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नोटबंदी के बीच एक पिता की मजबूरी, 2 हजार में कैसे होगी बिटिया की विदाई

Updated: IST ban on note
अंचल के मुरैना के एक किसान की मजबूरी ये है कि उसकी बेटी की शादी होनी है लेकिन उसके पास कैश नहीं है। उस मजबूर पिता की आंखों में एक ही सवाल है कि आखिर 2 हजार रुपए में वो बिटिया को कैसे विदा कर पाए?

ग्वालियर/मुरैना। नोटबंदी ने कई लोगों को परेशान किया है। किसी को इलाज के लिए मोहताज होना पड़ा तो किसी के सपने टूट गए। इस नोटबंदी ने एक पिता के सपने और दायित्व दोनो को पूरा करने में मुश्किल खड़ी कर दी। अंचल के मुरैना के एक किसान की मजबूरी ये है कि उसकी बेटी की शादी होनी है लेकिन उसके पास कैश नहीं है। उस मजबूर पिता की आंखों में एक ही सवाल है कि आखिर 2 हजार रुपए में वो बिटिया को कैसे विदा कर पाए?

बेटी की विदाई के लिए फसल बेची थी। सोचा था जो पैसा आएगा, उससे बेटी को भेंट-उपहार देकर ससुराल भेजेंगे, लेकिन अब बैंक वाले फसल की रकम में से बस दो हजार रुपए दे रहे हैं। कोई बताए इतने कम पैसे में बेटी की विदाई का खर्च कैसे पूरा करें। यह व्यथा है दोनारी गांव के किसान गब्बर सिंह की, जो मंगलवार को सेंट्रल मध्यप्रदेश ग्रामीण बैंक में भुगतान लेने आए थे।

कृषक गब्बर सिंह गुर्जर तीन-चार दिन से भुगतान के लिए बैंक आ रहे थे। मंगलवार को भी वे अपना पैसा लेने की आस में बैंक पहुंचे, लेकिन कैश काउंटर पर बैठे कर्मचारी ने बताया गया कि उन्हें सिर्फ दो हजार रुपए का भुगतान मिल सकता है, इससे ज्यादा नहीं। गब्बर ङ्क्षसह ने जब इसका कारण पूछा तो जवाब मिला कि बैंक में कैश नहीं है।

समुचित भुगतान न मिलने से मायूस गब्बर सिंह ने बताया कि अभी हाल ही में उन्होंने 21700 रुपए की ग्वार की फसल बेची थी। सोचा था कि यह पैसा बेटी की विदाई में काम आएगा, लेकिन अब यह बैंक से वापस ही नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने कहा कि यह कैसा नियम है कि लोग अपना स्वयं का जमा पैसा जरूरत के लिए नहीं निकाल पा रहे हैं। बकौल गब्बर सिंह वे बैंक मैनेजर से कहकर आए हैं कि इस मामले को न्यायालय में चैलेंज करेंगे।

नहीं कर पा रहे गेहूं की बोवनी
गब्बर सिंह की तरह कई अन्य किसान भी बैंक से भुगतान नहीं हो पाने के कारण परेशान हैं। मृगपुरा के रहने वाले ऐसे ही एक किसान महेन्द्र परमार ने बताया कि उन्हें गेहूं की बोवनी करनी है। खाद-बीज के लिए पैसे की जरूरत है, इसलिए छह दिन से बैंक आ रहे हैं, लेकिन रोज बिना पैसे के लौटना पड़ रहा है।

एक दिन तो जैसे-तैसे काउंटर तक पहुंचे, लेकिन तब तक पैसा खत्म हो गया। बकौल महेन्द्र सिंह वे गांव में ही रहते हैं, लेकिन छह दिन से शहर में ही बसेरा कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि ग्रामीण बैंक में किसानों के ही खाते अधिक हैं। चंूकि इस बैंक को कुछ दिन से कैश नहीं मिल रहा है, इसलिए उन्हें भुगतान नहीं हो पा रहा है।

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