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एक किलो सोने और ढ़ाई किलो चांदी की अनोखी साड़ी, कीमत डायमंड से भी ज्यादा

Updated: IST saree
125 साल पुरानी साडिय़ां, पांच महीने में हुई थी तैयार, शहर में कई ऐसी महिलाएं हैं जिनके कलेक्शन में एक सदी पुरानी साडिय़ां आज भी हैं।

इंदौर. कई महिलाओं के पास आज भी मौजूद हैं साडिय़ों के ऐसे कलेक्शन जिन्हें देखकर आप भी आपकी आश्चर्य से भर जाएंगे। शहर की महिलाओं के पास एक सदी पुरानी साडिय़ों का कलेक्शन है। ये साडिय़ां सिर्फ कलेक्शन में नहीं बल्कि पांच पीढ़ी का सफर तय कर चुकी हैं। सोने-चांदी के तारों और बूटों से सजी हैं ये साडिय़ां। बुनकरों की कलाकारी देखती ही बनती है। आज से एक सदी पहले ऐसी साडिय़ां बनती थीं पर आज के समय में ऐसी साडिय़ां बनना बंद हो गई हैं।

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साडिय़ों की कीमत भी कीमती
गायत्री वागले को साडिय़ों से बेहद लगाव है। वह जहां जाती है साड़ी खरीदना नहीं भूलती। वह इतनी पारखी है कि बगैर छूए मटेरियल और जरी की जानकारी बता देती हैं। उनके संग्रह में महाराष्ट्रीयन पैटर्न की 60 साडिय़ां शामिल है। सबसे पुरानी साड़ी 125 साल पुरानी है। इसे दादी कात्यायनी पहना करती थीं। पारंपरिक नववार साड़ी होने से इसकी लंबाई सामान्य से अधिक है। दो संबलपुरी साडिय़ां खास हैं। गायत्री ने इन्हें पुणे के नजदीक एक महिला कारीगर से बनवाया था। पूरी साड़ी में सोने के तारों का प्रयोग किया गया है। एक साड़ी को तैयार करने में पांच महीने का वक्त लगा। बेटे की शादी के लिए इन साडिय़ों को बनवाया गया था। एक साड़ी की कीमत ढाई लाख रुपए है।

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ओडिसी और आसामी सिल्क की साड़ी गोल्ड से भी महंगी
ओडीसी और आसामी सिल्क से बनी हैंड मेड साडिय़ां तो गोल्ड से भी महंगी हैं। कोचीन से लाई साडिय़ों के कलर शेड डिफरेंट हैं। कोचीन में बनी साडिय़ां अभिनेत्री रेखा को बेहद पसंद हैं। इन साडिय़ों में किया गया गोल्ड वर्क भी अलग अंदाज का है। साड़ी के मिडिल पार्ट पर हल्का और निचले हिस्से में हैवी वर्क इसकी विशेषता है। इन साडिय़ों पर कारीगर बेल बूटे नहीं बनाते थे। अतिरिक्त पैसे देने पर भी राजी नहीं होते, क्योंकि यह परंपरा के खिलाफ था।

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सुनार को घर बैठाकर करवाया जाता था काम
भुवनेश्वरी भंडारी (82) के पास तकरीबन 50 से अधिक साडिय़ों का कलेक्शन हैं। इसमें बनारसी सिल्क, पैठणी, काथा, कांजीवरम, इकत जैसी इंडियन स्टाइल की साडिय़ांहैं। साथ ही फ्रेंच शिफॉन की स्विस एम्ब्रॉइडरी वाली साड़ी खास है। 60 साल पहले पति गजेंद्र सिंह भंडारी ने इसे स्विजरलैंड से खरीदा था। इस साड़ी पर ड्यूटी भी साड़ी की कीमत के बराबर चुकाना पड़ी जो लाखों में थी। प्योर गोल्ड वर्क से सजी सुर्ख रंग की साड़ी भी विशेष है।

एक किलो सोने से बनीं साड़ी
60 साल पुरानी इस साड़ी की खासियत इसका सिफ एक पीस होना है। भुवनेश्वरी याद करती हैं कि इस तरह का काम सुनार को घर बैठाकर ही करवाया जाता था। इसे अड्डा लगाना कहते थे। राजस्थान में तो रजवाड़ी शैली की साडिय़ों में एक किलो तक सोना लगा दिया जाता था। वहीं सिल्वर वर्क की कारीगरी में ढाई किलो चांदी तक उपयोग में लाई जाती थी। एक साड़ी में चांदी की कारीगरी है। इसमें चांदी के तारों से सलमा-सितारे का वकज़् और फूलों में ठोस चांदी का यूज किया गया है। तब इन साडिय़ों की कीमत पांच हजार रुपए थी।

कारीगर कभी नहीं करते थे एक जैसा काम दुबारा
50 के दशक में इस तरह की साडिय़ां हरिश्चंद्र (मुंबई) आउटलेट से बेची जाती थी। इन्हें एक साड़ी-एक डिजाइन कॉन्सेप्ट पर तैयार किया गया है। कारीगर भी इतने संपत्ति थी कि खरीदार खुद ही दूसरी बनवाना चाहे तो वे मना कर देते थे। एक साड़ी तो सिफज़् 200 ग्राम वजन की है। बहू संगीता भंडारी के पास साठ साल पुरानी कांजीवरम है। इसकी लंबाई इतनी अधिक है कि गले तक आ जाए।

सोने-चांदी के साथ लगता था बसरा का मोती
पुष्पा भंडारी (84) मूल रूप से बनारस की हैं। बनारस में बनने वाली साडय़िां अमूमन टिशु की होती हैं। लेकिन इनके पास किमख्वाब साडिय़ां ज्यादा हैं। अधिक हैं। प्योर जरी वर्क और सोने के तारों के चलते आज इनकी कीमत लाखों रुपए है। ऐसी कारीगरी मिलना अब मुमकिन नहीं। साड़ी में मैरिगोल्ड, चमेली की बूटी, पान बूटी और फ्लोरल मैंगो को आकार दिया गया है। किमख्वाब पर जरी और गोल्ड के अलावा बसरा मोती का काम भी किया जाता था। इसे बॉर्डर पर यूज करते थे। अब तो बसरा मोती देखने को भी नहीं मिलता। पुष्पा कहती हैं कि साठ साल पहले यह साडिय़ां ली थीं। अब बनारस के बाजारों में ऐसा काम नहीं दिखाई देता। कलाबत्तू यानी जरी का गठा हुआ काम भी गायब हो गया है। यही इन साडिय़ों को आकर्षक बनाता था। सिल्क जामदानी, कटवर्क, तनछोई, वैरायटी ऑफ ब्रोकेड थे। आमतौर पर यह धारणा है कि बनारसी साडिय़ों को हाई मेंटेनेंस की जरूरत होती है। लेकिन इन साडिय़ों के साथ ऐसा नहीं। सात दशक पुरानी इन साडिय़ों को तह बदलने की जरूरत भी नहीं पड़ती। बहू जया भंडारी बेटी (एलिशा) के लिए ऐसी ही साड़ी खरीदना चाहती थीं। बनारस के बाजार तलाशे, लेकिन डिजाइन और मटेरियल मिलना तो दूर वैसे रंग भी नहीं मिल सके।

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