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Photo Icon बांस-बल्ली के सहारे 4 किलोमीटर तक पैदल लाया गया महिला पंच का शव, देखें वीडियो

Updated: IST Woman
कटनी जिले के बरही थाना क्षेत्र अंतर्गत ग्राम खेरवा का मामला

जबलपुर/कटनी। देश में व्यवस्थाएं किस प्रकार की हैं, इसकी जीवंत वानगी कटनी जिले के खेरवा गांव में देखने को मिली। ग्रामीणों को यहां महिला पंच का शव बांस-बल्ली के सहारे 4 किलोमीटर तक पैदल लाना पड़ा। यह केवल एक उदाहरण है। आए दिन शवों को ऐसे ही ले जाना पड़ रहा है। कई गांवों में आज पहुंच मार्ग, परिवहन के साधनों और नागरिक सुविधा नहीं है। दरअसल गांव में यह स्थिति इसलिए बनी क्योंकि खेरवा गांव बाढ़ सागर परियोजना के तहत डूब क्षेत्र का आंशिक प्रभावित गांव है। प्रशासन द्वारा अभी तक इसे विस्थापित नहीं किया गया और लोगों के सामने स्थिति हर रोज कुछ इसी तरह ही निर्मित हो रही है।

यह है मामला
जानकारी बरही थाना अंतर्गत ग्राम खेरवा में रविवार की शाम गांव की पं. महिला मुन्नी बाई पर आकाशीय बिजली गिरने से मौत हो गई। महिला की असमय मौत होने के कारण पुलिसिया जांच के लिए पीएम कराया जाना अनिवार्य था। इसलिए परिजन व ग्रामीणों को महिला का शव 8 किलोमीटर दूर बरही लाना पड़ा। जब महिला का शव ग्रामीण लेकर बरही पहुंचे तब व्यवस्थाओं की पोल खुलकर सामने आई।

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4 किलोमीटर तक बांस-बल्ली का सहारा
खेरवा गांव टापू बनने के कारण यहां तक पहुंचने के लिए कोई मार्ग नहीं बचा है। इससे यहां पर कोई वाहन नहीं पहुंच सका। जब ग्रामीणों को कोई उपाय नहीं सूझा तो उन्होंने बांस और बच्ची के सहारे झूला बनाया और उसमें पंच का शव कंधे में लादकर बरही के लिए रवाना हुए। ग्रामीण खेरवा से शव लेकर दो किलोमीटर पैदल चलकर महानदी के खेरवा घाट पहुंचे। यहां से नाव में शव रखकर लूली घाट उतरे। नदी पार कर लेने के बाद भी ग्रामीणों की समस्या कम नहीं हुई। उन्हें यहां भी लगभग दो किलोमीटर शव को कंधे में लादकर लूली गांव तक पहुंचना पड़ा।

यहां भी व्यवस्था ने तोड़ा दम
ग्रामीणों की मानें तो यहां पर सरकारी व्यवस्थाओं की कलई खुलकर सामने आ गई। कंधे पर शव लादकर लूली पहुंचे परिजन व ग्रामीणों को बरही सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तक शव लाने के लिए यहां से न तो एंबुलेंस नसीब हुई और ना ही शव वाहन। फिर ग्रामीणों ने निजी वाहन का सहारा लिया और शव को बरही लेकर पहुंचे। यहां पर पीएम के बाद फिर उसी तरह शव को गांव वापस लेकर गए।

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इमरजेंसी में कोई उपाय नहीं
ग्रामीणों की मानें तो बारिश के 4 माह उनके लिए किसी मुसीबत से कम नहीं है। बारिश शुरु होते ही न सिर्फ वे गांव में कैद से हो जाते हैं बल्कि गांव में किसी भी प्रकार की इमरजेंसी के वक्त पूरा गांव हैरान-परेशान हो जाता है। गांव में किसी के बीमार होने, महिला को प्रसव पीड़ा, गांव से बाहर जाने, बच्चों को पढ़ाई के लिए गांव से दूसरे गांव जाने सहित अन्य दैनिक कामकाज के सिलसिले में भारी समस्या होती है। ग्रामीणों को सिवाय आश्वासन के आजतक कुछ भी हाथ नहीं लगा।

ये गांव है प्रभावित
ग्रामीणों की मानें तो यह सिर्फ खेरवा गांव में समस्या नहीं है। कटनी जिले के आधा दर्जन से अधिक ऐसे गांव में है जो बारिश में जिंदगी और मौत के बीच हर रोज जद्दोदहद करते हैं। बताया जा रहा है कि उबरा, कुटेश्वर, हरदुआ महानदी, छैघरा, कुदरी के भी यही हाल हैं। ग्रामीण यहां पर पगडंडी के सहारे गुजारा कर रहे हैं, लेकिन अपातकाल में यहां के लोगों को भी समस्या का सामना करना पड़ता है।

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यह वानगी कबतक
आज हम आपको जो तस्वीरें दिखाने जा रहे हैं ये वाकई हैरान करने वाली हैं। देश चंद्रमा, मंगल और अन्य ग्रहों में दुनिया बसाने की बात करने लगा है, लेकिन गांव में लोग आज भी इस तरह की जिंदगी बिता रहे हैं। ऐसे गांवा के लिए आजतक क्यों कोई ठोस योजना नहीं बन रही। देश को शर्मसार करने वाली यह तस्वीर विकास के उस कोरम को भी बयां कर रही है जिसमें विकास के हर रोज कई पन्नों के कसीदे पढ़े जाते हैं।

आखिर अबतक ऐसा क्यों
सवाल यह उठता है कि जब क्षेत्र के अधिकांश गांव बाढ़ प्रभावित हैं और उन्हें विस्थापित कर दिया गया है तो फिर इस तरह की समस्या झेल रहे गांव को अबतक विस्थापित क्यों नहीं किया जा सका। यदी योजना में शामिल नहीं है तो फिर गांव तक पहुंचने के लिए शासन-प्रशासन ने अबतक कोई सुविधा क्यों नहीं मुहैया कराई। क्योंकि यह समस्या पिछले कई वर्षों से खेरवा वाशिंदों को उठानी पड़ रही है।

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हर आंखों में छलक आए आंसू
मुन्नी बाई की मौत से जहां परिजन शोक में गमगीन थे तो वहीं ग्रामीणों में भी मातम का माहौल दिख रहा था। जब उन्हें इस तकलीफ से गुजरना पड़ा तो उनकी आंखों में आंसू छलक आए। इतना ही नहीं जिस किसी ने भी इस नजाने को देखा, उसकी आंखें नम हो गईं। हैरत की बात तो यह है कि सोशल मीडिया में वायरल हुए इस वाक्ये के बाद भी जिम्मेदारों ने अबतक कोई सुध नहीं ली है। जिसने भी इस वाक्ये को देखा व्यवस्था को कोसता नजर आया।

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