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मथुरा के इन दो गांवों की होली देखने टूट पड़ते हैं विदेशी, धधकती आग से निकलता है पुजारी

Updated: IST holi muhurat
छाता तहसील के दो गांवों जटवारी और फालैन गांव में इन गावों का ही पण्डा होलिका की आग से होकर निकलता है

तीन लोक से न्यारी कान्हा की नगरी मथुरा के दो गांवों में खेली जाने वाली होली देशी-विदेशी पर्यटकों के साथ ही स्थानीय लोगों के आकर्षण का केन्द्र भी होती है। ब्रज की होलियों में बरसाना, नन्दगांव की लठामार होलियां, मुखराई के चरकुला, बल्देव के हुरंगा एवं मोरकुटी के मयूर नृत्य ने यदि अपनी पहचान विश्व के कोने-कोने में पहुंचाने में सफलता पाई हैं तो छाता तहसील के दो गांवों जटवारी और फालैन गांव में इन गावों का ही पण्डा होलिका की आग से होकर निकलता है।

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इस बार 12 मार्च की रात दोनों गांवों में पण्डे होलिका की लपटों से होकर निकलेंगे। इन दोनों ही गावों के बीच की दूरी यद्यपि दस किलोमीटर है मगर एक गांव में होलिका शाम को और दूसरे गांव में तड़के तब जलाई जाती है जब कि इन गावों के पण्डे दीपक की लौ से आग जलाने का निर्धारण करते हैं। गांव के पूर्व प्रधान एवं मशहूर चिकित्सक डॉ. रामहेत ने बताया कि गांव का पण्डा होलिका की लपटों के बीच में से होकर निकलता है।

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पण्डा वसंत पंचमी से गांव के प्रहलाद मंदिर में भजन पूजन करता रहता है तथा मंदिर में ही धरती पर सोता है। वह फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से अन्न का परित्याग कर केवल फल और दूध ही ग्रहण करता है तथा दोनो वक्त हवन करता है। उन्होंने बताया कि माघ मास की पूर्णिमा को गांव की पंचायत में पिछले वर्ष के पण्डे से विचार विमर्ष करने के बाद होलिका की आग के बीच से निकलने वाले पण्डे का निर्णय किया जाता है। यदि वह मना कर देता है तो वहां उपस्थित अन्य लोगों से इसके लिए पूछा जाता है।

दीपक की लौ से पता लगता है होलिका दहन का मूहूर्त

जटवारी गांव की होलिका की ऊंचाई 20 फीट से अधिक तथा व्यास लगभग 20 फीट होता है। यह होलिका गांव के प्रहलाद मंदिर के निकट ही जलाई जाती है। होलिका में आग लगाने के समय का निर्धारण पण्डा स्वंय करता है। होली के दिन पण्डा सुबह के बाद जब शाम को हवन करता है तो पास में एक मोटी लौ का दीपक रखा जाता है। पण्डा कुछ समय के अंतराल पर दीपक की लौ पर अपने हाथ की हथेली रखता है। दीपक की लौ उसे गर्म महसूस होती है तो उसे वह हटा लेता है और दीपक की लौ उसकी हथेली को गर्म नहीं लगती और लौ उसके उंगलियों के बीच से निकल जाती है। इस समय, पण्डा बहुत जोर से कांपने लगता है तथा ठंढ महसूस करने के कारण उसे बार बार जमुहाई आती है।

27 साल तक होली से निकलने का बनाया है रिकॉर्ड

इसी समय पण्डा होलिका में आग लगाने को कहता है तथा स्वयं भागकर निकट के प्रहलाद कुण्ड में स्नान करने चला जाता है। इसी बीच उसकी बहन करूए से प्रहलाद कुण्ड से होली तक के मार्ग में करूए से पानी डालती है। पण्डा इसी मार्ग से होकर होलिका की लपटों से होकर निकल जाता है। बाद में उसे सात आठ रजाइयों से ढक दिया जाता है तथा गर्म दूध पीने को दिया जाता है। गांव के मुखिया के अनुसार गांव का सुक्खी पण्डा होलिका की लपटों के बीच से 27 साल तक लगातार निकलता रहा था तथा अभी तक उसका रेकार्ड कोई नही तोड सका है। वर्तमान पण्डा सुनील होलिका की लपटों के बीच से पिछले तीन साल से लगातार निकल रहा है।

होली पर गांव में लगता है मेला

होली के दिन गांव में मेला सा लग जाता है। विभिन्न गावों की टोलियां आकर रसिया गायन एवं मनोहारी नृत्य करती हैं। छाता तहसील के फालेन गांव में भी पण्डा होलिका के बीच से निकलता है। मथुरा महंत बालकदास के अनुसार होली के दिन शाम को पण्डा प्रहलाद कुण्ड से स्नान के बाद आता है और पलक झपकते ही 30 फीट व्यास की लगभग 16 फीट ऊंची धधकती होली से निकल जाता है।

महंत के अनुसार दोनों ही गांव की होलिका इतनी बड़ी होती हैं कि जो लोग पण्डे को देखने के लिए होलिका के नजदीक खड़े होते हैं। होलिका में आग लगने के बाद वे दूर भागने लगते है किंतु प्रहलाद जी की कृपा के कारण ही पण्डे होलिका की धधकती आग से निकल पाते हैं।

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