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सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला", साहित्य जगत का सुनहरा सितारा

Updated: IST
हिंदी साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता में अमिट हस्ताक्षर के समान हैं सूर्यकात त्रिपाठी निराला

सूर्यकात त्रिपाठी निराला हिंदी साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता में अमिट हस्ताक्षर के समान हैं। अपने नाम के अनुरूप वे निराले ही थे। निराला मूलत: छायावादी कवि थे, उनका जीवन भी कविता के समान ही था। सन् 1896 की वसंत पंचमी के दिन जन्मे महाप्राण निराला पर माँ सरस्वती का विशेष आशीर्वाद था। उनके जन्म की तिथि को लेकर अनेक मत प्रचलित हैं। एक बड़ा वर्ग मानता है कि संवत् 1955 में माघ शुक्ल एकादशी यानी 21 फरवरी 1899 को उनका जन्म हुआ। निराला के कहानी संग्रह लिली में उनकी 21 फरवरी 1899 ही अंकित है। वसंत पंचमी पर उनका जन्मदिन मनाने की परंपरा 1930 में प्रारंभ हुई।

महाकवि और महामानव जैसे उपनामों से सम्मानित निराला का जन्म बंगाल के मेदिनीपुर में हुआ था। निराला के पिता पंडित रामसहाय तिवारी उन्नाव के रहने वाले थे और महिषादल में सिपाही की नौकरी करते थे। उनकी की औपचारिक शिक्षा हाईस्कूल तक हुई, लेकिन हिन्दी, संस्कृत तथा बांग्ला का अध्ययन उन्होंने खुद किया। तीन साल की छोटी सी आयु में अपनी माता को खो देने के बाद संघर्षो में उनका बचपन बिताया और जवानी में पिता भी साथ छोड़ संसार से विदा ले ली।

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद जो महामारी फैली उसमें उनकी पत्नी मनोहरा देवी, चाचा, भाई तथा भाभी को गंवा दिया। कठिनतम परिस्थितियों में भी आपने जीवन से समझौता न कर, अपने तरीके से ही जिंदगी जीना बेहतर समझा। निराला का साहित्य ही नहीं साहित्यिक पत्रकारिता में भी महत्वपूर्ण योगदान था। भारतेंदु हरिशचंद्र के माध्यम से शुरू की गई साहित्यिक पत्रकारिता की विरासत महावीर प्रसाद द्विवेदी के बाद निराला जी को ही मिली थी। निराला ने साहित्यिक पत्रकारिता की शुरूआत ऎसे समय में की थी जब राजनीतिक पत्रकारिता के समकक्ष साहित्यिक पत्रकारिता ने भी अपना स्थान बना लिया था।

महामानव निराला का संबंध प्रमुख रूप से प्रभा, सरस्वती, माधुरी, आदर्श, शिक्षा और मतवाला जैसे प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं से रहा। मतवाला से उनका विशेष लगाव रहा था। मतवाला के पहले अंक में ही रक्षाबंधन पर उनकी कविता छपी थी। इसके बाद तो निराला की कविता तो मतवाला की पहचान ही बन गई थी। वे मतवाला में गर्जन सिंह वर्मा, मतवाले, जनाब आलि, शौहर आदि नामों से लिखते थे। निराला भी उनका छk नाम ही था। जो आगे चलकर उनका उपनापम ही बन गया।

निराला गांधीवादी युग के साहित्यिक पत्रकार थे। वे गांधी जी के स्वदेशी आंदोलन और चरखा नीति के समर्थक थे। निराला अपनी बात को निराले ही ढंग से रखते थे। एक बार उन्होंने महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादन में निकलने वाली सरस्वती पत्रिका की आलोचना की, तो द्विवेदी ने मतवाला को पूर्णतया संशोधित करके निराला के पास भेज दिया। निराला ने अपने समय के प्रतिष्ठित पत्र समन्वय में भी अपना योगदान दिया। इलाहाबाद शहर के दारागंज मुहल्ले में रायसाहब के कमरे के पीछे बने कमरे में दिनांक 15 अक्टूबर 1971 को महाप्राण, यानी वे देह त्याग कर चले गए।

काव्यसंग्रह: जूही की कली कविता की रचना 1916 में की गई। अनामिका, परिमल, गीतिका, द्वितीय अनामिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला, नये पत्त, अर्चना, आराधना, गीत कुंज, सांध्यकाकली, अपरा।

उपन्यास: अप्सरा, अलका, प्रभावती, निरूपमा, कुल्ली भाट, बिल्लेसुर बकरिहा।

कहानी संग्रह: लिली, चतुरी चमार, सुकुल की बीवी, सखी देवी।

पुराण कथा: महाभारत

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