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बच्चे की सेहत बिगाड़ रहा बस्ते का बोझ, हर बच्चा उठा रहा सात से आठ किलो वजन

Updated: IST school bag burden
शहर के कई स्कूलों में बच्चों के बैग भारी, मदद के लिए पैरेंट्स को भी करनी पड़ती है मशक्कत

जबलपुर। स्कूल बैग का वजन बच्चों की कमर तोड़ रहा है। उनका पॉश्चर बिगाड़ रहा है। उन्हें पीठ का दर्द दे रहा है। यह मुसीबत सिर्फ कुछ समय के लिए नहीं, बल्कि जीवन भर के लिए मिल रहा है। स्टूडेंट्स को डिजिटल एजुकेशन प्रोवाइड करवाने के लिए कई नियम और गाइडलाइन जारी किए गए थे, लेकिन इसके बाद भी स्टूडेंट्स बस्ते का बोझ लादने पर मजबूर हैं। 'पत्रिका सरोकार-बोझ तले बचपन के अंतर्गत पत्रिका कुछ दिनों से एेसे ही मुद्दों को उठा रहे है। इसी कड़ी में गुरुवार को पत्रिका द्वारा शहर के कुछ स्कूलों के बच्चों के स्कूल बैग की स्थिति को जांचा गया।

कुछ एेसे थे दृश्य

स्कूल खत्म होने की बेल बजते ही बच्चे कई किलों का वजनी स्कूल बैग टांगे गेट पर आकर खड़े हो गए। पैरेंट्स और ऑटो आने के इंतजार में बच्चों को 5 से 7 मिनट तक खड़ा भी रहना पड़ता है। शहर के अलग-अलग स्कूलों में जब बच्चों की स्थिति को देखा गया तो उनके स्कूल का वजन 7 से 8 किलो तक का रहा। रोजाना कंधों पर इतना वजन सहना बच्चों को कुछ पल का दर्द देने के साथ हमेशा के लिए उन्हें स्पाइनल इंजरी भी दे रहा है।

burden of school bag

सवाल सभी पर

बस्तों का बोझ कम करने के लिए स्कूलों सहित पैरेंट्स और टीचर्स के लिए भी गाइडलाइन जारी की गई है। इसके बाद भी यह सवाल सभी के लिए लागू होता है, जो बच्चों के बैग को कम नहीं करवा पा रहे हैं।

डिजिटल एजुकेशन हुई डब्बा

बस्ते के बोझ को कम करने और स्टडी को आसान बनाने के लिए जारी किए गए डिजिटल एजुकेशन के वादे भी डब्बा साबित हो चुके हैं।

- डिजिटल एजुकेशन में स्टूडेंट्स को पोर्टल से स्टडी कम होती है।
- ई-लाइब्रेरी कॉन्सेप्ट का उपयोग कम।
- ऑनलाइन लगवाए जाने वाली क्लासेस में आ रही सर्वर प्रॉब्लम।
- लेस बैग वेट के बाद भी नहीं होती चैकिंग।

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