Patrika Hindi News

> > > > Jah Hospital facilities are not

Photo Icon मरीज दर्द से चीखता रहा, न वार्ड बॉय मिला न दवाएं

Updated: IST jah hospital
मरीज को दर्द से राहत दिलाने के लिए आपको दवा भी निजी मेडिकल से खुद ही लाना होगी। करोड़ों का फंड डकारने के बावजूद भी मरीजों को जेएएच में न सुविधाएं मिल रही हैं और न ही दर्द से राहत।

हरपाल सिंह चौहान/नीरज चतुर्वेदी @ ग्वालियर

जेएएच की व्यवस्थाओं का जायजा लेने और मरीजों की पीड़ा को समझने के लिए पत्रिका टीम एक साथी को मरीज बनाकर बुधवार रात जेएएच लेकर पहुंची तो वार्ड ब्वॉय, स्ट्रेचर, डॉक्टर और दवाओं की हकीकत सामने आ गई। जैसा सोचा था, वैसा ही पाया।

पत्रिका टीम माधौ डिस्पेंसरी के गेट पर खड़ी होकर दुहाई देती रही कि मरीज गंभीर है, लेकिन न तो वार्ड वॉय आया न ही केबिन में बैठे डॉक्टर उसे देखने बाहर आए। एेसा ही कुछ नजारा पत्थर वाली बिल्डिंग में भी सामने आया। वहां भी मरीज को अपने कंधो के सहारे डॉक्टर के पास लेकर जाना पड़ा।

स्थान: माधव डिस्पेंसरी, समय: रात 10:02 बजे

टीम के सदस्य मरीज को बाइक पर बैठाकर माधव डिस्पेंसरी के गेट पर लेकर पहुंचे। मरीज दर्द से चीख रहा था। गेट पर खड़े गार्ड से कहा, वार्ड ब्वॉय को बुला दो, मरीज को डॉक्टर के केबिन तक लेकर जाना है। गार्ड ने जवाब दिया, खुद ही लेकर चले जाओ।

अंदर जाकर डॉक्टर को बताया, मरीज बाइक से गिर पड़ा है। शायद उसके कंधे में फ्रेक्चर है, अंदर तक लाने के लिए वार्ड ब्वॉय चाहिए। इस डॉक्टर ने भी वही दोहराया, खुद ही लेकर आ जाओ। मरीज दर्द से कराहता रहा, लेकिन वार्ड ब्वॉय नहीं आया।
कुछ देर इंतजार के बाद टीम के सदस्यों ने खुद ही स्ट्रेचर ढूंढा और मरीज को स्ट्रेचर पर लेटाकर डॉक्टर के केबिन में लेकर पहुंचे। यहां डॉक्टर ने नाम, पता लिखने में कुछ समय लिया। जब बार-बार निवेदन किया कि मरीज गंभीर है, तब डॉक्टर देखने आए। डॉक्टर के कहने पर एक्सरा भी कराया, लेकिन जब दवा की बारी आई तो डॉक्टर ने हाथ खड़े कर दिए। उन्होंने कहा, दवा तो मेडिकल से खरीदकर ही लानी पड़ेगी। रात को सरकारी दवा नहीं मिलती।

स्थान: जेएएच, समय: 10:28 मिनिट
टीम के साथी को पेट दर्द की शिकायत लेकर जब गेट पर पहुंचे और स्टेचर मांगा तो गेट पर तैनात चौकीदार ने कहा, यहां कोई स्ट्रेचर नहीं है।

आपको अगर इलाज कराना है तो मरीज को पकड़ कर ही ले जाना पड़ेगा। जैसे-तैसे मरीज को मेल वार्ड में लेकर पहुंचे तो ड्यूटी पर तैनात जूनियर डॉक्टर ने पन्द्रह मिनिट तक तो ज्यादा मरीज होने की बात कहकर बैठाए रखा। जब हमारे मरीज का दर्द बड़ा तो हमने डॉक्टर के पास जाकर मरीज को देखने को कहा। डॉक्टर ने मरीज का पेट पकड़ा और कहा, आप अल्टासाउंड कराकर आओ, तब दर्द की वजह पता चल सकेगा।

कंधों का सराहा देकर जैसे-तैसे मरीज को वापस गेट तक लेकर पहुंचे तो गार्ड ने कहा, मरीज को अपनी गाड़ी पर बैठाकर ले जाओ और अल्टासाउंड कराकर लाओ, यहां कोई व्यवस्था नहीं है।

चार घंटे भटकी महिला, नहीं मिली दवा
बुखार से पीडि़त एक महिला जयारोग्य अस्पताल की ओपीडी में इलाज के लिए पहुंची। चिकित्सक ने परीक्षण उपरांत दवा लिख दी। दवा स्टोर पहुंचने पर जब उसे दवा नहीं मिली, तो वह भटकती हुई जेएएच स्थित हेल्प डेस्क जा पहुंची। चार घंटे से परेशान महिला यहां पहुंचते ही फूट-फूटकर रोने लगी। उसका कहना था कि जब दवाएं नहीं मिल रही हैं, तो डॉक्टर ने लिखी क्यों। उसके पास दीनदयाल कार्ड भी था।

दवाएं नहीं है बाहर से लेकर आओ
मरीज का एक्सरे करने के बाद जब डॉक्टरों ने दवाएं देने के नाम पर एक पर्ची पर कुछ दवाएं लिख दी और कहा कि यह सभी दवाएं बाहर मेडिकल से खरीद लेना। इस पर जब डॉक्टर से कहा गया कि दवाएं तो आप यहां से ही दे दो। इस पर डॉक्टर ने कहा कि ट्रामा सेंटर में रात के समय दवाएं नहीं दी जाती । इसलिए आप सभी दवाएं बाहर से ही खरीद लेना।

इन घटनाओं के बाद भी नहीं आया होश
24 अगस्त: हरिशंकरपुरम में रामश्री किड्स स्कूल में नर्सरी में पढऩे वाली 3 साल की मासूम बच्ची के साथ ड्राइवर ने दुष्कर्म का प्रयास किया। परिजन उसे कमलाराजा अस्पताल लेकर पहुंचे। वह दर्द से चिल्ला रही थी। परिजन 3 घंटे तक डॉक्टरों से मिन्नतें करते रहे, लेकिन उसका अल्ट्रासाउंड नहीं किया, बल्कि यह बोला कि एेसे रेप तो रोज होते हैं।

29 अगस्त: ईसागढ़ से वृद्ध मूलिया बाई को इलाज कराने पोते अस्पताल लेकर पहुंचे। मूलिया दर्द से चीख रही थी। पोतो ने जूनियर डॉक्टर्स से जल्दी इलाज करने को कहा तो डॉक्टर भड़क गए और पोतों को बंधक बनाकर पीटा। बाद में पोतों पर ही एफआईआर करा दी। दहशत की वजह से मूलिया बिना इलाज कराए अपना दर्द लेकर घर लौट गई।

7 सिंतबर: चंदन नगर निवासी ऑटो चालक के बेटे ने स्कूल से घर आकर फांसी पर लटक गया। घरवाले तुरंत जेएएच लेकर पहुंचे। करीब 3 घंटे तक डॉक्टर टाल-मटोल करते रहे। इसके बाद भी उसे बेहतर इलाज नहीं मिला। मजबूरी में उन्हें प्राइवेट अस्पताल लाना पड़ा।

जितनी भी आवश्यक उपलब्ध दवाएं हैं वह सभी मरीजों को दी जाती हैं। ऐसा कुछ नहीं है कि ट्रॉमा सेंटर में दवाएं ही नहीं हैं। अस्पताल में गंभीर मरीज की देखरेख के लिए वार्ड बॉय की व्यवस्था है।
डॉ. जेएस सिकरवार, अधीक्षक जेएएच

यह भी पढ़े :
अपने विवाह के सपने को सपने भारत मैट्रीमोनी से साकार करे।- निःशुल्क रजिस्ट्रेशन करे!
Patrika.com

लेटेस्ट ख़बरें ई-मेल पर पाने के लिए सब्सक्राइब करें

Dus ka Dum
Ad Block is Banned Click here to refresh the page

अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करे