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कहीं लोहड़ी तो कहीं लाल लोही के रूप में मनाया जाता है यह उत्सव

Updated: IST Lohri will burn, would Celebration
लोहिता राक्षसी पर रखा गया है यह नाम, सिंधी समाज भी मनाता है यह पर्व

जबलपुर।बेहद व्यस्तता के बाद भी आज अनेक लोग एक पर्व के लिए रात को एकत्रित होंगे। सिक्ख समुदाय के लिए लोहड़ी का यह पर्व भांगड़ा पर झूमने का मौका दे रहा है। लोहड़ी की तैयारी शुरु हो चुकी है। देर रात तक अलाव जलाने के लिए लकडिय़ां खरीद ली गई हैं। मदनमहल में ही करीब एक दर्जन जगहों पर अलाव जलाकर नाचने की तैयारी की जा रही है।

राक्षसी की मौत पर मनाई थी खुशियां

मकर संक्रांति के एक दिन पहले लोहड़ी मनाई जाती है। लोहड़ी का एक प्रसंग द्वापरयुग से भी जुड़ा हुआ है। द्वापरयुग में मथुरा के आततायी राजा कंस का अत्याचार खत्म करने भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया था। कंस हमेशा बालकृष्ण को मारने, मरवाने की ताक में रहता था। एक बार जब जनता मकर संक्रांति का पर्व में मनाने में मशगूल थी तब कंस ने मौका देखकर एक चाल चली। उसने बालकृष्ण को मारने के लिए गोकुल में लोहिता नामक राक्षसी को भेजा। बालक कृष्ण ने खेल-खेल में ही इस राक्षसी का वध कर दिया। उसी घटना की स्मृति में लोहड़ी का पावन पर्व मनाया जाता है। लोहिता राक्षसी के नाम पर ही लोहड़ी उत्सव का नाम रखा गया है।

सिंधी समाज ने मनाया लाल लोही उत्सव

सिंधी समाज भी मकर संक्रांति से एक दिन पूर्व यह उत्सव मनाता है। सिंधी समुदाय इस पर्व को लाल लोही के रूप में मनाता है। लोहड़ी की शाम लकडिय़ां इक_ी कर जलाई जाती हैं और तिल से अग्निपूजा की जाती है। इस मौके पर लोहड़ी के गीत भी गाए जाते हैं।

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