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श्राद्ध यानि दिवंगत पारिवारिक जनों का श्रद्धापूर्वक स्मरण

Updated: IST pitru paksh
हर व्यक्ति के श्राद्ध का एक अलग दिन होता है जैसे पिता का श्राद्ध अष्टमी के दिन और माता का नवमी के दिन किया जाए। परिवार के ऐसे पितर होते हैं अकाल मृत्यु हो जाती है, ऐसे लोगों का श्राद्ध चतुर्दशी के दिन किया जाता है।

ग्वालियर। श्राद्ध करने का सीधा संबंध पितरों यानी दिवंगत पारिवारिक जनों का श्रद्धापूर्वक किए जाने वाला स्मरण है जो उनकी मृत्यु की तिथि में किया जाता हैं। अर्थात पितर प्रतिपदा को स्वर्गवासी हुए हों, उनका श्राद्ध प्रतिपदा के दिन ही होगा।

इसी प्रकार अन्य दिनों का भी, लेकिन विशेष मान्यता यह भी है कि पिता का श्राद्ध अष्टमी के दिन और माता का नवमी के दिन किया जाए। परिवार में कुछ ऐसे भी पितर होते हैं जिनकी अकाल मृत्यु हो जाती है, यानी दुर्घटना, विस्फोट, हत्या या आत्महत्या अथवा विष से। ऐसे लोगों का श्राद्ध चतुर्दशी के दिन किया जाता है। साधु और सन्यासियों का श्राद्ध द्वाद्वशी के दिन और जिन पितरों के मरने की तिथि याद नहीं है, उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाता है।

जीवन मे अगर कभी भूले-भटके माता पिता के प्रति कोई दुर्व्यवहार, निंदनीय कर्म या अशुद्ध कर्म हो जाए तो पितृपक्ष में पितरों का विधिपूर्वक ब्राह्मण को बुलाकर दूब, तिल, कुशा, तुलसीदल, फल, मेवा, दाल-भात, पूरी पकवान आदि सहित अपने दिवंगत माता-पिता, दादा ताऊ, चाचा, पड़दादा, नाना आदि पितरों का श्रद्धापूर्वक स्मरण करके श्राद्ध करने से माना जाता है कि सारे ही पाप कट जाते हैं। यह भी ध्यान रहे कि ये सभी श्राद्ध पितरों की दिवंगत यानि मृत्यु की तिथियों में ही किए जाएं।

मान्यता है कि ब्राह्मण के रूप में पितृपक्ष में दिए हुए दान पुण्य का फल दिवंगत पितरों की आत्मा की तुष्टि हेतु जाता है। अर्थात् ब्राह्मण प्रसन्न तो पितृजन प्रसन्न रहते हैं। अपात्र ब्राह्मण को कभी भी श्राद्ध करने के लिए आमंत्रित नहीं करना चाहिए। मनुस्मृति में इसका खास प्रावधान है।

किसका श्राद्ध कौन करे?
पिता के श्राद्ध का अधिकार उसके पुत्र को ही है किन्तु जिस पिता के कई पुत्र हो उसका श्राद्ध उसके बड़े पुत्र, जिसके पुत्र न हो उसका श्राद्ध उसकी स्त्री, जिसके पत्नी नहीं हो, उसका श्राद्ध उसके सगे भाई, जिसके सगे भाई न हो, उसका श्राद्ध उसके दामाद या पुत्री के पुत्र (नाती) को और परिवार में कोई न होने पर उसने जिसे उत्तराधिकारी बनाया हो वह व्यक्ति उसका श्राद्ध कर सकता है।

किस विधि से या कैसे करें श्राद्ध
जिस तिथि को आपको घर मे श्राद्ध करना हो उस दिन प्रात: काल जल्दी उठ कर स्नान आदि से निवर्त हो जाये। पितरो के निम्मित भगवन सूर्य देव को जल अर्पण करें और अपने नित्य नियम की पूजा करके अपने रसोई घर की शुद्ध जल से साफ़ सफाई करें, और पितरो की सुरुचि यानि उनके पसंद का स्वादिष्ट भोजन बनाएं।
भोजन को एक थाली में रख लें और पांच जगह 2 -2 पुड़ी या रोटी जो भी आपने बनायीं है उस पर थोड़ी सी खीर रख कर पत्तलों पर रख लें। एक उपला यानि गाय के गोबर का कंडे को गरम करके किसी पात्र मे रख दें। अब आप अपने घर की दक्षिण दिशा की तरफ मुख करके बैठ जाऐं। अपने सामने अपने पितरों की तस्वीर को एक चोकी पर स्थापित कर दें।

एक महत्वपूर्ण यह है की पितरो की पूजा में रोली और चावल वर्जित है। रोली रजोगुणी होने के कारण पितरों को नहीं चढ़ती, चंदन सतोगुणी होता है अत: भगवान शिव की तरह पितरों को भी चन्दन अर्पण किया जाता है। इसके अलावा पितरों को सफेद फूल चढ़ाए जाते हैं तो आप भी अपने पितरो को चन्दन का टिका लगाएं और सफ़ेद पुष्प अर्पण करें। उनके समक्ष 2 अगरबत्ती और शुद्ध घी का दीपक जलाएं। फिर हाथ जोड़ कर अपने पितरो से प्रार्थना करें और जाने अनजाने मे हुई गलती के लिए माफ़ी मांगे, अपने घर की सुख शांति और समृद्धि का आशीर्वाद मांगे और उन्हें भोजन का निमंत्रण दें।

भोजन की थाली और पांच जगह जो आपने पितरो की बलि रखी है उसे पितरो की तस्वीर के सामने रख दें। गरम उपला यानि कंडे पर आप शुद्ध घी और भोजन की थाली में से थोड़ा थोड़ा समस्त पकवानों को लेकर शुद्ध घी में मिलाकर उपले (कंडे ) पर अपने पितरो को भोग अर्पण करें जिसे हम धूप भी कहते हैं। मान्यता यह भी है कि जब तक आप इस प्रकार अपने पितरो को इस प्रकार धूप नहीं देंगे तब तक आपके घर के पितृ देवता भोजन ग्रहण नहीं करते हंै। उस धुप से उठने वाली सुगंध से ही वो भोजन को ग्रहण करते हैं। धूप देने के बाद अपने सीधे हाथ में जल लेकर भोजन की थाली के चारो और तीन भर घुमा कर अंगुठे की तरफ से जल जमीन पर छोड़ दे।

हम में से बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्हें यह नहीं पता होगा की जब हम अंगुलियों की तरफ से जल छोड़ते है तो वो जल देवता ग्रहण करते है और जब हम अंगूठे की तरफ से जल छोड़ते है तो वह जल आपके पितृ ग्रहण करते हैं। अगर आप चाहते हैं ही आपके पितृ आपका दिया हुआ भोजन और जल ग्रहण करे तो इस विधि से धुप दे ेऔर जल को अंगूठे की तरफ से छोड़ें। एक बार पुन: उनसे मंगल आशीर्वाद की कामना करें। पांच बलि में से एक-एक बलि क्रमश: गाय को, कुत्ते को, कौए को, एक किसी भी मांगने वाले को और एक चींटी को दे दें । भोजन की थाली घर में बुलाए ब्राह्मण के सामने रखें। उसे आत्मीयता से भोजन करवाएं। भोजन के पश्चात ब्राह्मण देवता के चरण छूकर आशीर्वाद प्राप्त करें और ब्राह्मण देवता को यथा शक्ति दक्षिणा, वस्त्र आदि दे कर विदा करें।

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