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MP में होली की अनोखी है ये परंपराएं, अंगारों पर चलकर इसलिए खुद को देते हैं दर्द

Updated: IST traibles
धुलेंडी पर झाबुआ में गल, पेटलावद में चूल का होता है आयोजन, शीतला सप्तमी पर खेली जाती है लट्ठमार होली, शहर में हर मोहल्ले में होता है होलिका दहन, अंचल में आज भी पूरे गांव की एक ही होली जलती है

राजेश मिश्र @ झाबुआ. जिले में विभिन्न समाजों द्वारा अलग-अलग होली मनाई जाती है। अलग-अलग मोहल्लों में अलग-अलग होलिका दहन किया जाता है।

लेकिन ग्रामीण अंचलों में आज भी इस पर्व का पुरातन स्वरूप देखने को मिल जाता है और एक गांव में एक ही होलिका दहन होता है, जिसमें पूरा गांव शामिल होता है। कई ग्रामों में आपस में शराब एकत्रित कर ग्रामवासी होलिका माता की पूजा कर होलिका दहन करते हैं। अंचल के अधिकांश ग्रामों में होलिका दहन के बाद पलाश के फूलों से बने रंग से एक-दूसरे को रंगकर होली का आनंद उठाते हैं। ग्रामीण बाजारू रंगों से काफी दूर हैं।

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पहले महिलाएं जलाती हैं

गवली समाज द्वारा मरीमाता मंदिर पर फाग गाकर होलिका दहन किया गया। होली जलाने के पूर्व पुरुषों द्वारा ढोल बजाकर गीत गाए। यहां पहले महिलाओं द्वारा कंडे एकत्रित कर होली जलाई। उसी होली से आग लेकर पुरुषों ने होलिका दहन किया। इसके बाद श्रीफल चढ़ाकर प्रसादी बांटी गई।

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गोबर की माला

नगर में पहले लोग होलिका की परिक्रमा करते हैं, महिलाएं पूजन करती हैं। इसके बाद होली जलने के बाद फिर से होली की परिक्रमा की गई और फिर श्रीफल चढ़ाया। शहर में जहां समितियों के लोग अपने-अपने मोहल्ले से चंदा एकत्रित कर होली के लिए लकड़ी खरीदकर लाते हैं। वहीं अंचलवासियों ने अपने-अपने घरों में बनाई गई गोबर की छल्लेनुमा मालाओं को होलिका पर चढ़ाया, फिर दहन किया।

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गल देवता घूम उतारते हैं मन्नत

धुलेंडी पर्व की शाम को अंचलवासियों द्वारा गल देवता घूमकर अपनी-अपनी मन्नतें उतारने की परंपरा है। गल डेहरा जाने के पूर्व मन्नतधारी मांदल बजाकर होली की परिक्रमा कर अपनी मन्नत पूरी करने की प्रार्थना करते हैं। गल डेहरा की पूजा-अर्चना कर शाम चार बजे से मन्नतें उतारने का दौर देर शाम तक चलता रहता है। गांव के पुजारा (पुजारी) द्वारा मन्नतधारियों की पूजा-अर्चना करवाई जाती है। इसके बाद गल डेहरा में घूमकर बकरे की बलि चढ़वाई जाती है, जिसका सिर पुजारा को दिया जाता है और बाकी का मन्नतधारी अपने साथ ले जाकर इसे प्रसादी के रूप में वितरित करते हैं।

दहकते अंगारों पर चलते हैं नंगे पैर

पेटलावद क्षेत्र में चली आ रही परंपरा के अनुसार मन्नतधारी दहकते अंगारे (चूल) पर नंगे पैर चलकर अपनी मन्नतें उतारते हैं। चूल के लिए करीब 15 फीट लंबा और डेढ़ से दो फीट चौड़ा गड्ढा किया जाता है, जिसमें कई क्विंटल लकड़ी से अंगारे तैयार किए जाते हैं। इन अंगारों पर देशी घी डालकर अग्नि प्रदीप्त की जाती है। मन्नतधारी अपने परिवार की खुशहाली के साथ ही अन्य दुविधाओं को दूर करने की मन्नत लेते हैं। धुलेंडी पर्व पर पूजा-अर्चना कर चूल पर चलकर अपने घर परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं। पेटलावद सहित आसपास के क्षेत्रों में भी धुलेंडी के दिन चूल पर मन्नतधारी जिसमें बुजुर्ग, महिला और बच्चे भी अपनी मन्नत उतारने के लिए चलते हैं। इस आयोजन में हजारों की संख्या में ग्रामीण एकत्रित होते हैं।

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सप्तमी पर खेलते हैं लट्ठमार होली

वहीं पेटलावद क्षेत्र में सौ से अधिक वर्ष से जारी परंपरा के अनुसार सिर्वी समाज द्वारा शीतला सप्तमी पर क्षेत्र की प्रसिद्ध लट्ठ मार होली का आयोजन किया जाता है। समाजजन एक दूसरे के घर पर जाकर रंग, गुलाल करते हैं। लट्ठ मार होली देखने के लिए समाज सहित अन्य वर्गों के लोगों की भीड़ लगती है। इस त्योहार में महिलाओं का भी उत्साह देखने लायक रहता है। महिलाएं भी झुंड बनाकर एक दूसरे के साथ होली खेलने में पीछे नहीं रहतीं। एक बड़े बर्तन में रंग घोला जाता है, जिसमें युवक मस्ती करते हुए कूदते हैं और एक दूसरे के साथ होली खेलते हैं। इसके साथ समाज की बालिकाएं लट्ठ मार होली प्रारंभ करती हैं, जो भी युवक इस बड़े बर्तन के आसपास आकर रंग लगाने की कोशिश करता उसको महिलाएं लट्ठ मार होली का मजा चखाती हंै।

पिछले वर्ष अश्लीलता की होली जलाई, इस बार कुरीतियों को किया भस्म

पिछले वर्ष गाायत्री परिवार शांतिकुंज के आह्वान पर झाबुआ में गायत्री शक्तिपीठ बंसत कॉलोनी एवं कॉलेज शक्तिपीठ के संयुक्त तत्वावधान में सिद्धेश्वर महादेव मंदिर प्रागण में अश्लीलता की होली जलाई गई। इस वर्ष राजपूत करणी सेना द्वारा समाज में फैली कुरीतियों की होली दहन की गई।

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पंचमी पर भी निकलती है गेर

रंगपंचमी पर भी शहर में जहां गेर निकाली जाती है, वहीं अंचल के अन्य शहरों में रंगपंचमी पर खासा माहौल बनता है। इस दिन भी लोग रंग खेलते हैं। विभिन्न दलों द्वारा गेर निकाली जाती है।

36 लाख लीटर पानी की खपत

शहर में वैसे तो तीसरे दिन पानी दिया जाता है। करीब 20 लाख लीटर पानी प्रदाय होता है, लेकिन धुलेंडी पर अनुमानत: 34 से 36 लाख लीटर पानी की खपत होती है। शहर में साढ़े 6 हजार हजार कनेक्शन हैं। करीब 8 हजार परिवार हैं, जो पानी का उपयोग करते हैं।

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