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आश्चर्य किंतु सत्य....एक ऐसा मेला जहां सुनाई देती है प्रेतात्माओं की चीख....जानने के लिए यहां क्लिक करें

Updated: IST Bhoot Mela
यहां कोई जकड़ा होता है जंजीरों से तो किसी के पैरों में होती हैं बेडिय़ां। कोई झूमता हुआ तो कोई चीखते-चिल्लाते नजर आता है।

होशंगाबाद /बैतूल. भारत मेलों का देश कहलाता है। मेला हमारी संस्कृति और परिवेश की पहचान रही है। हर मेला अपने अपने-आप में एक अलग पहचान लिए होता है। ऐसा ही एक मेला है मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में लगने वाला मलाजपुर का मेला, जो भूतों के मेले के नाम से प्रदेश सहित देश में विख्यात है। हर साल मकर संक्रांति पर लगने वाले इस मेले में प्रेतात्माओं से पीडि़त लोग आते हैं और बुरी बलाओं से मुक्ति पाते हैं। मकर संक्रांति से प्रारंभ होकर यह मेला लगभग एक माह चलता है।

क्या है मान्Bhoot Melaता- यहां रहने वाले इस मेले को एक संत के चमत्कार से जोड़ते हैं। पुजारियों का कहना है कि 1770 में यहां पर गुरुसाहब नाम के एक संत ने जीवित समाधि ली थी। संत चमत्कारी थे जो हर प्रकार की बुरी बलाओं यथा भूत-प्रेतों को वश में रखते थे। उनकी समाधि के संपर्क में आने के बाद पीडि़तों के शरीर से बुरी आत्माओं का वास खत्म हो जाता है। इसी मान्यता के चलते यहां हर वर्ष भूत-प्रेतों से पीडि़त सैकड़ों-हजारों लोग आते हैं और लंबी कतार में खड़े होकर शरीर से भूत-प्रेत का साया हटवाने के लिए अपनी बारी का इंतजार करते हैं।

कैसे दूर होती है बाधा- भूत-प्रेत की बाधा से पीडि़त व्यक्ति जब यहां आता है तो नजारा देखने लायक होता है। किसी के हाथ में जंजीर बंधी होती है, तो किसी के पैरों में बेडिय़ां। कोई झूम रहा होता है, तो कोई चीखते-चिल्लाते नजर आता है। लेकिन लोगों का मानना है कि यह सारे दृश्य पल भर में ही खत्म हो जाते हैं। भूत-प्रेत के साये से प्रभावित लोग समाधि स्थल की उल्टी परिक्रमा लगाते हैं। समाधि परिक्रमा करने से पहले स्नान करना पड़ता है। इसके बाद प्रेत बाधा का शिकार व्यक्ति जैसे-जैसे परिक्रमा करता है, वैसे-वैसे बाधा शरीर से विलग होती जाती है। मान्यता है कि, पीडि़त लोग जब समाधि की परिक्रमा करते हैं, तो बुरी आत्मा शरीर से निकलकर समीप के बरगद पर जाकर बैठ जाती है और शरीर को मुक्ति मिल जाती है। साथ ही यहां के पुजारी (पडि़हार) बुरी छाया से पीडि़त लोगों के बाल पकड़कर जोर से खींचते हैं और झाड़ा भी लगाते हैं।

Bhoot Mela

पूर्णिमा का होता है खास महत्व- ऐसा माना जाता है कि पूर्णिमा व अमावस्या के दिन को विशेष रूप से प्रेतात्माओं से जोड़ा जाता है। जिस शरीर में बुरी आत्माओं का वास होता है उस शरीर पर इनका असर पूर्णिमा व अमावस्या को ज्यादा होता है। इसी मान्यता के चलते यहां भी पूर्णिमा की रात का विशेष महत्व होता है। यहां आने वाले पीडि़त लोग इस दिन को ध्यान मेें रखकर ही आते हैं। इस दिन यहां सबसे ज्यादा भीड़ होती है और लोगों को अपनी बारी का लंबा इंतजार करना होता है।

ठीक होने पर करना होता है तुलादान- ऐसी मान्यता है कि पीडि़त व्यक्ति के यहां से ठीक होने के बाद गुड़ से उसका तुलादान करना होता है। इसके चलते यहां हर साल कई टन गुड़ इकट्ठा होता है जो मेले में आने वाले लोगों को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।

यह है संत का इतिहास- जानकारी के अनुसार विक्रम संवत 1700 के पश्चात ईसवी सन 1644 के समकालीन गुरू साहब बाबा के पूर्वज मलाजपुर के पास स्थित ग्राम कटकुही में आकर बसे थे। बाबा के परिवार के मुखिया का नाम रायसिंह तथा पत्नी का नाम चंद्रकुंवर बाई था । इनके चार पुत्र मोतीसिंह, दमनसिंह, देवजी (गुरूसाहब) और हरिदास थे। श्री देवजी संत (गुरू साहब बाबा) का जन्म विक्रम संवत 1727 फाल्गुन पूर्णिमा को कटकुही ग्राम में ही हुआ था। बाल्यकाल से ही भगवान भक्ति में लीन श्री गुरू साहेब बाबा ने मप्र के हरदा जिले के अंतर्गत ग्राम खिड़किया के संत जयंता बाबा से गुरूमंत्र की दीक्षा ग्रहण कर अमृतसर चले गए। यहां कुछ दिन अपने ईष्टदेव की पूजा आराधना में लीन रहें। इसके बाद बाबा भोले की नगर काशी चले गए। बताते हैं कि यहां गयाघाट पर उनका मंदिर बना हुआ है। उसके बाद बाबा ने मलाजपुर में जीवित समाधि ली। ऐसा बताया जाता है कि इस गांव में आज भी बाबा के भक्तों का अंतिम संस्कार नहीं किया जाता है बल्कि उन्हें समाधि दी जाती है।

कहीं विश्वास कहीं अंधविश्वास- पूरे प्रदेश में विख्यात यह मेला कहीं विश्वास का प्रतीक है तो कहीं अंधविश्वास माना जाता है। हालांकि मेले को लेकर कई बार विवाद भी हुए हैं। कई लोग इसे अंधविश्वास मानते हैं। उनका मानना है कि लोग अंधविश्वास के वशीभूत होकर यहां आते हैं। लेकिन जिन लोगों ने इस पर विश्वास किया है और जो लोग यहां से ठीक हुए हैं। वे इस स्थल की सच्चाई को जानते हैं। उउनका कहना है कि बाबा की समाधि वास्तव में चमत्कारिक है। सच्चे मन से विश्वास के साथ यदि यहां जाया जाए तो लाभ जरूर होता है।

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