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जानिए 400 साल पुराने राजा - महाराजाओं की रसोई की व्यंजन विधि

Updated: IST raja ranawat
महाराजा रविप्रताप सिंह राणावत ने पहली बार राजसी स्वाद के राज से कराया रूबरू

इंदौर @मुक्ता भावसार.रॉयल फूड यानी अनूठा स्वाद और अंदाज शानदार। जब बात राजा-महाराजाओं की निकलती है तो उनकी जीवनशैली, वीरता के साथ खान-पान की आदतों पर चर्चा सबसे पहले होती है। शाही स्वाद... कहना तो स्वाद के टॉप लेवल को शो करने जैसा है और राजसी राजस्थानी स्वाद को लेकर तो फूड लवर्स की दीवानगी देखते ही बनती है। खाने-पीने के शौकीन इंदौर शहर के लिए ऐसे ही राजसी स्वाद की सौगात लेकर आए हैं मेवाड़ स्टेट की 400 वर्ष पुरानी सरवनिया जागीर के महाराजा रविप्रताप सिंह राणावत। राणावत 40 वर्षों से इंदौर में रह रहे हैं और कैफे पैलेट के स्पेशल रॉयल किचन के शेफ हैं, जो वर्षों पुराने राजसी स्वाद का जादू समेटे हैं। न केवल राणावत राजसी डिशेस की जानकारी दे रहे हैं बल्कि इनकी रेसिपीज भी पहली बार पत्रिका के पाठकों से विशेष रूप से शेयर कर रहे हैं।

maash daal

दूध में पकती 'माश दाल'
रेस्त्रां में दाल मखनी, तड़का दाल, पांच पकवान का नाम तो सभी ने सुना होगा, लेकिन माश की दाल से कम ही लोग परिचित होंगे। उड़द की दाल को संस्कृत में माश कहते हैं।
रेसिपी : रामपुर रियासत के रॉयल किचन में उड़द की दाल बनाने का तरीका कुछ खास था। इसे पानी के बजाय दूध में उबाला जाता था। धुली हुई उड़द दाल को दूध में हल्का सा नमक डालकर उबालते हैं। देशी घी में नॉर्मली फ्राय की जाती है। दूध में पकने के बाद घी का तड़का इसके स्वाद को बेहतरीन बना देता है।

ker sangri

डेढ़ महीने खराब नहीं होती है कैर-सांगरी
कैर-सांगरी की सब्जी राजस्थानी रॉयल डिश है। सांगरी और कैर की सूखी फली से बनने के कारण डिहाइड्रेट हो जाती है। इसी वजह से डेढ़ महीने खराब नहीं होती।
रेसिपी: कैर-सांगरी की सब्जी रातभर छाछ में भिगोते हैं। सुबह निचोड़कर फिर उबाल लें। अब कढ़ाई में घी गर्म कर खड़े मसाले जैसे बड़ी इलायची, तेजपत्ता, लौंग, धनिया पावडर, हल्दी, मिर्ची डालकर पकाएं। इसके बाद सूखे मेवे जैसे किश्मिश, काजू और बादाम डाल दें। थोड़ी देर में सब्जी उतार लें।

rajsi aaloo

राजाई आलू को जली हल्दी का तड़का बनाता है खास
महाराजा सैलाना की खास रेसिपी है राजाई आलू। जली हुई हल्दी का प्रयोग इसे अलग और स्वादिष्ट बनाता है।
रेसिपी : पहले घी में पीसी हल्दी को जलाया जाता है। इसके बाद मखमल के कपड़े से छाना जाता है। इसी घी में कच्चे आलू को फ्राय करके धनिया, नमक और मिर्च डाला जाता है। पकने के बाद ब्राउन ओनियन और दही मिक्स करके पकने को छोड़ दीजिए। अच्छी तरह से पकने के बाद आखिर में इसमें ग्रीन इलायची का पावडर डालें।

GATTE

गोविंद गट्टे में शाही भरावन
राजस्थान की फेमस गट्टे की सब्जी को मालवा में भी बड़े शौक से खाते हैं। गोविंद गट्टे की सब्जी से राजस्थान का राजसी अंदाज सामने आता है।
रेसिपी : बेसन में घी का मोयन डालकर पानी से गूथ लें। इसे समोसे या छोटी पूरी के शेप में बेल लें और मावा, किशमिश और काजू का भरावन कर रोल बनाकर पानी में उबाल लें। घी का तड़का लगाकर अदरक, लहसुन, प्याज की ग्रेवी और दही डालकर पकाएं। थोड़ी देर बाद धनिया पावडर, हल्दी, नमक, मिर्च जैसे जरूरी मसालें डालें। जब अच्छे से पक जाए तो बड़ी-छोटी इलायची, जावित्री व केसर डालें।

राजा-महाराजाओं में होती थी होड़....
राणावत बताते हैं कि राजस्थान के राजसी भोजन और रामपुर रियासत के अनूठे स्वाद का 'राजÓ खास मसाले हैं। मेवाड़ स्टेट में उदयपुर की सरवानिया जागीर हमारा मूल निवास है, जो लगभग 400 साल पुरानी है। उस दौर में राजा-महाराजा एक-दूसरे को भोजन पर निमंत्रण देते थे तो उनमें स्वादिष्ट व्यंजन परोसने की होड़ होती थी। साथ ही पारंपरिक व्यंजनों को राजसी अंदाज में पेश करने की कोशिश होती थी। स्वाद के मामले में सरवनिया जागीर का नाम आसपास के कई क्षेत्रों में ख्यात रहा है। इसके लिए वहां रॉयल किचन था, जिसमें हर तरह के खाने के लिए विशेष खानसामा नियुक्त किया था।

सीक्रेट रेसिपी जानने की कोशिश करते थे
वे बताते हैं कि राजा-महाराजाओं के यहां जब भोज का आयोजन होता था तब अलग-अलग जगह के खानसामा आते थे और उन्हें भोजन तैयार करने के लिए मसाले दिए जाते थे। जब बचे हुए मसाले वापस किए जाते थे तो रेसिपी को जानने और वही स्वाद पाने के लिए पहले मसालों को तौला जाता था और पता लगाया जाता था कि किस व्यंजन में कौनसा और कितने मसाले प्रयोग में लिए है, ताकि उनकी सीक्रेट रेसिपी को उसी स्वाद के साथ बनाया जा सके।

मुगलों ने शुरू किया सूखे मेवों का प्रयोग
राणावत ने बताया कि राजा-महाराजाओं की चाह सेहत से भरपूर खाने की होती थी। स्वाद को राजसी बनाने के लिए सूखे मेवों (ड्राय फ्रूट्स) का उपयोग ज्यादा होता था। शाही परिवारों में नॉनवेज डिशेज को खास तवज्जो दी जाती थी। जब मुगल और अफगान भारत आए तो उन्होंने कम मिर्च का खाना पसंद किया। भोजन में मेवे डालने की शुरुआत भी मुगलों के आने से हुई है। चिल्गोजा, काजू, बादाम, किशमिश का भोजन में प्रयोग इसी दौर से शुरू हुआ।

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