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सौहार्द की मिसाल... मुसलमानों ने कराया रामप्रसाद का अंतिम संस्कार

Updated: IST Dewas photo
आखिरी यात्रा में शामिल होने नहीं पहुंचे सगे भाई, सिल्वर कॉलोनी के मुस्लिम परिवार बने सहारा, दिया कंधा

देवास. मुफलिसी और बीमारी से हारकर 42 वर्षीय रामप्रसाद मालवीय ने जब दम तोड़ा, तो उसे सहारा देने वाला अपना कोई मौजूद नहीं था। उसकी पत्नी सुनीता भौंरासा गई हुई थीं, जबकि दोनों किशोर बेटे दैनिक मजदूरी पर चले गए थे। पड़ोसी मुस्लिम परिवार के लोगों ने बेटों व पत्नी को फोन करके रामप्रसाद के गुजर जाने की सूचना दी। सिल्वर कॉलोनी निवासी रामप्रसाद को मुस्लिम भाइयों ने ही आखिरी यात्रा में कंधा दिया। उन्होंने मुक्तिधाम तक अंतिम यात्रा निकाली। इसमें 100 से ज्यादा मुस्लिम भाई-बंधु शामिल हुए। उन्होंने एक हिन्दू का अंतिम संस्कार कराकर सामाजिक सद्भाव की मिसाल कायम की। बड़े बेटे विजय ने पिता को मुखाग्नि दी।

गुरुवार को सिल्वर कॉलोनी की सुबह रोज की तरह ही हुई। करीब आठ बजे रामप्रसाद के पड़ोसी शुभम ने बाहर खेल रही उसकी बेटी रोशनी से पिता के सोकर जगने के बारे में पूछा। शुभम ने बताया कि बेटी ने अंदर जाकर पिता को हिलाया डुलाया, किंतु तब तक रामप्रसाद फानी दुनिया से रूखसत हो चुके थे। मौत के बाद रामप्रसाद के घर के बाहर मुस्लिमों युवा, बुजुर्ग, औरतों की भीड़ जमा हो गई। अब रामप्रसाद के बेटों के सामने समस्या थी कि कैसे पिता का अंतिम संस्कार किया जाएगा। उनके पास इतने भी रुपए नहीं थे कि वह अंतिम संस्कार के लिए लकड़ी खरीद सकते। तब कॉलोनी के मुस्लिम परिवारों ने अंतिम संस्कार कराने का जिम्मा लिया। उन्होंने कफन खरीदा, फूल खरीदे और अंतिम यात्रा में राम नाम सत्य है... कहते हुए मुक्तिधाम तक ले गए। टोपी पहने, मुस्लिम युवाओं व बुजुर्गों को राम नाम सत्य है की धुन के साथ आखिरी यात्रा में जाते देख कई मुस्लिम और शामिल हो लिए। मुक्तिधाम में लकड़ी का प्रबंध भी उन्होंने मिलकर किया। इसके बाद विधि-विधान से अंतिम संस्कार कराया। आखिरी मौके पर रामप्रसाद को पानी पिलाने की रस्म कई मुस्लिम युवाओं ने निभाई। अंतिम संस्कार कराने वालों में सलीम खान, मुबारक पठान, वामिक पटेल, अकरम, वाहिद, जाकिर, रसीद के साथ ही बड़ी संख्या में मुस्लिम मुक्तिधाम पहुंचे।

पूरे दिन इंतजार, फिर भी नहीं आए सगे भाई

कॉलोनी में सबसे किनारे एक कमरे के टूटे-फूटे मकान में अपने तीन बच्चों व पत्नी के साथ बसर करने वाले रामप्रसाद की मौत की सूचना मिलने के बाद भी उससे तीनों छोटे भाई सरदार, प्रकाश और सागर ने आने से मना कर दिया। एक भाई सरदार राजीवनगर में रहता है, जबकि दोनों छोटे भाई भौंरासा में ही गुजर-बसर करते हैं। परिजन का कहना है कि बड़े भाई की मौत की खबर सुनकर छोटे भाइयों को रंचमात्र भी दुख नहीं हुआ। हालांकि, कॉलोनी में रामप्रसाद का अंतिम संस्कार कराने से पहले 2 बजे तक इंतजार किया गया।

सरकारी मदद से महरूम

रामप्रसाद की पत्नी सुनीता ने सिसकते हुए पत्रिका को बताया कि सालभर से वह बीमार थे, उन्हें पैरालिसिस जैसी कोई बीमारी थी, हाथ-पैर लुंज हो गए थे। काम पर जाना छूट गया था। हमारा बीपीएल कार्ड और राशन कार्ड बना हुआ है, इसके बाद भी हमें कभी कोई सरकारी सहायता नहीं मिली। जैसे-तैसे बसर हो रहा था। सालभर हो गए, हमारे घर की बिजली काट दी गई थी, 8 हजार बिल बकाया था। घर में पैसा ही नहीं था, कहां से भरते। इनके इलाज में सब खर्च हो गया।

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