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महत्वपूर्ण मामलों की दिशा तय करने में पत्रकारिता की बड़ी भूमिका : प्रणब दा

Updated: IST KCK Award
'पत्रकारिता का हमारे देश में लंबा इतिहास है। आजादी के आंदोलन से लेकर सामाजिक सुधार और अन्य

नई दिल्ली।'पत्रकारिता का हमारे देश में लंबा इतिहास है। आजादी के आंदोलन से लेकर सामाजिक सुधार और अन्य महत्वपूर्ण मामलों की दिशा तय करने में पत्रकारिता की बड़ी भूमिका रही है। खास तौर पर प्रिंट पत्रकारिता का अपना प्रभाव रहा है। क्योंकि एक अच्छा संपादकीय, एक अच्छी खोजपरक खबर या किसी सामाजिक मुद्दे पर एक लेख पाठकों के मस्तिष्क पर सीधा असर करता है।Ó

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी सोमवार को कांस्टीट्यूशन क्लब स्थित मावलंकर सभागार में पत्रिका समूह के संस्थापक कर्पूर चन्द्र कुलिश की स्मृति में दिए जाने वाले 'केसी कुलिश इंटरनेशनल अवार्ड फॉर एक्सीलेंस इन जर्नलिज्मÓ पुरस्कार कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। राष्ट्रपति ने अपनी युवावस्था का जिक्र करते हुए बताया कि किस तरह बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) से प्रकाशित 'इत्तेफाकÓ के एक आलेख ने उन्हें शिक्षक की नौकरी छोड़कर सार्वजनिक जीवन में उतरने के लिए प्रेरित किया।

राष्ट्रपति ने कहा कि आप लोगों को यह जानकर शायद आश्चर्य होगा कि कई महत्वपूर्ण समाज सुधारकों ने अपना संदेश आमजन तक पहुंचाने के लिए समाचार पत्रों का सहारा लिया है। राजा राममोहन राय ने 1819 में समाचार चंद्रिका और मिरातुल उल अखबार निकाला था। महात्मा गांधी ने यंग इंडिया व हरिजन समाचार पत्रों का संपादन किया था।

आज भी कई प्रमुख राजनेता खुद लेख लिखते हैं। खासकर कम्यूनिस्ट मूवमेंट से निकलकर आए नेता अपने विचार पार्टी के मुखपत्र एवं अन्य मु?य धारा के समाचार पत्रों में लेखों के जरिए व्यक्त करते हैं। इनमें से कई बेहतरीन लेखक हैं। राष्ट्रपति ने कहा कि तकनीकी से मीडिया का बेहद गहरा नाता है, चाहे वह प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया। तकनीक की वजह से मीडिया की पहुंच बढ़ी है। राष्ट्रपति ने कहा कि हमारे समय में टीवी डिबेट के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता था कि कौन बेहतर वक्ता है? लेकिन अब टीवी पर होने वाले कार्यक्रमों से आप अच्छे वक्ता, अच्छा वाद-विवाद करने वाले लोगों को पहचान सकते हैं। राष्ट्रपति ने कहा कि मुझे खुशी है कि मुझे यह पुरस्कार प्रदान करने का अवसर मिला। उन्होंने उम्मीद जताई कि केसीके पुरस्कार अन्य पत्रकारों को भी अच्छी पत्रकारिता के लिए प्रेरित करेगा।

9 स्टोरीज को मेरिट पुरस्कार

देश और दुनिया भर से आई प्रविष्टियों में से 9 स्टोरीज को मेरिट पुरस्कार प्रदान किया गया। इनमें 2014 के लिए द वीक की मिनी पी. थॉमस, बर्तमान के रांतीदेव सेनगुप्ता, देशाभिमानी डेली के आर.सम्बन और दैनिक जागरण दिल्ली के हरीकिशन शर्मा को पुरस्कार प्रदान किया गया। जबकि, वर्ष 2015 की मेरिट स्टोरी के लिए आज समाज के कुनाल वर्मा, सेन्ट्रल क्रॉनिकल के दिनेश कुमार, मलयाला मनोरमा के संतोष जॉन थूवल, हिन्दुस्तान टाइम्स के उमेश रघुवंशी को राष्ट्रपति ने यह पुरस्कार प्रदान किया। पत्रकारों की टीम के बेहतरीन काम को प्रोत्साहित करने के लिए वर्ष 2007 में स्थापित यह अवॉर्ड, पुरस्कार राशि के लिहाज से दुनिया का सबसे बड़ा पत्रकारिता पुरस्कार है।

पाठकों के साथ लोकतंत्र सींचता रहेगा पत्रिका: गुलाब कोठारी

इससे पहले पत्रिका समूह के प्रधान सम्पादक गुलाब कोठारी ने कहा कि पत्रकारिता आज सत्ता और धन बल के आगे घुटने टेकती दिख रही है, पत्रिका समूह भी आसमान से तारे तोड़कर लाने का वादा नहीं करता, लेकिन इतना विश्वास जरूर दिलाना चाहता है कि वह पाठकों के साथ मिलकर लोकतंत्र की जड़ों को सींचता रहेगा। कोठारी ने स्वतंत्र प्रेस की संवैधानिक अवधारणा की चर्चा करते हुए कहा कि आज जब सत्ता के आगे विपक्ष धीरे-धीरे मौन हो रहा है, मीडिया में भी मर्यादा अथवा स्वतंत्रता का स्थान स्वच्छंदता ने ले लिया है।

एक-दूसरे के सम्मान का स्थान अपमान ले रहा है, तब मीडिया ही इसे रोकने में सक्षम है। लेकिन इसके लिए उसे व्यापारिक प्रतिष्ठान बनकर नहीं बल्कि पत्रकारिता करनी होगी। सोशल मीडिया के प्रभाव की वजह से विश्वसनीयता के अंतिम बिंदु पर आ जाने से हो रहे नुकसान को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि राजनेताओं की सोच मात्र पांच साल तक की होती है, लेकिन पत्रकार चार-पांच दशक आगे तक की सोच सकता है और यही बात राजनेताओं को सहन नहीं होती।

सरकारी नीतियों में भारतीय संस्कृति के घटते प्रभाव का उल्लेख करते हुए कहा कि लोकतंत्र के तीनों स्तंभ सरकार, न्यायपालिका और कार्यपालिका स्वयं को अंग्रेजी मीडिया से एकाकार ज्यादा पाते हैं। नीतियों के निर्धारण में अंग्रेजी सोच हावी रहती है, भारतीय भाषाओं की भागदारी कम होने से सरकारी नीतियों में संस्कृति का प्रभाव बहुत कम दिखता है। यही कारण है कि विकास के नाम पर बनाए गए कानून जनता को स्वीकार नहीं होते।

उन्होंने कहा कि विकास की परिभाषा बदल गई है। अब समृद्घि और धन को विकास के रूप में देखा जा रहा है, चाहे इसके लिए कितना भी अपयश सहना पड़े। मीडिया भी इस दौड में शामिल है। सत्य के तालाब पर काई जम गई है। अधिकांश मीडिया संस्थान धीरे-धीरे राजनीतिक दलों से जुडऩे की दौड़ में हैं। जब 1956 में राजस्थान पत्रिका शुरू किया गया तब भी लगभग यही वातावरण था और राजस्थान पत्रिका की शुरुआत इसी निष्पक्षता और सत्य को कायम रखने के उददेश्य से की गई। लेकिन विडंबना है कि किसी भी सरकार को ऐसे संघर्ष रास नहीं आते। वे ऐसे संघर्षों को कुचलने का प्रयास करती हैं।

इसके लिए विज्ञापन बंद करने के सरकारी हथियार का जमकर इस्तेमाल किया जाता है। सरकारों को यह पता नहीं होता कि असल में अखबार की शक्ति उसके पाठकों में निहित होती हैं। पिछले साठ साल में पत्रिका ऐसे प्रत्येक संघर्ष में सफल हुआ है। समय की धारा के साथ मीडिया में आ रहे बदलावों का उल्लेख करते हुए गुलाब कोठारी ने कहा कि बदलते युग के साथ मीडिया प्रिंट से टीवी के रास्ते होते हुए डिजीटल युग में प्रवेश कर चुका है, सोशल मीडिया दोधारी तलवार बन गया है, इसकी कोई मर्यादा नहीं है, सत्यता की गारंटी भी नहीं है।

देश में विकास को गति देने के स्थान पर ग्लैमर और संस्कारहीनता हावी होती जा रही है। मीडिया को साख की चिंता नहीं है। शायर बशीर बद्र की इन पंक्तियों 'तुम्हारे शहर के सारे दिए तो सो गए कब के, हवा से पूछना दहलीज पर ये कौन जलता है।Ó को पढ़ते हुए उन्होंने कहा कि दहलीज पर जलता हुआ दिया राजस्थान पत्रिका है। समारोह में केन्द्रीय मंत्रियों समेत अनेक सांसद, अधिकारी व पत्रकार उपस्थित रहे। पत्रिका के निदेशक (वित्त) एच पी तिवाड़ी ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

अपने संबोधन से पहले राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 'केसी कुलिश इंटरनेशनल अवार्ड फॉर एक्सीलेंस इन जर्नलिज्मÓ पुरस्कार के विजेताओं को यह पुरस्कार प्रदान किया। ग्यारह हजार अमरीकी डॉलर का यह पुरस्कार वर्ष 2014 के लिए लंदन से प्रकाशित होने वाली न्यू अफ्रीकन मैगजीन में प्रकाशित स्टोरी "हाउ ईस्ट अफ्रीका लॉस्ट इट्स इनोसेंस" के लिए वनजोही काबूकुरू को दिया गया। जबकि वर्ष 2015 का पुरस्कार अमर उजाला, देहरादून में 'नारी निकेतन में यौन उत्पीडऩÓ पर प्रकाशित खोजपरक समाचार श्रृंखला के लिए राकेश शर्मा एवं उनकी टीम को मिला।

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