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इंटरव्यूः ...ऐसे हुई थी देश के सफलतम स्टार्टअप्स में शुमार Paytm की शुरुआत

Updated: IST Paytm story
2011 में बोर्डरूम में सिरे से खारिज कर दिया गया था पेटीएम का प्रस्ताव। खुद पेटीएम फाउंडर से जानिए किस तरह हुई थी भारत के सबसे सफल में स्टार्टअप्स में शुमार पेटीएम की शुरुआत...

देश के सबसे सफलतम स्टार्टअप्स में से एक पेटीएम के फाउंडर और सीईओ ‘विजय शेखर शर्मा’ ने ‘पत्रिका’ के प्रीतेश गुप्ता के साथ अपनी बिजनेस जर्नी के कई रोचक पहलू साझा किए। इस दौरान उन्होंने डिजिटल वॉलेट से जुड़े कई अहम मुद्दों पर अपने विचार रखे।

कैसे सूझा था पेटीएम का कंसेप्ट? कैसी रही अब तक की बिजनेस जर्नी?

‘इस आइडिया की शुरुआत स्मार्टफोन और 3जी इंटरनेट में अचानक आए बूम के साथ हुई थी। 2-3 साल इंटरनेशनल ट्रैवलिंग से पता चल गया था कि स्मार्टफोन की भूमिका कितनी अहम होने वाली है। हमने सोचा था कि लोग ऐप स्टोर से गेम्स या दूसरे एप्स डाउनलोड करेंगे तो पेमेंट के लिए ऑप्शन चाहिए होगा। तब तक लोग नेट बैंकिंग या डेबिट-क्रेडिट कार्ड से पेमेंट करते थे। तभी हमने मोबाइल ऐप से ही पेमेंट का विकल्प तैयार करने का सोचा। 2011 में जब हमने शुरुआत की तो नाम भी पेटीएम रखा यानी 'पे थ्रू मोबाइल'। तब सोचा था कि सबसे ज्यादा यूज एप स्टोर में होगा, लेकिन धीरे-धीरे इसका इस्तेमाल रिक्शा-सब्जी से लेकर बड़े-बड़े पेमेंट में भी होने लगा है, नोटबंदी के बाद तो जबर्दस्त बूस्ट देखने को मिला है।‘

बोर्डरूम में सिरे से खारिज हो गया था पेटीएम का आइडिया, फिर ऐसे बनी बात...

मुश्किलों के सवाल पर शर्मा ने कहा, ‘चुनौतियों की शुरुआत बोर्डरूम से ही हो गई थी। 2011 में जब हमने पेटीएम की शुरुआत की तो कंपनी के बोर्ड ने वीटो लगाकर योजना को सिरे से खारिज कर दिया। हमें हिदायत मिली कि भारत में लोग नकद पेमेंट करते हैं, ऐसे में आप इस कंपनी को चालू नहीं करेंगे। यह भी कहा कि देश में 10-15 साल से इंटरनेट है, इसके बावजूद अब तक कोई इंटरनेट पेमेंट कंपनी नहीं आई तो आप ऐसा बिल्कुल ना सोचें की लोगों के व्यवहार में कोई बड़ा बदलाव आएगा। तब मैंने बोर्ड मीटिंग में यह सुझाव मानने से इनकार कर दिया और अपना पक्ष रखने का एक मौका और मांगा। उसके बाद कई तरह की मशक्कत के बाद शुरुआत हो पाई।’

डिजिटल वॉलेट बिजनेस को लेकर अभी भारत में क्या-क्या बड़ी चुनौतियां हैं?

सबसे बड़ी चुनौती तो कंज्यूमर्स को डिजिटल पेमेंट के लिए आकर्षित करना था, नोटबंदी से आई डिजिटल आंधी ने समस्या काफी हद तक हल कर दी है। फिलहाल दूर-दूर तक के गांवों में स्मार्टफोन और इंटरनेट का पहुंचना सबसे ज्यादा जरूरी है। स्मार्टफोन और इंटरनेट जितनी तेजी से सस्ते हो रहे हैं उसको देखते हुए इसके भी जल्द समाधान की उम्मीद है।

बड़ी संख्या में लोग स्मार्टफोन इस्तेमाल नहीं करते हैं, ऐसे में फीचर फोन को लेकर क्या योजना है?

फिलहाल आपके पास पेटीएम अकाउंट है तो आप फीचर फोन पर भी ट्रांजेक्शन कर सकते हैं। पेटीएम अकाउंट बनाने के लिए इंटरनेट की जरूरत है, चलाने के लिए नहीं। हालांकि फीचर फोन के साथ पेटीएम की कई सुविधाएं नहीं मिल पाती है। यह अभी बेसिक ट्रांजैक्शन तक ही सीमित है। वैसे एक समय था जब लोग मोबाइल नहीं खरीद रहे थे, धीरे-धीरे हर हाथ में मोबाइल आ गया। ऐसे ही स्मार्टफोन का भी दौर शुरू हो गया है। टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल में टालमटोल हो सकती है लेकिन उसे नकारा नहीं जा सकता।

95 करोड़ भारतीय इंटरनेट से काफी दूर हैं। कई इलाकों में तो सेल्युलर नेटवर्क भी नहीं है। ऐसे में डिजिटल इंडिया के सपने को आप किस तरह देखते हैं?

देखिए, भारत में 90 के दशक में मोबाइल आए थे, 2010 तक लगभग सभी के पास फोन थे। अब 2020 तक पर्याप्त संख्या में लोगों के पास स्मार्टफोन होंगे? सेल्युलर नेटवर्क जहां नहीं है वहां सैटेलाइट से इंटरनेट पहुंचेगा। रेगिस्तान और समुद्री इलाकों में इसका इस्तेमाल हो रहा है। गूगल-फेसबुक जैसी कंपनियां इस तरह के प्रोजेक्ट पर काम कर रही हैं। इससे वहां तक इंटरनेट की पहुंच धीरे-धीरे आसान बन जाएगी।

पेटीएम का सबसे बड़ा प्रतिस्पर्द्धी कौन है?

अब तो हम पेटीएम पेमेंट बैंक की तरफ बढ़ रहे हैं तो हमारी प्रतिस्पर्द्धा सीधे बैंकों से होगी। सिर्फ वॉलेट की बात करें तो जिस तेजी से हमने प्रचार-प्रसार किया है हमें लगता नहीं है कि कोई बहुत बड़ी चुनौती है। लेकिन हमारा फोकस ग्राहकों और कारोबारियों पर है, प्रतिस्पर्द्धियों पर नहीं। अगर कोई कहता है कि पेटीएम से उनका मुकाबला है तो अच्छी बात है, स्वागत है, हम प्रतिस्पर्द्धा करेंगे।

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