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आदिवासी सागवान के बीज बेचकर कर रहे जीवन-यापन

Updated: IST Dewas
खेती-बाड़ी का काम नहीं चलने पर दिनभर एकत्रित करते हैं बीज

कुसमानिया. क्षेत्र के आदिवासी बाहुल्य ग्रामों में इन दिनों वनोपज सागवान के बीज को संग्रहण करने का कार्य जोरों से चल रहा है। आदिवासी एवं गरीब तबके के लोग जंगलों में जाकर सागवान के पेड़ों से बीजों को तोड़ते हंै और उन्हे सुखाकर छिलके निकालते हंै। बीजों को साफ करके बाजार में व्यापारियों को बेच देते हैं। व्यापारियों से इन्हें 10 से 12 रु. प्रति किलो के भाव से राशि का भुगतान किया जाता है। यह क्षेत्र रोजगार व सिंचाई के साधनों में बहुत पिछड़ा हुआ है। गरीब तबके के लोगों को परिवार का पालन-पोषण करने में क्षेत्र का वन बहुत बड़ा सहारा बना हुआ है।
वनोपज से कई ग्रामों के लोगों की आजीविका चल रही है। मुख्य रुप से आदिवासी परिवार के लोग वनोपज पर निर्भर है। आसपास के वनों से मौसम अनुसार तेंदूपत्ता, महुआ, गोंद, सागवान आदि उत्पाद एकत्रकर बाजारों में विक्रय कर जीवन-यापन करने को मजबूर हंै। इस कार्य में घर के बड़े-बुजुर्ग से लेकर छोटे स्कूली बच्चे भी सहयोग दे रहे हंै। इस प्रकार से इन स्कूली बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है, लेकिन मजबूरी में बच्चे स्कूल की पढ़ाई छोड़कर वनोपज एकत्र करने में लगे हैं। क्षेत्र के ग्राम पूर्ण रुप से कृषि पर निर्भर है और कृषि में सिंचाई के लिए पर्याप्त जल नहीं होने से किसानों के साथ आदिवासी व मजदूर वर्ग भी पिछड़ गया। सिंचाई के उचित स्त्रोत नहीं होने से सैकड़ों एकड़ भूमि सूखी है।
पेड़ पर चढ़कर डंडे से तोड़ते बीज
क्षेत्र के मजदूर शंकरलाल ने बताया कि इन दिनों खेती-बाड़ी में किसी भी प्रकार का कार्य नहीं चल रहा है। जिसके कारण सुबह से भोजन व पानी के साथ जंगल की ओर रुख कर लेते हैं। उनके साथ महिला व बच्चे भी जाते हैं। यह कार्य महिला मजदूरों के द्वारा ज्यादा किया जाता है। चार-पांच महिलाओं के बीच में एक पुरुष जाता है। वह व्यक्ति अपनी जान-जौखिम में डालकर पेड़ पर चढ़कर एक लंबी लकड़ी से पेड़ में लगे बीजों को गिराता है। महिलाएं व बच्चें सागवान पेड़ के नीचे पल्ली बिछाकर एकत्रित करते हैं। इस प्रकार एक व्यक्ति 10 से 15 किलो बीज को एकत्रित कर लेता हैं। बीज को घर ले जाकर सूखाया जाता है, फिर छिलके अलग कर बाजार में बेचा जा रहा है।

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