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सावधानः 45 फीसदी खाने की चीजों में है ​मिलावट

Updated: IST food
तीन महीनों में 87 से ज्यादा नमूने आ चुके हैं फेल

गाजियाबाद। महानगर में खाद्य सामग्रियों में जमकर मिलावट की जा रही है। मुनाफाखोरी के चक्कर में मिलावट का स्तर इतना बढ़ गया है कि ये आपको अस्पताल पहुंचाने के लिए काफी है। खाद्य औषधि सुरक्षा विभाग के सरकारी आंकड़ों की माने तो करीब 45 फीसदी खाद्य सामान में रसायन और ऐसी चीजे मिलाई जा रही है जो कि कैंसर जैसी घातक बिमारी को भी जन्म देते हैं। तीन महीनों में 80 से ज्यादा फेल आए नमूने इसकी सारी कहानी बयां करते है।

खाद्य एवं औषधि सुरक्षा विभाग (एफडीए) ने चालू वित्त वर्ष में आईं सैंपल रिपोर्ट के हवाले से साफ कर दिया है कि हर दूसरे खाद्य पदार्थ में मिलावट का खेल चल रहा है। एफडीए अफसरों ने अंदेशा जताया है कि त्योहारी सीजन में मिलावट का स्तर डिमांड बढ़ने के साथ ही दो से चार गुना तक बढ़ जाता है। ऐसे में व्यापारी सैंपलिंग का विरोध कर रहे हैं जबकि शासन और जिला प्रशासन ने सैंपलिंग अभियान से किसी तरह का समझौता न करने के निर्देश दिए हैं। फूड विभाग अब सभी के खिलाफ नकेल कसने की तैयारी कर रहा है।

एफडीए ने चालू वित्तीय वर्ष में बीते अप्रैल माह से सितंबर माह के बीच अभियान चलाते हुए जिले में विभिन्न स्थानों से 289 सैंपल भरे थे। जिनमें से 209 सैंपलों की जांच रिपोर्ट मिल चुकी है। इनमें से 87 सैंपल कसौटी पर खरे नहीं उतरे। यानी जांच में फेल साबित हुए हैं। एफडीए के अनुसार इनमें सात सैंपलों में केमिकल पाया गया है जो सीधे तौर पर सेहत को नुकसान पहुंचाता है।

फूड विभाग के अफसरों के मुताबिक जिन खाद्य पदार्थों के सैंपल भरे गए, उनमें अधिकांश रूटीन में प्रयोग होने वाले हैं। जैसे दूध, पनीर, मसाले, सॉस, चटनी, नूडल्स, सरसों का तेल, रिफाइंड, नमक, बेसन, नमकीन, बेकरी बिस्किट, वनस्पति घी आदि। मिठाई के तीन सैंपलों में सिंथेटिक कलर मिला। सॉस के दो सैंपलों में हानिकारक कलर पाया गया। खतरनाक श्रेणी में एक सैंपल मसाले का रहा। इन आंकड़ों में एनर्जी ड्रिंक रेडबुल को भी रखा गया है, जिसका भी सैंपल फेल पाया गया।

शासन और एफडीए मानता है कि त्योहारी सीजन में डिमांड बढ़कर दो से चार गुना तक हो जाती है। जबकि दूध का उत्पादन आम दिनों की तरह ही होता है। ऐसे में बढ़ी हुई डिमांड को पूरा करने के लिए इसमें मिलावट का सहारा लिया जाता है। इसके साथ ही दूध से बने हुए प्रोडक्ट हैं। इसलिए सामान्य तौर पर मिलावट की संभावना बढ़ जाती है। इसके पीछे इस सीजन में मोटी कमाई का भी बड़ा फैक्टर रहता है।

एफडीए की सैंपलिंग में 98 फीसदी तक कलर वाली मिठाईयां फेल हुई है। जितनी भी मिठाईयां कलर लगाकर बनाई जाती है वो स्वास्थ्य के लिए घातक है। क्योंकि इनमें अधिकांश में सिंथेटिक कलर प्रयोग होता है। एफएसएसएआई (भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण) ने भी सिंथेटिक कलर को
प्रतिबंधित कर रखा है।

फूड इंस्पेक्टर अजय जायसवाल के मुताबिक त्योहारी सीजन में मावे की मिठाईयों के सैंपलों में करीब 60 से 80 फीसदी तक में मिलावट के मामले सामने आते हैं। इनमें खासकर मैदा, मिल्क पाउडर व अन्य उत्पादों को मिलाया जाता है। त्योहार पर खासकर देहात क्षेत्रों में एक सप्ताह पहले से मिठाईयां बननी शुरू हो जाती हैं। जिस कारण से उनकी क्वालिटी ग्राहक तक पहुंचने तक काफी हद तक खराब हो चुकी होती है।

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