Patrika Hindi News

> > > > 5 year fight with psc management in court, now became adpo

पीएससी प्रबंधन से 5 साल तक कोर्ट में लड़े, तब कहीं जाकर बने एडीपीओ

Updated: IST kuldeep singh after joining
रिजल्ट की मैरिट लिस्ट में परीक्षार्थी का नाम नहीं था। तो उसने आरटीआई के माध्यम से पीएससी से आंसरशीट मांगी, लेकिन देने से मना कर दिया गया। फिर उच्च न्यायालय ग्वालियर में याचिका दायर की। न्यायालय के आदेश पर पीएससी ने आंसरशीट दी। जिन 6 प्रश्नों के जवाब को पीएससी ने गलत माना था, वे सही थे। जब पीएससी से सुधार के लिए कहा, तो मना कर दिया।

ग्वालियर। मप्र राज्य प्रशासनिक सेवा (पीएससी) की सहायक जिला लोक अभियोजन अधिकारी की परीक्षा देने वाले शिवपुरी के कुलदीप सिंह भदौरिया को छह प्रश्न के सही जवाब को सही कराने के लिए पांच साल तक कानूनी लड़ाई लडऩा पड़ी। आखिरकार 30 नवंबर-2016 को पीएससी प्रबंधन को मानना पड़ा कि यह जवाब सही थे और कुलदीप को उज्जैन में एडीपीओ के पद पर ज्वाइनिंग देना पड़ी।

कुलदीप ने शिवपुरी के दीनदयालपुरम में रहकर 2010 में पीएससी से सहायक जिला लोक अभियोजन अधिकारी की परीक्षा तैयारी की। उसने बताया कि परीक्षा देने के बाद पूरा भरोसा था कि मेरा नाम मैरिट लिस्ट में आया। 30 जून 2011 को रिजल्ट आया तो मेरा नाम मैरिट लिस्ट में नहीं था। इसके बाद आरटीआई के माध्यम से पीएससी से आंसरशीट मांगी, लेकिन देने से मना कर दिया गया। फिर उच्च न्यायालय ग्वालियर में याचिका दायर की। न्यायालय के आदेश पर पीएससी ने आंसरशीट दी। जिन 6 प्रश्नों के जवाब को पीएससी ने गलत माना था, वे सही थे। जब पीएससी से सुधार के लिए कहा, तो मना कर दिया।

2012 में फिर हाईकोर्ट ग्वालियर में याचिका दायर की, लेकिन हाईकोर्ट की सिंगल बैंच ने यह कहते हुए याचिका निरस्त कर दी कि पीएससी का इसमें कोई इंटेशन नहीं था। मैंने डबल बैंच में अपील की, तो न्यायालय ने उन सवालों के जवाबों को जांचने के लिए रिटायर्ड जस्टिस धर्माधिकारी को जांच अधिकारी नियुक्त किया, लेकिन जस्टिस ने जांच किए बिना, उसे लौटा दिया।

न्यायालय ने पुन: जांच अधिकारी रिटायर्ड जस्टिस आरएस गर्ग को बतौर एक्सपर्ट नियुक्त किया। जस्टिस गर्ग ने रिपोर्ट में 6 में से 5 प्रश्नों के जवाब को सही माना। इस आधार पर 27 मार्च 2014 को यह निर्णय दिया कि रिजल्ट पुन: बनाया जाए। और अंक मैरिट के अंदर आते हैं, तो ज्वाइनिंग दी जाए। अन्यथा क्षतिपूर्ति के रूप में 5 लाख रुपए पीएससी दे। इसके लिए पीएससी को 60 दिन का समय दिया गया।

पीएससी ने 59 वें दिन मामले को सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज करते हुए एसएलपी (स्पेशल लीव पिटीशन) दायर की। चूंकि सुप्रीम कोर्ट की फीस अधिक थी, इसलिए पहले जिस वकील ने इस मामले को अपने हाथ में लिया, उन्होंने आगे नहीं बढ़ाया। एक साल इस इंतजार में गुजर गया, इसके बाद ऐसे वकील मिले, जिसने कहा कि निर्णय के बाद फीस देना। सुप्रीम कोर्ट ने 28 मार्च 2016 को पक्ष में फैसला दिया। तब भी पीएससी से नौकरी देने में 8 माह का समय लगा दिया और 30 नवंबर 2016 को उज्जैन न्यायालय में एडीपीओ के पद पर ज्वाइनिंग मिली।

परिजन देते रहे हौसला
मुझे कई बार निराशा भी हुई,लेकिन मेरे माता-पिता व बड़े भाई के मुंह से एक ही बात निकलती थी कि तुम्हें नौकरी जरूर मिलेगी। उनके हौसले ने मेरी हिम्मत नहीं टूटने दी और आखिरकार इस न्याय की जंग मैंने जीत ली। 30 नंवबर को पिता के साथ जाकर उज्जैन में नौकरी की ज्वाइनिंग दी, उस खुशी का ठिकाना ही नहीं था।

यह भी पढ़े :
अपने विवाह के सपने को सपने भारत मैट्रीमोनी से साकार करे।- निःशुल्क रजिस्ट्रेशन करे!

Latest Videos from Patrika

Patrika.com

लेटेस्ट ख़बरें ई-मेल पर पाने के लिए सब्सक्राइब करें

Dus ka Dum
Ad Block is Banned Click here to refresh the page

???? ??????? ?? ??? ???? ????? ???