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AIDS: शर्मिंदा था, आत्महत्या करना चाहता था फिर यूं बदली जिंदगी...

Updated: IST true story of drugs and hiv and me
अकसर देखा जाता है कि लोग HIV टेस्ट को लेकर काफी शरमाते हैं। जिसके परिणाम बेहद घातक होते हैं।

इंदौर. मेरे एक दोस्त को ब्लड की जरूरत थी, मुझे पता लगा तो मैं तत्काल अस्पताल पहुंचा। ब्लड डोनेशन से पहले मेरे खून की चंद बूंदों की जांच हुई। जांच के बाद डॉक्टर कुछ चौंके। मुझे कहा गया आपको ब्लड डोनेट करने की जरूरत नहीं। कुछ देर बैठिए बात करते हैं।

डोनेट करने से रोक देना मेरे मन में कई सवाल खड़े कर रहा था, इतने में डॉक्टर फिर से आए और उनकी दो टूक बातों ने जिंदगी में भूचाल ला दिया। हम बात कर रहे है मध्यप्रदेश के इंदौर शहर के एक एचआईवी संक्रमित युवक की। पेशे से ट्रक क्लिनर राजू (बदला हुआ नाम)। बात करीब दिसंबर 2012 की होगी, जांच के बाद डॉक्टर ने बताया कि मुझमें एचआईवी के वायरस है। इसका इलाज करवाना होगा। राजू ने बताया कि उस वक्त से मुझे लगने लगा कि मेरा जीवन अब खत्म हो चुका है।

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मैं अपने दोस्तों-परिवार वालों से छिपकर आत्महत्या करने के तरीके देखने लगा। यही नहीं मैंने अपने जेब में जहर भी रखना शुरू कर दिया, ताकि मैं मौका देखकर अपने-आप को खत्म कर लूं। लेकिन एक दिन फिर मेरी जिंदगी में कुछ ऐसा हुआ, जिससे मैं इस घातक रोग से लड़ सका और आज स्वस्थ्य हूं। दरअसल मुझे डॉक्टरों ने फिर चेकअप के लिए बुलाया। दोस्तों और परिवार वालों ने मुझे अस्पताल भेजा तब मुझे वहां पुराने मरीजों से मिलवाया, जिन्होंने एचआईवी से लड़ाई लड़कर अपनी जिंदगी में फिर ताजगी ले आए थे और अब मुझे खुशी है कि आज मैं आम जिंदगी जी रहा हूं।

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एचआईवी और एड्स का खतरा कम हुआ

दुनियाभर में एचआईवी और एड्स का खतरा कम हुआ है, इसमें भारत आगे है। वहीं अपने इंदौर की बात करें तो काफी अच्छी बात है। एड्स पीडि़तों की संख्या में इंदौर जिले में छह साल में 35 फीसदी की कमी आई है। स्वास्थ्य विभाग का दावा है कि लगातार चलाए जा रहे जागरुकता कार्यक्रमों के परिणामस्वरूप ऐसा हुआ है।

अध्ययन के अनुसार अब एचआईवी संक्रमण से एड्स में तब्दील होने की प्रक्रिया सुस्त पड़ रही है और यह कम संक्रामक हुआ है। वायरस में आ रहे बदलाव से इस महामारी को रोकने के प्रयास में मदद मिल सकती है। जानकारों का मानना है कि बदलाव से वायरस की संक्रमण शक्ति कमजोर हो रही है, जिसके चलते एड्स में बदलने में ज्यादा वक्ता लगता है।

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वर्ष 2011 में जहां 932 एचआईवी पॉजिटिव मरीज थे, वहीं वर्ष 2016 के नवंबर तक यह आंकड़ा 600 मरीजों तक सिमटा है। जिले में 37 विभिन्न शासकीय व अशासकीय केंद्रों पर नि:शुल्क एचआईवी जांच की सुविधा उपलब्ध है। शहर में एचआईवी व एड्स पीडि़त मरीजों की मदद के लिए कई स्वयंसेवी संस्थाएं भी सहयोग कर रही हैं। मप्र वॉलेंटरी हेल्थ एसोसिएशन चार साल से 15 गरीब बस्तियों में प्रभावित परिवारों की मदद कर रही है।

और कमी लाने के प्रयास करेंगे

छह साल के आंकड़े देखें तो एड्स पॉजिटिव रोगियों की संख्या में कमी आई है। इस साल 1 जनवरी से 30 नवंबर तक कुल 600 नए मरीज मिले हैं। हमारा प्रयास है कि आने वाले वर्षों में जागरूकता और सही मार्गदर्शन के सहारे पॉजिटिव मरीजों में और कमी लाई जाए।

- डॉ. विजय छजलानी, जिला एड्स रोकथाम व नियंत्रण अधिकारी

aids day 2016

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