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Video Icon VIDEO: यहां तिल-तिल रोज बढ़ रहे स्वयं-भू गणेश, नेत्र और सूंढ़ की बनी अपने आप आकृति

Updated: IST Unique temple of Lord Ganesha
रतननगर जबलपुर में विराजे हैं अनूठे गणपति, कल्कि भगवान के माने जा रहे 10वें अवतार

जबलपुर। देश में कई मंदिर है जो अपने चमत्कारों को लेकर प्रसिद्ध हैं। ऐसा ही एक मंदिर है जबलपुर रतननगर का सुप्तेश्वर गणेश मंदिर। वैसे देश में अनेकों ऐसे गणेश मंदिर हैं जो श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है, लेकिन यह मंदिर बाकि सब मंदिरों से अपने आप में अनूठा है क्योंकि, एक तो ये विशाल मंदिर पहाड़ी पर स्थिति है और दूसरा यहां स्थित गणपति की मूर्ति का आकार लगातार बढ़ रहा है। आस्था और चमत्कार की ढेरों कहानियां खुद में समेटे हुए है कल्कि अवतार का प्रतिरूम माना जाने वाला ये गणेश मंदिर।

28 वर्ष में बढ़ी 5 फीट प्रतिमा
रतननगर जबलपुर स्थित गणेश मंदिर न सिर्फ अनूठा बल्कि एक गूढ़ रहस्य को संजोए हुए है। पं. ओमकार द्विवेदी के अनुसार लगातार प्रतिमा (शिला) का आकार बढ़ रहा है। पिछले 28 सालों में प्रतिमा 5 फीट से ज्यादा बढ़ गई है। प्रतिमा की न सिर्फ लंबाई बल्कि चौड़ाई में भी इजाफा बताया जा रहा है। जब गणपति की प्राण प्रतिष्ठा हुई थी उस दौरान इनकी ऊंचाई 20 फीट थी जो अब 25 फीट हो गई है। विशालकाय विनायक की चौड़ाई भी 120 फीट है।

स्वप्न में कहा, मैं पहाड़ी में आ गया हूं
स्थानीय निवासी चंद्रशेखर अग्रवाल ने बताया कि भगवान गणपति की यह स्वयं-भू प्रतिमा है। सन 1989 में इन्होंने स्थानीय निवासी सुधा राजे उम्र 70 वर्ष को स्वप्न दिया कि वे रतननगर की पहाड़ी में विराजे हैं। पहाड़ी में हो रही तोडफ़ोड़ को रोका जाए, और उनकी प्राण प्रतिष्ठा कराई जाए। सुधा राजे ने स्वप्न के बारे में क्षेत्र के सभी लोगों को अवगत कराया। जब जाकर लोगों ने देखा तो उन्हें गणपति की आकृति मिली। इसके बाद बड़े धूमधाम से गजानन महाराज की प्राणप्रतिष्ठा कराई गई।

गुफा से हुआ है प्राकट्य
सुप्तेश्वर गणपति की प्राकट्य विशालकाय गुफा से हुआ है। विशाल पहाड़ी जहां पर एक गुफा बनी हुई है और वहां से गणपतिजी का प्राकट्य हुआ है। पं. ओमकार दुबे ने बताया कि गणपति की सवारी घोड़ा है। कलियुग के अंत में भगवान का कल्कि का प्राकट्य होगा, जिनकारी सवारी घोड़ा होगी। सुप्तेश्वर गणेश उन्ही के अवतार का अंश लिए हैं। इसलिए इन्हे कल्कि का 10वीं अवतार भी माना जा रहा है।

Unique temple of Lord Ganesha

अपने आप बन रहीं ये आकृतियां
स्थानीय निवासी जयभान सिंह ने बताया कि वे यहां पर विगत 25 वर्षों से भगवान गणपति के दर्शन-पूजन के लिए आ रहे हैं। इस विशाल स्वयं-भू गणेश प्रतिमा में दिन प्रतिदिन बदलाव देखने को मिल रहे हैं। तिल-तिलकर जहां प्रतिमा बढ़ रही है तो वहीं विशाल शिला में अपने आप नेत्र, सूंढ़ और कान की आकृति उभरती आ रही है। यहां पर भगवान गणपति की एक छोटी प्रतिमा भी स्थापित है, जिनकी लोग पूजा-उपासना करते हैं।

Unique temple of Lord Ganesha

प्रतिदिन मेले सा माहौल
इस प्रसिद्ध मंदिर में प्रतिदिन मेले सा माहौल रहता है। सुबह-शाम सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु पूजन-आरती को पहुंचते हैं। हर माह की चतुर्थी पर यहां विशेष आयोजन होते हैं। महाआरती के साथ-साथ सुंदरकांड और भजनों का आयोजन प्रमुख है। भादो के महीने में गणेश चतुर्थी से लेकर अनंत चतुर्दशी तक विशेष आयोजन होते हैं। यहां की मान्यता है कि यदि कोई भी श्रद्धालु संच्चे मन से विघ्नहर्ता के दरबार पहुंचता है तो उनकी मनौती पूरी होती है।

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