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आर्मी डे: इस धुरंधर के आगे पाकिस्तानी सेना ने टेक दिए थे घुटने

Updated: IST indo pak war
जबलपुर में पदस्थ रहे तत्कालीन लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ने भारत-पाक युद्ध में निभाई थी अहम भूमिका, आज भी ताजा हैं शौर्य भरी यादें

जबलपुर। इंडियन आर्मी-डे, सेना के शौर्य और गौरव का दिन है। जबलपुर में एक से बढ़कर एक रणबांकुरे हुए, जिन्होंने समर भूमि में दुश्मन को धूल चटा दी। इन्हीं शामिल हैं तत्कालीन लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा...। जबलपुर में पदस्थ रहे भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल अरोड़ा की भारत-पाक युद्ध में अहम भूमिका रही। सन् 1971 में उनके नेतृत्व में ही भारतीय जवानों ने पाकिस्तानी सेना के 93 हजार जवानों को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया था। कई युद्बबंदी जबलपुर में निरुद्ध भी रहे। एक खासियत यह भी है कि शहर के भंवरताल गार्डन के बीच लगी रानीदुर्गावती की प्रतिमा का अनावरण भी इसी सख्शियत यानी लेफ्टिनेंट जनरल अरोड़ा ने किया था, जो उनके शौर्य की याद दिलाता है।

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कांपी थी इंदिरा की आवाज

नवंबर 1971, में ही ये स्पष्ट हो गया था कि भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध होकर रहेगा। तीन दिसंबर,1971 को शाम के धुंधलके में पांच बजकर 40 मिनट पर पाकिस्तानी वायुसेना के सेवर जेट्स और स्टार फाइटर विमानों ने भारतीय सीमा पार कर पठानकोट, अमृतसर, श्रीनगर, जोधपुर और आगरा के सैनिक हवाई अड्डों पर बम गिराने शुरू कर दिए। पूर्वी कमान के कमांडर इन चीफ जगजीत सिंह अरोड़ा ने कोलकाता के राजभवन में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सुइट पर दस्तक दी। उन्हें सेल्यूट किया और पाकिस्तानी हमले की जानकारी दी। आधी रात को इंदिरा गांधी ने लगभग कांपती हुई आवाज में अटक-अटक कर देश को संबोधित किया। इंदिरा गांधी के शब्द थे, 'अब तक जो बांग्लादेश यानी पश्चिमी पूर्व पाकिस्तान की लड़ाई थी, वो लड़ाई भारत पर भी आ गई है। मुझे संदेह नहीं है कि सारी भारत की जनता और सब राजनीतिक दल और सब नागरिक इस समय एक हैं।Ó

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इसलिए लडऩा पड़ा युद्ध

पाकिस्तान बनने के बाद से ही पूर्वी पाकिस्तान के लोगों को शिकायत थी कि उनके साथ वहां न्याय नहीं हो रहा है। 1970 में पाकिस्तान में हुए आम चुनाव में क्षेत्रीय स्वायत्तता के मुद्दे पर चुनाव लडऩे वाली शेख मुजीब की अवामी लीग को पूर्वी पाकिस्तान की 162 सीटों में से 160 सीटें मिली थीं और पश्चिमी पाकिस्तान में एक भी सीट न लडऩे के बावजूद उसे पाकिस्तान की राष्ट्रीय असेंबली में पूर्ण बहुमत मिल गया था। सत्ता हस्तांतरण तो दूर, पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह जनरल याहिया खां ने 25 मार्च 1971 को पूर्वी पाकिस्तान की जनभावनाओं को सैनिक शक्ति से कुचलने का आदेश दे दिया था। शेख मुजीब गिरफ्तार कर लिए गए। सैनिक दमन से त्रस्त लगभग एक करोड़ लोगों ने भारत की धरती पर शरणार्थी के रूप में प्रवेश किया। जैसे-जैसे पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों की खबरें फैलने लगी, भारत सरकार पर वहां सैनिक हस्तक्षेप के लिए दबाव पडऩे लगा।

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भारत का तीसरा युद्ध

उल्लेखनीय है कि बांग्लादेश के निर्माण के लिए भारत को पाकिस्तान के साथ तीसरा युद्ध लडऩा पड़ा था। इस युद्ध की बातों के साथ हमको याद आते हैं लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा। एक ऐसा नाम जिसने 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों को घुटनों पर बैठने को मजबूर कर दिया था। जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा का जबलपुर से गहरा नाता रहा है। उन्होंने भंवरताल गार्डन में वीरांगना रानी दुर्गावती की प्रतिमा का अनावरण भी किया था।

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आत्मसमर्पण के कागजात पर इनके हस्ताक्षर

इतिहास विद आरएन शुक्ल बताते हैं कि 13 दिसंबर 1971 को भारतीय सैनिक ढाका के आसपास पहुंच गए थे। 16 दिसंबर, 1971 को सुबह नौ बजे जनरल जैकब को फील्ड मार्शल मानिक शॉ का संदेश मिला कि आत्मसमर्पण की तैयारी के लिए वो तुरंत ढाका पहुंचे। जनरल जैकब ने ढाका पहुंचकर जनरल नियाजी को आत्मसमर्पण की शर्तें समझाई। जनरल नियाजी की आंखों से आंसू टपकने लगे। आत्मसमर्पण के कागज़ात पर भारत की ओर से लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा और पूर्वी पाकिस्तान सेना की ओर से लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी ने हस्ताक्षर किए। खचाखच भरे रेसकोर्स स्टेडियम में ढाका की जनता इस ऐतिहासिक दृश्य को अपनी आंखों से देख रही थी। खास बात ये भी है इस युद्ध के युद्धबंदी जबलपुर में ही निरुद्ध रहे हैं।

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16 दिसंबर को मिली जीत

बांग्लादेश का स्वतंत्रता दिवस 26 मार्च को मनाया जाता है। बंगबंधु के नाम से विख्यात शेख मुजीबुर्रहमान ने 25 मार्च 1971 की आधी रात के बाद पाकिस्तान से अपने देश की आजादी की घोषणा की थी। उसके बाद उन्हें पाकिस्तानी सेना द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया। 26 मार्च को बांग्लादेश की स्वतंत्रता की घोषणा के साथ ही 'मुक्ति युद्धÓ की शुरुआत हो गई थी। अंत में जीत 16 दिसम्बर को जीत हासिल की।

मिला परम विशिष्ट सेवा मेडल

वर्ष 1973 में लेफ्टिनेंट जनरल अरोड़ा सेना से रिटायर हो गए। उन्हें पहले परम विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित किया गया। इसके बाद युद्ध में उनकी भूमिका की वजह से उन्हें पदम भूषण सम्मान से सम्मानित किया गया।

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पाकिस्तान में हुआ था जन्म

बताया गया है कि लेफ्टिनेंट जनरल अरोड़ा का जन्म 13 फरवरी 1916 को झेलम की काला गुजरान जिले में हुआ था। यह जगह आजादी के बाद पाकिस्तान में चली गई है। दिल्ली में 89 साल की उम्र में 3 मई 2005 में उनका निधन हो गया। आज भी जबलपुर के लोग उन्हें याद करते हैं और यही कहते हैं, 'वह बांग्लादेश वाले अरोड़ा।Ó जनरल अरोड़ा आज भी कई युवाओं के आदर्श हैं।

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