह सारी जानकारी मिलती नहीं थी। लेकिन, अब अधिनियम के मुताबित हर राज्य को इसकी अनुपालना के लिए प्राधिकरण बनाना होगा।

इस अधिनियम की एक बड़ी परेशानी यह है कि इसमें 500 वर्गमीटर के भूखंड और आठ फ्लैटों से कम की इमारत को दायरे में नहीं लिया है। किसी भी शहर की बहुत बड़ी आबादी इस क्षेत्र में आती है। जयपुर की ही बात करें तो कम से कम 25 फीसदी आबादी इसी तरह के भूखंडों और फ्लैटों में रहती है। महानगरों की बात करें तो यह 50 फीसदी तक है यानी, उनकी समस्याओं पर कानून लागू नहीं हो सकेगा। जिस वर्ग पर यह कानून लागू नहीं होगा वह है निम्न और निम्न मध्यम आय वर्ग है और ज्यादातर समस्या इसी वर्ग ने झेली है। इसके बावजूद मेरा मानना है, शुरुआत एक बार हो चुकी है और विभिन्न राज्य जैसे-जैसे समस्याओं को झेलेंगे, कानून में सुधार करते जाएंगे। शहरी विकास के लिहाज से यह कानून अच्छा कदम साबित होगा।

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