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यहां मिलती है 55 जायके की कचौरियां, परोसने का अंदाज भी है निराला 

Updated: IST
किसी दुकान पर बाल्टी में लाइट जलने का मतलब होता है कि कचौरी मिल रही है तो कही बोर्ड पर ही लिखा है कि कलेजा मजबूत हो तो ही खाओ ये झन्नाट कचौरी

इंदौर। मध्यप्रदेश का शहर इंदौर देश की फूडी सिटी के रूप में जाना जाता है। ये कहना गलत नहीं होगा कि स्वाद के शौकीनों के इस शहर में लोग जीने के लिए नहीं बल्कि खाने के लिए जीते है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इस शहर में सिर्फ कचौरियां ही 55 से ज्यादा तरह की मिलती है। बारिश के मौसम में यहां गर्मा गर्म कचौरियों के ठियों पर स्वाद के चटखारे लेने वालों की भीड़ आम बात है। मूंग दाल, आलू, भुट्टे, हरे चने, अजवाइन, लालमिर्च की झन्नाट कचौरी जैसी कई तरह की वैरायटी इस शहर में मौजूद है। इतना ही नहीं इन स्वादिष्ट कचौरियों को इंदौर में सर्व भी बेहद आकर्षक अंदाज में किया जाता है। चलिए आपको लिए चलते है इंदौर के फेमस कचौरी ठियों की स्वादिष्ट सैर पर -

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बारिश का मौसम, हल्की फहारें और भट्टी पर चढ़े कढ़ाव से उतरती गर्मागर्म गोलमटोल सुर्ख कचौरियां... बारिश में इंदौर के हर दूसरे चौराहे पर ये नजारा आम बात है। इसे देख फूड लवर्स निकल ही पड़ते है एक फूडी सैर पर। जिस दुकान की कचौरी जितनी कुरकुरी और फोसरी हो उसके आगे उतनी ही ज्यादा भीड़ लगी होती है। बद्री की बम कचौरियों के किस्से तो शहर के उम्रदराज़ लोगों के मुंह से सुनी ही जा सकती है। कऱारी, फोसरी, स्वादिष्ट कचौरियां... सबसे पहले ऊपर की कुरकुरी परत, अंदर दो-तीन रेशमी परतें और फिर आता है मसाले का स्वाद और साथ में मजेदार चटनी। यकीन मानिए, कुछ लोग तो चटनी के लिए ही कचौरी खाते हैं। लहसुन-हरी मिर्च की चटनी, इमली-खजूर की लाल चटनी, प्याज-गाजर का कचूमर,... इन चटनियों को जब कचौरी में छेद कर बीचोबीच डाला जाता है तो इसकी महक ही मन को लुभाने लगती है। कई लोग तो दुकान के बाहर से ही पूछते हैं, चटनी है ? अगर है तो रुकते हैं वरना अगले दिन आते हैं।

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1. लाल बाल्टी की कचौरी : आलू का मसाला भरी इन कचौरियों में खास इसके साथ परोसी जाने वाली हरी मिर्च व लहसुन की तीखी चटनी है। इसे खाने के बाद देरत तक मुंह में चटनी का स्वाद बना रहेगा। लाल बाल्टी टंगी है और उसमे लाइट जले तो कचौरी मिलेगी वरना लाइट जलने का इंतज़ार करना होगा।

2. इंजीनियर की कचौरी : लैँटर्न पर जीएसआईटीएस कॉलेज के पास यहां अक्सर भीड़ होती है। ये इंजीनियर की कचौरी के नाम से मशहूर हो गई हैं। आलू की कचौरी को हरी चटनी और तली मिचज़् के साथ परोसते हैं।

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3. बम की कचौरी : बाल विनय मंदिर में बद्री भैया की बम कचौरियों का जैसे एकतरफा जलवा रहा है। मल्हार और अहिल्या आश्रम में भी यही स्थिति थी। अब बम कचौरी खाना है तो मल्हारगंज और कांच मंदिर के पीछे जाना पड़ेगा। मूंग दाल के मसाले वाली छोटी कचौरियों को कोयले की आंच पर सेका जाता है। 70 के दशक वाला स्वाद आज भी वैसा ही है।

4. अनंतानंद की झन्नाट कचौरी : उसल के साथ परोसी जाती है कचौरियां। बेहद तीखी होती हैं। यहां के लोग ये कहते है कि इस कचौरी को खाने के लिए खाने वाले का कलेजा मजबूत होना बहुत जरूरी है।

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5. भाटे की कचौरी : कचोरी के मसाले में मटर, हींग, लौंग, काली मिर्च, अजवाइन, हरी मिर्च और लाल मिर्च होती है। बहुत तीखी और कड़क मसाला होने से इनका नाम भाटे की कचौरी पड़ा। एक दौर था जब इंदौर में तांगे चलते थे तब घोड़ों को भी यह कचौरियां खिलाते थे। इसलिए पुराने लोग इन्हें घोड़ा कचोरी कहते हैं।

6. सुरेश की कचौरी : मालवा मिल पर मिलने वाली इस कचौरी में आलू और दाल के साथ हींग डाली जाती है।

7. विजय चाट हाउस की कचौरी : हरे मटर और दाल मिश्रण वाली इस कचोरी का स्वाद इमली और खजूर की लाल चटनी के साथ बढ़ जाता है।

8. रवि अल्पाहार : प्याज चटनी के साथ आलू की कचौरी सवज़् की जाती है। उपवास है तो फरियाली कचौरी की व्यवस्था भी है।

9. राऊ की बाबा कचौरी : सेंव और प्याज के साथ परोसते हैं दाल कचौरी।

10. रतलाम नमकीन भंडार : एक दिन में 25 किलो प्याज और गाजर का कचूमर बनाते हैं ये। मूंग दाल का तीखा भरावन होता है।

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