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धरती में खतरनाक परिवर्तन की वजह से लेट हो रहा मानसून, हैरान कर देगा कारण

Updated: IST status of monsoon
मध्य प्रदेश में मानसून प्राय: 15 जून के आसपास तक दस्तक दे देता था। पिछले कुछ से वर्षों से यह स्थिति गड़बड़ा रही है। मानसून की आमद लेट हो रही है। कई बार बना बनाया सिस्टम फेल हो जाता है और बादल तितर-बितर हो जाते हैं।

जबलपुर। मध्य प्रदेश में मानसून प्राय: 15 जून के आसपास तक दस्तक दे देता था। पिछले कुछ से वर्षों से यह स्थिति गड़बड़ा रही है। मानसून की आमद लेट हो रही है। कई बार बना बनाया सिस्टम फेल हो जाता है और बादल तितर-बितर हो जाते हैं।

मौसम विदों की मानें तो यह सब धरती में आ रहे चिंताजनक परिवर्तन की वजह से हो रहा है। धरती के पूरी तरह गरम नहीं होने की वजह से आसमान में हवा के निम्न दबाव का क्षेत्र नहीं बन पा रहा है। ठीक इसी तरह समुद्र में हवाओं का रुख गरम हो रहा है। इसी की वजह से अलनिनो इफेक्ट आ रहा है, जो समय पर वर्षा के लिए बाधक बन रहा है।

जरूरी है धरती की गरमी
मौसम विज्ञानी आरके दत्ता के अनुसार समय पर अच्छी बारिश के लिए कुछ बातें बेहद आवश्यक होती हैं। इन्हीं में से एक है धरती की गरमी। जब धरती गर्म होती है और समुद्र से शीतल हवाएं आती हैं तो आसमान में हवा के निम्न दबाव का क्षेत्र बनता है। हवा का कम दबाव पाकर ही बादल बनते और झूमकर बरसते हैं। जून की शुरुआत में सूरज की किरणें तेज होती हैं, जो पृथ्वी के तापमान को बढ़ाने में सहायक होती हैं।

हो रहा है यह
मौसम विज्ञानियों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों से यह देखने में यह आ रहा है कि जून के प्रथम सप्ताह में ही लोकल क्लाउड्स सक्रिय हो जाते हैं। इसकी वजह से धरती का टेंप्रेचर मानसून के हिसाब से मेनटेन नहीं हो पा रहा। धरती को पूरी तरह गरमाहट नहीं मिलने के कारण हवा के निम्न दाब का क्षेत्र नहीं बन पा रहा। ठीक यही स्थिति समुद्र में बन रही है। जून के दूसरे सप्ताह से ही बंगाल की खाड़ी में नम हवाएं सक्रिय हो जाती थीं, जो मानसून को बंगाल की खाड़ी से छत्तीसगढ़ होते हुए एमपी तक लाती थीं। इन हवाओं का रुख गरम होने की वजह से सिस्टम प्रभावी नहीं हो पा रहा है। इसे अलनिनो इफेक्ट भी मान सकते हैं।

बनकर बिखर रहे मेघ
मौसम विद प्रो. अरुण शुक्ल का कहना है कि बंगाल की खाड़ी में इस बार भी समय पर सिस्टम बना था। इसकी वजह से उम्मीद की जा रही थी कि मानसून इस बार 16 जून के आसपास मध्य प्रदेश में दस्तक दे देगा। लेकिन समुद्र में गरम हवाओं की सक्रियता और इधर धरती के तापमान में आ रही कमी की वजह से बार-बार यह सिस्टम लडख़ड़ा रहा है। हवा के निम्न दाब का क्षेत्र बार-बार निष्क्रिय हो रहा है और बादल बिखरकर तितर-बितर हो रहे हैं।

यहां कमजोर पड़ा सिस्टम
मौसम विदों के अनुसार इस समय माहौल में आर्द्रता और तापमान दोनों अपेक्षाकृत कम है। इसी वजह से हवा के निम्न दबाव का क्षेत्र प्रभावी नहीं हो पा रहा है। मानसून छत्तीसगढ़ आते-आते कमजोर पड़ गया है। इसका कुछ अंश खिसककर महाराष्ट्र, पंजाब और राजस्थान की तरफ चला गया है। इसी वजह से वहां मानसून की सक्रियता अपेक्षाकृत अधिक देखी जा रही है।

ये भी है कारण
एसएफआरआई की सीनियर रिसर्च अफसर डॉ. ज्योति सिंह व पर्यावरण विद विनोद दुबे का कहना है कि खेती में रासायनिक खाद और कीटनाशकों के उपयोग के साथ पेड-पौधों की कटाई की वजह से भी पर्यावरणीय परिवर्तन आ रहा है। धरती की तासीर अनियमित हो रही है। यही मौसम और मानसून के गड़बड़ाने की वजह है। इसे दूसरे रूप में ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव भी कहा जा सकता है। धरती में किए जा रहे खनन और कीटनाशकों के उपयोग पर रोक लगाने के साथ अधिक से अधिक पौधा रोपण करके इस विषम परिस्थिति से बचा जा सकता है।

बस कुछ दिन और...
मौसम विज्ञान केन्द्र के विशेषज्ञों का कहना है कि बंगाल की खाड़ी में फिर एक चक्रवाती घेरा प्रभावी हो रहा है। यह छत्तीसगढ़ के रास्ते से जबलपुर और एमपी में दस्तक देगा। इस प्रक्रिया में तीन से चार दिन का समय लग सकता है। उम्मीद की जा रही है कि 24 जून तक प्रदेश में झमाझम बारिश हो सकती है।

फिलहाल बुरा हाल
मौसम की बेरुखी की वजह से फिलहाल लोगों का बुरा हाल है। उमस बेचैनी बढ़ा रही है। चिपचिपाहट भरी गर्मी के आगे कूलर-पंखों की हवा फेल नजर आ रही है। खेतों में खरीफ फसलों की बोवनी की तैयारी का काम अधूरा है। किसान आसमान की तरफ ताक रहा है। हालांकि मौसम विज्ञानियों का मानना है कि मानसून जल्द आएगा और बारिश भी झमाझम होगी।

पिछले सात वर्षों की स्थिति

वर्ष - बारिश - कबआयामानसून

2010 - 1486 - 1 जुलाई
2011 - 1627 - 20 जून
2012 - 1360 - 21 जून
2013 - 1957 - 11 जून
2014 - 911 - 19 जून
2015 - 810 - 23 जून

2016 - 1455 - 19 जून

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